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ऐसे पागलों की आज के समाज को जरूरत है

: रखा क्या है वर्जनाओं की दुनिया में : सारी वर्जनाएं समाज ने गढ़ीं हैं। शुद्धतावादियों ने। नैतिकता के अलंबरदारों ने। जीवन में नैतिकता और अनैतिकता के कोई सर्वमान्य मानक नहीं हैं। हो भी नहीं सकते। गरीब की जो नैतिकता होगी, वही अमीर की भी हो, संभव नहीं। दलित की नैतिकता और गैर-दलित की नैतिकता भी एक जैसी नहीं होती। हर आदमी अपने लिए नैतिकता का जो मानक तय करता है, उसी पर दूसरों को नहीं कसता है। कई बार अपने लिए इसमें छूट भी ले लेने में परेशानी महसूस नहीं करता पर दूसरों को कोई भी छूट नहीं देना चाहता। एक चेहरा संप्रदायवादी नैतिकता का भी है। हिंदू की अपनी नैतिकता है और वह बार-बार वहीं नकेल दूसरे संप्रदायों की नाक में भी डाल देना चाहता है। यह बड़ा खतरनाक है। ये नैतिकताएं कई बार समाज को झगड़े-फसाद और दंगे तक ले जाती हैं।

: रखा क्या है वर्जनाओं की दुनिया में : सारी वर्जनाएं समाज ने गढ़ीं हैं। शुद्धतावादियों ने। नैतिकता के अलंबरदारों ने। जीवन में नैतिकता और अनैतिकता के कोई सर्वमान्य मानक नहीं हैं। हो भी नहीं सकते। गरीब की जो नैतिकता होगी, वही अमीर की भी हो, संभव नहीं। दलित की नैतिकता और गैर-दलित की नैतिकता भी एक जैसी नहीं होती। हर आदमी अपने लिए नैतिकता का जो मानक तय करता है, उसी पर दूसरों को नहीं कसता है। कई बार अपने लिए इसमें छूट भी ले लेने में परेशानी महसूस नहीं करता पर दूसरों को कोई भी छूट नहीं देना चाहता। एक चेहरा संप्रदायवादी नैतिकता का भी है। हिंदू की अपनी नैतिकता है और वह बार-बार वहीं नकेल दूसरे संप्रदायों की नाक में भी डाल देना चाहता है। यह बड़ा खतरनाक है। ये नैतिकताएं कई बार समाज को झगड़े-फसाद और दंगे तक ले जाती हैं।

दरअसल हर समाज खुद को चलाने के लिए कुछ नियम-कानून, कुछ बंदिशें, कुछ नैतिकताएं, कुछ वर्जनाएं निर्मित करता है। यह अलिखित सामाजिक संविधान की तरह होती हैं। कभी बच्चों की शादियाँ कर दी जाती थीं। जब वे शादी का मतलब ही नहीं जानते थे, वे पति-पत्नी बन जाते थे। शायद लैंगिक अपराधों को सीमित करने के लिए ऐसा सोचा गया हो। कभी ऐसी स्त्रियों को जलाकर मार दिया जाता था, जिनके पति का देहांत हो जाता था। इसकेपीछे भी वही सोच रहा होगा कि वह पति की अनुपस्थिति में रास्ता भटक सकती है। पर तब व्यभिचार और बलात्कार के मामले होते ही नहीं थे, ऐसी बात नहीं। मतलब यह कि ये केवल  गैर-जरूरी सामाजिक दुराग्रह थे।

इस तरह के कठोर वर्जनात्मक पहलू सामाजिक जागरूकता  और आधुनिक कानूनों केकारण कम तो हुए हैं लेकिन खत्म नहीं हुए हैं। कुछ बहुत सूक्ष्म नैतिक वर्जनाएं अब भी समाज ओढ़े हुए है। गाँवों में घूंघट अब भी है, वहाँ    औरतें घर केबड़े लोगों से आज भी फुसफुसाती आवाज में ही बात कर सकती हैं। आम तौर पर मान्यता है कि  युवा लड़कियों को लड़कों से बात नहीं करनी चाहिए, उन्हें अकेले शाम के बाद नहीं निकलना चाहिए, ऐसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए जो शरीर की वक्रता, उभार और गहराई को व्यक्त कर सकते हों, शरीर संरचना के विज्ञान और मन की आंतरिक संरचना केमनोविज्ञान से लड़कियों को दूर रखा जाना चाहिए। इतना ही नहीं भाषा को भी शुद्धतावादियों ने काफी हद तक बंधक बना रखा है। कोई भी ऐसा कुछ लिखकर बच नहीं सकता, जो सार्वजनिक रूप से बोला नहीं जा सकता हो। जब काशीनाथ सिंह का उपन्यास काशी का अस्सी छपा था, बहुत बवाल मचा था। तमाम पुस्तकों पर इस तरह के विवाद हो चुके हैं।

