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कहां से आता है शब्‍द सत्‍ता का वैभव?

बीता सप्ताह लखनऊ के लिए साहित्यिक सरगर्मियों से भरा रहा। दरअसल मौका था ‘तद्भव’ के रजत जयंती अंक के महत्वाकांक्षी प्रकाशन पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का। परिसंवाद के तीन सत्र थे। उनके विषय थे- ‘साहित्य और शक्ति का द्वंद्व’, ‘हिंसा, भय और सत्ता’ एवं ‘शक्ति-संरचना और साहित्य का प्रतिरोध’। इस परिसंवाद में पूर्व घोषित साहित्यिक दिग्गजों में से कुछ उपस्थित हुए, तो कुछ अनुपस्थित भी रहे। मसलन नामवर सिंह, नित्यानंद तिवारी, काशीनाथ सिंह वगैरह आए तो केदारनाथ सिंह व दूधनाथ सिंह नहीं आ पाए। बहरहाल, बहस साहित्य और शक्ति के द्वंद्व में वैसे ही उलझी रही या फंसी रही जैसे कंटीली झाड़ी में कोई पंक्षी फंस जाए। बहस से कोई ठोस नतीजा नहीं मिल पाया। श्रोता रोशन लाल नहीं हो पाए। परिसंवाद में आकर्षण के केंद्र हिंदी के शीर्षस्थ आलोचक नामवर जी शब्द से, शब्द की सत्ता से किनारा काटते हुए ध्वनियों और नाद के बीहड़ में या कहें तो दलदल में जा खड़े हुए! नामवर जी की आलोचना की बारीकियों और तारीकियों से जो लोग वाकिफ हैं, उनके लिए कुछ भी हैरतअंगेज नहीं था। उत्तरोत्तर शक्ति या सत्ता से व्यामोह के भाव ने ही नामवर को समावेशी बनाया।

बीता सप्ताह लखनऊ के लिए साहित्यिक सरगर्मियों से भरा रहा। दरअसल मौका था ‘तद्भव’ के रजत जयंती अंक के महत्वाकांक्षी प्रकाशन पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का। परिसंवाद के तीन सत्र थे। उनके विषय थे- ‘साहित्य और शक्ति का द्वंद्व’, ‘हिंसा, भय और सत्ता’ एवं ‘शक्ति-संरचना और साहित्य का प्रतिरोध’। इस परिसंवाद में पूर्व घोषित साहित्यिक दिग्गजों में से कुछ उपस्थित हुए, तो कुछ अनुपस्थित भी रहे। मसलन नामवर सिंह, नित्यानंद तिवारी, काशीनाथ सिंह वगैरह आए तो केदारनाथ सिंह व दूधनाथ सिंह नहीं आ पाए। बहरहाल, बहस साहित्य और शक्ति के द्वंद्व में वैसे ही उलझी रही या फंसी रही जैसे कंटीली झाड़ी में कोई पंक्षी फंस जाए। बहस से कोई ठोस नतीजा नहीं मिल पाया। श्रोता रोशन लाल नहीं हो पाए। परिसंवाद में आकर्षण के केंद्र हिंदी के शीर्षस्थ आलोचक नामवर जी शब्द से, शब्द की सत्ता से किनारा काटते हुए ध्वनियों और नाद के बीहड़ में या कहें तो दलदल में जा खड़े हुए! नामवर जी की आलोचना की बारीकियों और तारीकियों से जो लोग वाकिफ हैं, उनके लिए कुछ भी हैरतअंगेज नहीं था। उत्तरोत्तर शक्ति या सत्ता से व्यामोह के भाव ने ही नामवर को समावेशी बनाया।

इस पूरे प्रसंग में मेरे जानते कुंभनदास को किसी ने याद करना गंवारा नहीं समझा। मुझे बार-बार वे याद आते रहे और याद आती रहीं उनकी पंक्तियां, जो कोई चार-साढ़े चार शताब्दियों पहले कही गई हैं-

‘संतन को कहा सीकरी सों काम?,
आवत जात पनहिया टूटी, बिसरि गयो हरिनाम॥
जिनको मुंह देखे दुरूख उपजत,
तिनको करिबे परी सलाम।।
कुंभनदास लाल गिरिधर बिनु और सब बेकाम॥’

