लूट का अपना सुख है। यह बड़ा व्यापक शब्द है। अपने भीतर कई-कई अर्थ समाये हुए। लूटने का अपना मजा है, लुटने का भी। शायरों की बात मानें तो इश्क में लुटकर भी लोग खुश महसूस करते हैं। बचपन में हम भी मेले में कई बार लुटे तो कई बार लूटने का आनंद भी लिया। सबसे पहले चश्मा, घड़ी, पिपिहरी और फुलौना खरीदते थे। पैसे तो गये। अब जलेबी कैसे खायें। पहले लुटे, अब लूटने की बारी। बड़ा जोखिम होता था मगर क्या करें। जलेबियाँ छनती देख मुंह में लार भर आती। किसी दुकान पर खड़े-खड़े हिम्मत बटोरते, दुकानदार का मूड इधर-उधर हुआ नहीं कि कुछ टुकड़े लेकर नौ-दो ग्यारह। जो खाया सो खाया। जितना पेट में गया, उतना ही अपना हुआ। बाकी चीजें कितनी देर तक टिकतीं हैं। घर तक आते-आते चश्मा टूट जाता था, घड़ी हाथ से निकल कर गिर जाती थी, फुलौना पटाखे की तरह फटकर हवा में उड़ जाता था। पिंपियाते हुए घर पहुंचते पर लूटी हुई जलेबी का स्वाद देर तक बना रहता, पहले जीभ पर फिर स्मृति में।
लूट का अपना व्याकरण है, अपना गणित है, अपना इतिहास-भूगोल है। हमारे देश में तो लूट का अर्थशास्त्र भी है। लुटेरों की विदेशों तक पहुंच है। वे राजशक्ति और धर्मशक्ति से परे हैं। सरकार उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। वे दुनिया की सारी सरकारों के समानांतर अपनी व्यवस्था चलाते हैं। इस तरह मानना पड़ेगा कि दुनिया भर केलुटेरे एक हैं, मौसेरे भाई। अमूमन जो लुट गया और जिसने लूट लिया, दोनों ही अपनी असलियत छिपाते हैं, किसी को बताते नहीं। लुटने वाले हमेशा दुखी ही होते हों, ऐसा नहीं। लुटकर भी कई बार जहान मिल जाता है। मान लीजिए कोई सुंदरी आप का दिल चुरा ले गयी। जाने में या अनजाने में। या आप को लगा कि उसने आप का दिल चुरा लिया है। तो आप लुट तो गये मगर आप खुश होंगे। इस तरह लुटने का मौका मिले तो कोई बार-बार क्यों नहीं लुटना चाहेगा। इस लूट की रपट दिल में दर्ज होती है, उसी की अदालत में गवाहियाँ होती हैं, वही फैसला भी सुनाता है। किसी और से कोई शिकवा-शिकायत नहीं चलती। बेवजह बात फैली तो मामला गड़बड़ा भी सकता है। एक खुशनुमा बेहोशी छा जाती है। दिल केबदले दिल ही चलेगा। कोई कमतर चीज नहीं। कई बार इसमें गलतियाँ हो जाती हैं। कुछ सनकी प्रेमी एकतरफा लुट जाते हैं। ये मर्ज है और इसका कोई इलाज नहीं। खुदा न खास्ता मर्ज चला भी गया तो उदासी नहीं जाती। सब कुछ लुटा केहोश में आये तो क्या हुआ।
ये लूट के मंजर हमेशा से रहे हैं। जब से जंगल कटे, बाजार सजा, लूट भी शुरू हो गयी। जैसे-जैसे बाजार बड़ा होता गया, लूट केतरीके बदलते गये। अब तो लूट भी हाईटेक हो गयी है, प्रोफेशनल। आप बाजार में कब, कहाँ, किस तरह लुट गये, आप को पता ही नहीं चलेगा। हो सकता है आप लुटकर भी परम प्रसन्न अनुभव करें, आप को लगे कि आप नहीं लुटे, आप ने तो लूट लिया है। अज्ञानियों की कमी थोड़े ही है। बाजार की चमक चकरा देने वाली है। कबीर के जमाने में बाजार इतना चमक-दसक वाला नहीं था। माल अच्छा हो तो बाजार खुद ही लुटने को तैयार दिखता था। रमइया की दुलहिन लूटे बजार। दुलहिन वही बाजार लूट सकती है जो खूबसूरत हो। कबीर मुग्ध थे कि राम ने दुल्हन केरूप में उन्हें स्वीकार कर लिया है। जगत के समूचे