तीन दिन पहले कांग्रेस के मशहूर छुट्टा नेता दिग्विजय सिंह खासी लम्बी-लम्बी हांक रहे थे। बोले :- मुसलमानों पर कांग्रेस खासी संजीदा है। अक्लियत को लेकर पार्टी ने कई बेहतर योजनाएं तैयार की हैं और इस कौम की बेहतरी के लिए कांग्रेस ने उन्हें इस बार के चुनाव में ज्यादा सीटें देने का फैसला किया है। दिग्विजय सिंह जिससे मुखातिब थे, अचानक ही उस शख्स ने पहलू बदला और दो-टूक जवाब देकर दिग्गी की बोलती बन्द कर दी। कहा :- यहां हम सिर्फ तालीम और दीन की वकालत करते हैं। पालिटिक्स में आप क्या करते हैं या क्या करेंगे, हमें इससे कोई मतलब नहीं। यह अप्रत्याशित जवाब था जिसने दिग्गी की रंगत उड़ा दी, उन्हें कोई दूसरा रास्ता ही नहीं सूझा। पूरी तरह पटरी से उतर चुकी बात को वहीं पर छितरा पड़ा देखते रहे और बस चंद लम्बे बाद इधर-उधर की बेमतलब बात के बाद अपना सा मुंह लेकर वापस लौट आये।
इस शख्स का नाम था मौलाना सैयद मोहम्मद राबे हसनी नदवी। ऐसा नहीं है कि नदवी ने यह जवाब केवल दिग्विजय सिंह को ही दिया हो, या किसी राजनेता के ऐसे व्यवहार पर वे पहली बार इस तरह पेश आये हों। मौलाना ने हमेशा ही राजनीति से दूरी बनाकर अपने दायित्वों का ऋषि-वत पालन किया है। धाकड़ या बेलौस-बेअन्दाज भी नहीं, दरअसल, बेहद शांत स्वभाव के हैं नदवी। ज्यादातर वक्त तो उनका अध्ययन में ही बीतता है। बातचीत में संयत और बेहद कम बोलने वाले शख्स की पहचान है उनकी। लेकिन वे जब बोलते हैं तो बेहद कम शब्दों में ही सही, मगर इतना सटीक बोलते हैं कि सामने वाले की बोलती बन्द हो जाए।
रायबरेली के तकियाकलां में पहली अक्तूबर-1929 को मां उम्मतुल अजीज और पिता सैयद रशीद अहमद हसनी के घर जन्मे थे नदवी। गौरतलब है कि उनकी मां मौलाना सैयद अबुल अहसन ली नदवी की बहन थीं, जो इसके पहले तक नदवा कालेज में रेक्टर थे। शुरुआती शिक्षा घरेलू मकतब में ही हुई। इसके बाद उन्होंने नदवातुल उलेमा में आगे की पढ़ाई की और सन 49 में वे यहीं पर सहायक अध्यापक हो गये। यहीं से उन्होंने फजालत की डिग्री हासिल की। यह बात है सन-58 की। वे देवबन्द से हिजाज का ओहदा हासिल कर चुके हैं।
सच बात तो यह है कि राबे हसनी नदवी का मिजाज काफी कुछ अपने मामू मौलाना सैयद अबुल हसन अली नदवी उर्फ अली मियां पर गया है। ठीक वैसा ही अंदाज, वैसी ही सोच, वैसा ही लहजा और वैसी ही प्रशांति। जानकार बताते हैं कि यह नदवा कालेज के माहौल का असर है। मौलाना नदवी अरबी विभाग के अध्यक्ष और इसी फैकल्टी के अधिष्ठाता का भी काम देख चुके हैं। अरबी में अपने योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिल चुका है। शिक्षा में उनके लम्बे योगदान के चलते सन 93 में उन्हें नदवातुल उलेमा कालेज का मोहतमिम यानी कुलपति बनाया गया और सन-99 में वे यहीं पर नायब नाजिम यानी कुलाधिपति बन गये। इसके एक साल बाद ही मौलाना अली मियां के निधन के बाद उन्हें इस दार-उल-उलूम का सर्वोच्च ओहदा यानी नाजिम उर्फ रेक्टर के पद से नवाजा गया। यह तो था इल्म का पहलू। जबकि इसके पहले ही 23 जून, सन-02 को उन्हें हैदराबाद अधिवेशन में आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का अध्यक्ष तब चुन लिया गया जब मौलाना काजी मुजाहिदुल इस्लाम काजमी का निधन हो गया। वे आज भी इस ओहदे पर कायम है। वे मक्का, लंदन, रियाद समेत कई देशों के प्रमुख दार-उल-उलूम के मुखिया या उपाध्यक्ष रह चुके हैं। लेकिन रायबरेली के मकतब उनके प्रिय हैं। यहां के कई संस्थानों में वे मुखिया हैं।
