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करतार सिंह दुग्‍गल की रचानाओं का प्रचार-प्रसार होना चाहिए

: पंजाबी कथाकार को दी गई श्रद्धांजलि : रुद्रपुर। प्रख्यात पंजाबी कथाकार करतार सिंह दुग्गल के निधन पर कला, संस्कृति, साहित्य एवं पत्रकारिता से जुड़े लोगों ने दुख व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उनके निधन को भारत के लिए एक बड़ी क्षति बताया। उल्लेखनीय है कि प्रतिष्ठित लेखक दुग्गल का 95 वर्ष की आयु में विगत दिनों उपचार के दौरान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली में निधन हो गया। दुर्गा मंदिर गली स्थित एक प्रतिष्ठान पर आयोजित एक बैठक में उनके कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए लेखक और पत्रकार अयोध्या प्रसाद ‘भारती’ ने कहा कि दुग्गल संवेदनशील और बहुप्रतिभाशाली रचनाकार थे। उन्होंने पंजाबी सहित उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी में भी प्रचुर मात्रा में लिखा। उनकी प्रमुख रचनाएं हैं- डंगर, नवां घर, बीहवीं सदी ते होर कवितावां, शरद पूनम की रात, बंद दरवाजे, मिट्टी मुसलमान, तेरे भाने, नानक नाम, चढ़दी कलां सहित अंग्रेजी में बर्थ ऑफ ए सांग, कम बैक माई मास्टर आदि। उनकी रचनाएं तमाम कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल हैं। उनकी तमाम रचनाओं का देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ। साहित्यिक हल्कों में उन्हें बड़ी गंभीरता से लिया गया।

: पंजाबी कथाकार को दी गई श्रद्धांजलि : रुद्रपुर। प्रख्यात पंजाबी कथाकार करतार सिंह दुग्गल के निधन पर कला, संस्कृति, साहित्य एवं पत्रकारिता से जुड़े लोगों ने दुख व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उनके निधन को भारत के लिए एक बड़ी क्षति बताया। उल्लेखनीय है कि प्रतिष्ठित लेखक दुग्गल का 95 वर्ष की आयु में विगत दिनों उपचार के दौरान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली में निधन हो गया। दुर्गा मंदिर गली स्थित एक प्रतिष्ठान पर आयोजित एक बैठक में उनके कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए लेखक और पत्रकार अयोध्या प्रसाद ‘भारती’ ने कहा कि दुग्गल संवेदनशील और बहुप्रतिभाशाली रचनाकार थे। उन्होंने पंजाबी सहित उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी में भी प्रचुर मात्रा में लिखा। उनकी प्रमुख रचनाएं हैं- डंगर, नवां घर, बीहवीं सदी ते होर कवितावां, शरद पूनम की रात, बंद दरवाजे, मिट्टी मुसलमान, तेरे भाने, नानक नाम, चढ़दी कलां सहित अंग्रेजी में बर्थ ऑफ ए सांग, कम बैक माई मास्टर आदि। उनकी रचनाएं तमाम कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल हैं। उनकी तमाम रचनाओं का देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ। साहित्यिक हल्कों में उन्हें बड़ी गंभीरता से लिया गया।

कवि-कथाकार कस्तूरी लाल तागरा ने कहा कि रेडियो की दुनिया में दुग्गल का अहम योगदान है। मार्च 1917 में पाकिस्तान के रावलपिंडी में जन्में दुग्गल ने 1942 से 1966 तक आकाशवाणी में विभिन्न पदों पर रहे और स्तरीय कार्यक्रमों का निर्माण कराया। वे नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक, सूचना और प्रसारण मंत्रालय में सलाहकार सहित आकाशवाणी जालंधर के संस्थापक निदेशक भी रहे। युवा पत्रकार रूपेश कुमार सिंह ने दुग्गल को याद करते हुए कहा कि यह उनकी रचनाओं के बेहतरीन होने का प्रमाण है कि उन्हें साहित्य अकादमी सहित गालिब सम्मान, भारतीय भाषा परिषद सम्मान और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार आदि विभिन्न सम्मान, पुरस्कार मिले। उन्हें 1988 में पद्मभूषण सम्मान दिया गया। अन्य वक्ताओं ने कहा कि उनके निधन पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यह टिप्पणी बड़ी सटीक है कि भारतीय साहित्य समाज ने एक प्रतिभाशाली और विलक्षण व्यक्तित्व खो दिया है। वक्ताओं ने कहा कि उनकी रचनाओं का प्रचार-प्रसार होना चाहिए और हम सभी को दुग्गल से प्रेरणा लेनी चाहिए। बैठक में प्रह्लाद सिंह कार्की, खेमकरण ‘सोमन’, अयोध्या प्रसाद ‘भारती’, कस्तूरी लाल तागरा, रूपेश कुमार सिंह, मुकुल, अरविंद सिंह, विमल शर्मा, नरेश कुमार, रत्नाकर भारती आदि मौजूद थे।

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