आनंद का इसके आगे कोई मोल नहीं। उसे और क्या चाहिए, कौन माई का लाल अब उसकी कीमत लगायेगा। कबीर के रमइया की तो हम कुछ नहीं कह सकते पर आज के रमइया को बड़ा दुख है। कोई बड़े नाज-लखरे वाली तो चीख कर कह सकती है कि मैं आई हूं यूपी-बिहार लूटने पर रमइया की दुलहिन में इतना साहस कहाँ। बाजार ने सबसे ज्यादा मुश्किल में उसे ही डाल रखा है। उस पर पैनी नजर भी रखता है। वो बेचारी क्या लूटेगी, उसकेही लुट जाने का खतरा बना हुआ है। कबीर का ये मुहावरा अब नहीं चलता। गरीबों की जिंदगी पर तो बाजार एक बड़ी दुश्वारी की तरह है। वह रोटी जुटाने में ही चुक जाता है, उसकी दुल्हन को तो बाजार का मतलब तक नहीं मालूम, वो लूटेगी क्या। बड़ी विडंबना है कोई बंबइया दुल्हन चाहे जितनी बड़ी लुटेरिन हो, उस पर कोई ऊंगली नहीं उठाता मगर रमइया की दुल्हन ने घूंघट भी उठाया तो उसे लांछित करने में यह समाज पीछे नहीं है। सभी रस लेकर चर्चा करेंगे, इतनी चर्चा कि नया मुहावरा खड़ा कर देंगे। वैसे ही जैसे गरीब की लुगाई, सबकी भौजाई। आखिर बजार रमइया की दुलहिन पर इतना क्यों रीझता है, वह उस पर इतना निछावर क्यों है, खुद को लुटाने को क्यों तैयार है। इसमें जरूर कोई खेल है, कोई जाल-बट्टा है। रमइया को फुरसत निकालनी चाहिए, सजग रहना चाहिए, इस साजिश को समझना चाहिए। चारो तरफ ठग नजरें गड़ाये बैठे हैं। कब कौन रमइया की छोटी सी नगरिया लूट ले पता नहीं। फिर फक्कड़ाना अंदाज अख्तियार करके भी क्या करेंगे, कहकेभी क्या करेंगे, कौनो ठगवा नगरिया लूटल हो।
बाजार सबसे बड़ा ठग है। दुष्यंत जिंदगी भर परेशान रहे, इससे लोहा लेते रहे। दुकानदार तो मेले में लुट गये यारों, तमाशबीन दुकानें लगा केबैठ गये। उनकी परेशानी जायज थी। जो लोग भी दुष्यंत की तरह साफ देख सकते हैं, जिनकी आँखों में मोतियाबिंद नहीं है, उन सबको चारों ओर इस मेले का हाल दिखायी पड़ेगा। थोड़ा सा फर्क है। जो दुकानें लगाके बैठे हुए हैं, वे महज तमाशबीन नहीं हैं, वे निहायत शातिर लोग हैं, वे ही लुटेरे हैं। वे अपनी दुकानें साथ लिये डोलते हैं और हर वक्त इसी फिक्र में रहते हैं कि लूट कहाँ, कैसे कामयाब हो सकती है। वह भी इस तरह कि लुटने वाले को पता ही न चले। वे अगर नेपथ्य में हैं तो यह उनकी चालाकी है। मौका हाथ लगते ही वे निकलकर मंच पर आ खड़े होते हैं। बाजार से इन लोगों की गहरी दुरभिसंधि है। दोनों मिलकर लूट रहे हैं। लुटने वाले या तो अपनी निरुपायता में इस लूट के मर्म तक पहुंच ही नहीं पाते या फिर एक झटका लगते ही इसी लूटतंत्र का हिस्सा बन जाते हैं। ये लुटेरे उनसे भी खतरनाक हैं, जो बाहर से आये और हमें कंगाल कर गये। वे तो कुछ सोना, कुछ हीरे-जवाहरात, कुछ कीमती सामान ले गये मगर बाजार और सत्ता के पुर्जों की तरह काम करने वाले आज केलुटेरे तो लाखों लोगों को प्यास से, भूख से और बेघर करकेमार देने पर आमादा है। उनकी नजर केवल हमारी छोटी दुकान पर, हमारी मेहनत की कमाई पर ही नहीं, हमारी नदियों, हमारे जंगलों और हमारी जमीनों पर भी है। इन ठगों से नगरिया बचानी है, इन लुटेरों से दुलहिन बचानी है तो रमइया को डटकर खड़ा होना पड़ेगा, होश में आना पड़ेगा।
लेखक सुभाष राय डेली न्यूज एक्टिविस्ट, लखनऊ के प्रधान संपादक हैं.