82 साल के हो चुके मौलाना मौका पड़ने पर सीधी मगर कड़वी बात कहने से गुरेज नहीं करते। मसलन, उनका कहना है कि डिग्री के नाम पर तालीम तो आयी, लेकिन इंसानियत ने दम तोड़ दिया। परस्पर रिश्ते खात्मे की कगार पर हैं। नदवी साहब रिश्तों में बेवजह बर्फ जमाने के हिमायती नहीं हैं। सन-03 को अयोध्या मसले पर कांचिकामकोटि पीठ के शंकराचार्य जगदगुरू जयेंद्र सरस्वती तक से उन्होंने भेंट की।
लोकसभा चुनावों से ठीक पहले राजनीतिक दलों में मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण को लेकर आपाधापी मची थी। यूपी की सरकार पर काबिज बहुजन समाज पार्टी ने 13 अक्तूबर-08 को लखनऊ में मुस्लिम सम्मेलन आयोजित किया था, जिसमें बड़ी संख्या में मुस्लिम धर्मगुरु व उलेमा शामिल हुए थे। लेकिन तमाम अनुरोधों के बावजूद नदवा कालेज ने केवल अपना एक सहायक अध्यापक ही भेजा और उस प्रतिनिधि ने सम्मेलन में दो-टूक कहा कि उसका वास्ता राजनीति से नहीं, बल्कि सिर्फ दीन और इल्म के मसलों पर ही। जाहिर है तब बसपा के आला नेता केवल थूक गटक कर ही रह गये थे।
मौलाना की साफगोई 21 मार्च-10 को भी देखने को मिली जब उन्होंने पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से शरीयत में हस्तक्षेप का विरोध करते हुए गैर-मुस्लिमों में इस बारे में फैली गलतफहमियों को दूर करने की जरूरत बतायी। महिलाओं को मुख्यधारा में लाने की उनकी कोशिशें तब अमल में दिखीं जब 149 सदस्यों वाले बोर्ड में 30 महिलाएं चुनी गयीं। पुरूष समलैंगिकता पर हाईकोर्ट के फैसले के इतर मौलाना से ऐसे रिश्तों को शैतानी और मानवता पर आपराधिक करार दिया। हालांकि उन्होंने साफ किया कि इस मसले पर वे पर्सनल लॉ बोर्ड का वकील खड़ा नहीं करेंगे, लेकिन सरकार को उन्होंने बोर्ड की राय से अवगत जरूर करा दिया।
लेकिन जुलाई- 11 को देवबंद दारूलउलूम के मोहतमिम वस्तानवी के मसले पर मौलाना ने देवबंद जाने तक से किनारा कर लिया। मौलाना पर परिवार-
नियोजन का खुलेआम विरोध करने पर भी सवालात उछले जब उन्होंने प्रख्यात शिया-गुरू कल्बे सादिक के इस बारे में पर्सनल लॉ बोर्ड में लाये गये प्रस्ताव का भी विरोध किया, जिसके चलते मौलाना सादिक ने आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा तक दे दिया था।
लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों एस टीवी के यूपी ब्यूरो प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं. उनका यह लेख लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स अखबार में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.