कुंभनदास को फतेहपुर सीकरी में अकबर के दरबार में मान-स मान खूब मिला था। फिर भी उन्हें महसूस हुआ था कि वे अपने लक्ष्य से विचलित हो गए। उन्होंने अपने समय की सबसे बड़ी सत्ता और उसके संपूर्ण वैभव के प्रति एक किस्म की उदासीनता का भाव प्रकट किया। यह एक तरह से इनकार का साहस था। यह शब्द-साधना और शब्द सत्ता के वैभव पर भरोसा था। दरअसल ‘इंकार का साहस’ या ‘शब्द-सत्ता के वैभव’ पर भरोसा किसी रचनाकार में कहां से पैदा होता है? यह पैदा होता है लालच के परित्याग से! यह पैदा होता है भौतिकता की माया के फंदे को विवेक की तेजधार तलवार से काटने पर। शब्द किसी रचनाकार, किसी कवि-शायर, किसी कथाकार, किसी आलोचक के लिए वहीं पर शक्ति का स्रोत बनते हैं, जहां वह कुछ न पाने के भाव से दिपदिपाता रहता है। फिर तो किसी कबीर, किसी कुंभनदास, किसी निराला, किसी नागार्जुन, किसी धूमिल को कोई सत्ता लक्ष्य भ्रष्ट नहीं कर सकती है। दरअसल यह एक कवि या साहित्यकार की ही शक्ति होती है कि वह बड़े-से-बड़े दमनकारी शासक या सत्ता केंद्र की आलोचना करता है। वह प्रतिकार में खड़ा होता है। पूरी की पूरी विश्व कविता की परंपरा में इस तरह के सत्ता विरोध के असंख्य उदाहरण हैं।

हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की कविता-परंपरा में प्रतिकार और प्रतिरोध की समृद्घ परंपराएं रही हैं। दमन के उदाहरण भी कम नहीं हैं। मैं कथाकार काशीनाथ सिंह की बात से कतई सहमत नहीं हो सकता कि ‘साहित्यकार’ गांव के सीवान पर मुंह उठाकर भौंकने वाला कुत्ता होता है। ‘उसके लिखे शब्दों का सत्ता पर कोई असर नहीं पड़ता है।’ यह एक तरह से हताशा-निराशा में कही गई बात हो सकती है। कथाकार काशीनाथ सिंह की पीढ़ी के ही एक कवि हैं धूमिल। धूमिल काशीनाथ सिंह के मित्र थे और काशी के ही थे। उन्होंने शब्द और कविता के बारे में सकारात्मक-नकारात्मक-दोनों तरह की बातें की हैं। एक स्थान पर वे ‘नर्वस’ होने, हताश-निराश होने की स्थिति में कहते हैं- 

‘कविता में जाने से पहले
मैं आपसे ही पूछता हूं
जब इससे न चोली बन सकती है
न चोंगा तब आपै कहौ-
इस ससुरी कविता को
जंगल से जनता तक
ढोने से क्या होगा?’ (‘कवि’ शीर्षक कविता 1970)

हालांकि धूमिल ने कविता के बारे में सकारात्मक बातें ज्यादा की हैं। दरअसल यही उनका स्थायी भाव-विचार भी है कविता या शब्द को लेकर। वे ‘नक्सलबाड़ी’ कविता में कुछ इस तरह सार्थक बात कहते हैं- ‘‘कविता नागरिकता का हक हलाल करती हुई गंदगी के खिलाफ सिर्फ भंगी का हिलता हुआ झाड़ू है, हज्जाम की खुली हुई ‘किस्बत’ में एक चमकता हुआ उस्तरा है।’’ वे अपनी एक कविता ‘मुनासिब कार्रवाई’ में कहते हैं- ‘‘कविता क्या है? कोई पहनावा है? कुर्त्ता-पाजामा है?’ ना, भाई, ना। कविता। शब्दों की अदालत में। मुजरिम के कटघरे में खड़े बेकसूर आदमी का। हलफनामा है। क्या यह चरित्र बनाने की। व्यक्तित्व बनाने की। खाने-कमाने की। चीज है? ‘ना, भाई, ना। कविता। भाषा में। आदमी होने की तमीज है।’’

