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कांग्रेस में इस्तीफे नहीं, बगावत चाहिए

चार मंत्रियों के इस्तीफों की अपुष्ट खबरें हवा में लहरा रही हैं। पहली बात तो यह कि आज के ज़माने में ऐसा नेता ढूंढना ही असंभव है जो स्वेच्छा से मंत्री पद छोड़ दे। इसी पद के लिए तो वे राजनीति में आए हैं। मंत्री पद ही ब्रह्म है, बाकी सब मिथ्या है। यह ब्रह्मज्ञान हर नेता को होता है। मंत्री पद छूटना और प्राण छूटने में ज्यादा अंतर नहीं है। मंत्री पद छूटते ही घर की डाल पर बैठे सारे पंछी उड़ जाते हैं। नेताजी के मुंह पर मक्खियां भिनकने लगती हैं। सत्ता और पत्ता, दोनों का खेल खत्म हो जाता है। फिर नेताजी खाली झुनझुना बजाते रह जाते हैं। उन्हें पार्टी का कोई भी पद दे दीजिए, वह मंत्री पद जितना रसीला हो ही नहीं सकता। यदि होता तो आज तक कोई प्रधानमंत्री अपना पद छोड़कर पार्टी अध्यक्ष क्यों नहीं बना?

चार मंत्रियों के इस्तीफों की अपुष्ट खबरें हवा में लहरा रही हैं। पहली बात तो यह कि आज के ज़माने में ऐसा नेता ढूंढना ही असंभव है जो स्वेच्छा से मंत्री पद छोड़ दे। इसी पद के लिए तो वे राजनीति में आए हैं। मंत्री पद ही ब्रह्म है, बाकी सब मिथ्या है। यह ब्रह्मज्ञान हर नेता को होता है। मंत्री पद छूटना और प्राण छूटने में ज्यादा अंतर नहीं है। मंत्री पद छूटते ही घर की डाल पर बैठे सारे पंछी उड़ जाते हैं। नेताजी के मुंह पर मक्खियां भिनकने लगती हैं। सत्ता और पत्ता, दोनों का खेल खत्म हो जाता है। फिर नेताजी खाली झुनझुना बजाते रह जाते हैं। उन्हें पार्टी का कोई भी पद दे दीजिए, वह मंत्री पद जितना रसीला हो ही नहीं सकता। यदि होता तो आज तक कोई प्रधानमंत्री अपना पद छोड़कर पार्टी अध्यक्ष क्यों नहीं बना?

भारत की पार्टियां सोवियत या चीनी कम्युनिस्ट पार्टियों की तरह नहीं होतीं, जहां राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पार्टी महासचिव के अनुचरों की तरह काम करते हैं। वहां पार्टी ऊपर होती है और सरकार नीचे होती है। भारत-जैसे लोकतांत्रिक देशों में मामला एकदम उल्टा होता है। इसीलिए जब कोई मंत्री कहता है कि वह सरकार छोड़कर पार्टी में जाना चाहता है तो उसका स्वागत होने के बजाय उस पर शक होने लगता है। यह शक कि कहीं वह अपने मंत्रलय के काम-काज में अयोग्य तो सिद्घ नहीं हो गया है या किसी बड़े धांधले में पकड़ा जानेवाला तो नहीं है या प्रधानमंत्री और उसके बीच कोई भारी खटपट तो नहीं हो गई है।

जिन चार मंत्रियों के इस्तीफों की खबर उठ रही है उनमें से किसी पर भी उक्त शंका नहीं की जा सकती है। वे सुयोग्य हैं और उनकी छवि भी अच्छी है। यह हो सकता है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों की जिम्मेदारी सलमान खुर्शीद अपने सिर लेना चाहते हों। कोई पानीदार आदमी नेता होने के बावजूद इतना नाजुक-मिजाज तो हो ही सकता है लेकिन मूल प्रश्न यह है कि चार क्या, 40 मंत्री भी इस्तीफा दे दें और कांग्रेस पार्टी में सक्रिय हो जाएं तो वे क्या कर लेंगे? इन मंत्रियों के इस्तीफों की तुलना न तो कामराज प्लान से की जा सकती है और न ही लालबहादुर शास्त्री के इस्तीफे से। कामराज प्लान के पीछे इंदिरा गांधी की दूरगामी रणनीति थी। वे पार्टी का सत्ता-समीकरण बदलना चाहती थीं और रेलमंत्री शास्त्रीजी के इस्तीफे के पीछे शुद्घ आदर्शवाद था। क्या इन मंत्रियों के इस्तीफों के पीछे इस तरह के कारण कहीं दूर-दूर तक हो सकते हैं? अच्छा हुआ कि कुछ मंत्रियों ने इस्तीफों के सवाल पर गोलमोल जवाब दे दिए हैं।

लेखक वेद प्रताप वैदिक पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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