पर वर्जनाएं आदमी पर क्या असर डालती हैं, वे कब टूटती हैं, वर्जनाओं से मुक्ति के क्या मायने हैं, ये कुछ बहुत महत्वपूर्ण सवाल हैं। असल में हर बच्चा जन्म लेता है तो संपूर्णता में वर्जनाहीन होता है, वह न नैतिकता केअर्थ जानता है, न अनैतिकता के। बड़े होते हुए वह बार-बार वर्जित प्रदेशों में दाखिल होने की कोशिश करता है। कई बार वह खुद अपने प्रयोग से सीखता है। ऐसी हर सीख उसे प्रकृति देती है, वह उसके लिए जरूरी होती है। जैसे वह आग को आकर्षणवश छू सकता है पर तभी वह यह भी जान लेता है कि यह सुंदर सुनहली सी दिखने वाली लपट उसे जला सकती है। वह दुबारा उसे नहीं छूता है। ऐसी प्राकृतिक वर्जनाएं उसकेजीवन की सुरक्षा केलिए होती हैं। ये सहज ग्राह्य होती हैं।

वह पानी से भी खेल सकता है, उसमें उतर भी सकता है। हो सकता है, वह सीख ले कि पानी में डुबा देने की शक्ति है, हो सकता है वह उसमें डूब जाय। परंतु इसकेठीक विपरीत वह अपने घर के, पास-पड़ोस के बड़े लोगों से कई प्रकार की वर्जनाएं सीखता है। ये उसे पूरी सोच-समझ केसाथ सिखायी जाती हैं। ये वर्जनाएं उस खास जाति, समुदाय, धर्म में सैकड़ों वर्षों से प्रचलित मानसिक बुनावट से जुड़ी होती हैं। यही खतरनाक होती हैं। यही बच्चे के भीतर विकृतियाँ, विसंगतियाँ और कट्टïरता भरती हैं, यही उसे एक सहज और सामान्य मनुष्य बनने केरास्ते की बाधाएं बनती हैं। यही उसके भीतर ईष्र्या, घृणा, वैमनस्य पैदा करती हैं। सच कहें तो यही उसे छोटा, संकीर्ण और अनुदार बनाती हैं।

बच्चा नंगा है, किसी को बुरा नहीं लगता। बच्चा गलत इशारे करता है, कोई बात नहीं। बच्चा गाली बकता है, किसी को बुरा नहीं लगता। लेकिन यही काम कोई युवक करे, कोई आदमी करे, कोई युवती, कोई महिला करे तो लोगों को बुरा लगता है। एक बार श्री रविशंकर से एक पत्रकार ने उनकी उम्र पूछी। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि मैं एक ऐसा बच्चा हूं, जो कभी बड़ा हुआ ही नहीं। नहीं मालूम वे सचमुच सच कह रहे थे या नहीं लेकिन आजकल किसी को भी बच्चा बने रहने की इजाजत नहीं है। उसे बड़ा होना ही पड़ेगा। उसे सारी धूर्तताएं, चालाकियाँ, बदमाशियाँ सीखनी ही पड़ेंगी। उसे अपनी जाति, संप्रदाय, अपने समाज की वर्जनाओं को समझना ही पड़ेगा और बिना गलती केउन पर अमल करना पड़ेगा। अगर वह ऐसा करने से कभी इनकार करता है तो उसे लोग पागल कह सकते हैं। केवल पागल आदमी ही सारी वर्जनाओं से मुक्त हो सकता है। इसे यूं भी कह सकते हैं कि जो वर्जनामुक्त जीवन जी सके, वह पागल है।

ऐसे पागलों की आज के समाज को जरूरत है। ऐसे ही पागलों ने दुनिया में कुछ बड़े काम किये हैं। थामस एडिसन को लोग पागल कह देते थे। वे कई बार खुद का घर बंद करकेजाते थे और वापस लौटने पर उसी दरवाजे पर दस्तक देते या खड़े होकर उसके खुलने का इंतजार करते, जिस पर उन्होंने खुद ही ताला लगाया  था। वे हमेशा कुछ नया करने केपागलपन में रहते थे। आइंसटीन को याद नहीं रहता था कि उन्होंने किसी को समय दे रखा है, कई बार यह भी कि उन्हें भोजन भी करना है। अक्सर वर्जनाओं को तोड़कर फेंक देने वाले या उनसे मुक्त हो जाने वाले ही कला में, साहित्य में, विज्ञान में कुछ बड़ा काम कर पाते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है। जब वर्जनाएं नहीं होती, नैतिकताएं नहीं होती, अपने गढ़े हुए आग्रह नहीं होते तो मनुष्य अपनी स्वयं की सत्ता में खड़ा होता है, उसकी चेतना निर्मल होती है, आईने की तरह। तब वह अपने ही मन के कैनवस पर कुछ ऐसी नयी तस्वीरें बना सकता है, जो अब तक बनायी नहीं जा सकीं।

लेखक सुभाष राय लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट के प्रधान संपादक हैं.

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