प्रिय यशवंत भाई, आरुषि मर्डर केस को मीडिया, ख़ासतौर से हर क़ीमत पर ख़बरें दिखाने वाले तेज़ तर्रार न्यूज़ चैनलों पर पिछले कई साल से सिर्फ देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री के तौर पर परोसा गया। अपनी नौकरी के दौरान कई बार इस ख़बर को बड़ी ही मेहनत से कवर किया लेकिन जब-जब फाइल करने की बारी आई तो शायद हमारी डेस्क या चैनल की पॉलिसी हमारी स्टोरी लाइन से मैच ना कर पाई। एक बार बड़ी ही मुश्किल से नोएडा के सरकारी अस्पताल में हुए पोस्टमार्टम की सच्चाई को बेनक़ाब करने के लिए स्टोरी फाइल की, मगर स्टोरी एयर ना हो सकी। यशवंत भाई इसी तरह की घुटन नौकरी के दौरान अक्सर रही, जिसका इलाज सिर्फ यही नज़र आया कि एक मंच अपना भी हो भले ही छोटा क्यों ना हो। यही सोच कर हिंदी साप्ताहिक दि मैन इन अपोज़िशन लांच किया था। आज जब ग़ाज़ियाबाद की सीबीआई अदालत ने तलवार दम्पति को लेकर फैसला सुनाया तो अनायास अपना अंक याद आ गया। भाई आपको इस अंक के पेज के साथ अपनी बात शेयर कर रहा हूं।
अपनी नौकरी के दौरान देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री के नाम से मशहूर आरुषि हत्या कांड को जब-जब हमने किसी भी चैनल पर चलाने की कोशिश की तो कहीं ना कहीं ऐसा लगा कि हमारी स्टोरी और चैनल पर स्टोरी को दिखाने के पैमाने अलग थे। जैसे-तैसे करके जब हमने अपना हिंदी समाचार पत्र लांच किया और 3 जनवरी 2011 को अरुषि हत्या कांड पर स्टोरी लिखी। आज जब सीबीआई अदालत ने इस मामले पर तलवार दम्पति पर केस चलाने की बात कह डाली तो अचानक अपना उस दिन का अंक याद आ गया। इसी को पोस्ट कर रहा हूं। दरअसल नोएडा के सरकारी अस्पताल में इस मामले में हुए पोस्टमार्टम से लेकर पूरी जांच को प्रभावित करने वाले एक दो लोग नहीं थे। लेकिन ये सब लोग किस बंधन या समझौते के तहत एक दूसरे को मदद करते रहे कि मर्डर मिस्ट्री उजागर ना हो सके और देशभर के बड़े-बडे चैनलों की बड़े-बड़े तेज़ तर्रार रिपोर्टर इसे सिर्फ सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री के नाम से जनता के नाम से परोसते रहे। किसी ने भी ये कोशिश नहीं कि एक आम हत्या की तरह इसके तमाम हालात और वाक़यात पर ग़ौर करें। बहरहाल नौकरी के दौरान हमारे चैनल ने हमारी थ्योरी को पानी नहीं दिया तो लगभग डेढ़ साल पहले अपने निजी समाचार पत्र में अपनी स्टोरी फाइल की और आज लग रहा है कि रिपोर्टिग बड़ी बात है।

आज़ाद ख़ालिद
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