धूमिल का यकीन था कि ‘कविता में शब्दों के जरिए एक कवि अपने वर्ग के आदमी को समूह की साहसिकता से भरता है जबकि शस्त्र अपने वर्ग-शत्रु को समूह से विच्छिन्न करता है।’ वे यह भी मानते हैं कि ‘कविता आदमी का हक बहाल करती है, न्याय कायम करती है, सत्य की सुरक्षा करती है।’ असल में पिछले दो दशकों में लगातार शब्दों पर से कवियों-लेखकों और आम आदमी का भी भरोसा घटता गया है। इसके पीछे भी वैश्वीकरण, बाजारवाद और नव साम्राज्यवाद या नव पूंजीवाद की भूमिका है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि इसी दौर में सबसे ज्यादा, सबसे तेज गति से मानवीय मूल्यों एवं संवेदनाओं का भी क्षरण हुआ है। ‘विचारधारा’, ‘प्रतिबद्घता’, ‘परिवर्तन’ जैसे शब्दों पर से रचनाकारों का भरोसा उठता गया है। एक भयानक और दबंग किस्म की मौकापरस्ती, एक निर्ल्लज तरीके की आपाधापी, स्पर्धा, धोखाधड़ी, छद्म और पाखंड ने व्यक्ति एवं समाज के भीतर भरपूर जगह बनाई है। इसी दौर में खोटे सिक्कों ने बाजार से असली सिक्कों को बेदखल किया है। इसी दौर में चीजों और शब्दों और व्यक्तियों ने अपनी शक्लें बदली हैं। हम एक ऐसे दौर में दाखिल हैं जहां हत्यारे दोस्त का नकाब पहने हुए हैं। एक लोकतंत्रात्मक व्यवस्था में ‘लोक’ के लिए काफी कम ‘स्पेस’ रह गया है। लोकतंत्र की आड़ में साम्राज्यवादी-उपनिवेशवादी विस्तार का दौर है यह। इसमें शांति के नाम पर सबसे ज्यादा रक्तपात है, लूट है, बेशर्मी है। एक तरह से कहें तो एक परतदार, जटिल संरचनाओं वाला समाज हमारे सामने है। इसी को लक्ष्य कर आलोचक रामचंद्र शुक्ल ने कहा था कि ‘जैसे-जैसे हमारा समाज जटिल होता जाएगा, कवि-कर्म कठिन होता जाएगा।’ कहना न होगा कि आज हिंदी की मुख्यधारा में छद्मवेशी धूर्त, पाखंडी और दंभी रचनाकार बहुमत में हैं। अच्छी रचनाएं या रचनाकार हाशिए पर हैं। दरअसल इस विडंबनापूर्ण स्थिति के लिए भी कहीं-न-कहीं से ‘कुलीनतावादी आलोचना’ का हाथ है।

साहित्य में आरंभ से ही दो धाराएं रही हैं। एक धारा भांट चारणों की रही है, तो दूसरी धारा संघर्ष कर रही जनता की आवाज बन जाने की, प्रतिकार, इंकार या प्रतिरोध की धारा रही है। ऐसे साहित्य से बदलाव का वातावरण सृजित होता है। आज जन-आंदोलनों और जनसंघर्षों के होते हुए भी कवि-लेखक प्रतिरोध का साहित्य कम रच पा रहे हैं। इसके पीछे भी बाजार की शक्तियां हैं। वे कवि-लेखकों के सामने सोने का मारीच बनकर लुभा रही हैं। एक बात और, आज साहित्य की इस दूसरी जनोन्मुखी धारा में भी कई नकाबपोश घुसपैठिए घुस आए हैं। ये एक तरह से वर्चस्वशाली ठेकेदार या सामंत की भूमिका में हैं। बाजार की शक्तियां या नव पूंजीवादी, नव साम्राज्यवादी देशी-विदेशी दलाल शक्तियों की छत्रछाया भी इन्हें प्राप्त हैं। ये बड़ी बारीकी या कलात्मक चतुराई के साथ विश्वसनीय शब्दों की भी जुगाली (पागुर) करते हुए उन्हें अविश्वसनीय और विकृत बना डालते हैं। आज ‘प्रतिरोध’ या ‘विचारधारा’ जैसे शब्दों के साथ दोगला व्यवहार किया जा रहा है। इस तरह की कोशिशें अंततः सत्ता के स्तंभों को ही मजबूत बनाती हैं। मेरा मानना है कि साहित्य की मुख्यधारा के भीतर उभर रहीं ऐसी चालाक शक्तियों का विरोध होना चाहिए। उन्हें बेनकाब करना चाहिए। और अंत में, ‘तद्भव’ के रजत जयंती अंक में, उसके कविता खंड में कुल जमा तीन दर्जन कवियों में एक भी दलित या स्त्री-कवि का शामिल न हो पाना मुख्यधारा की असलियत को सामने लाने वाला है। स्पष्ट ही हाशिए की आवाज को दबाने की यह एक खुली दबंगई है। इस पर भी बहस-तलब होने की जरूरत है।

लेखक चन्द्रेश्वर कवि एवं आलोचक हैं.

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