उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और वर्तमान में सरकारी संस्था ‘भारतीय प्रेस परिषद’ के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू ने विगत दिनों अपने एक आलेख में 90 फीसदी भारतीयों को मूर्ख बताया। वे उदाहरण भी उन्होंने गिनाए हैं जिनके आधार पर उन्होंने ऐसा कहा। इस पर लोग दो खेमों बंट गये हैं। दोनों ही खेमों से जबरदस्त प्रतिक्रियाएं आयीं हैं, कोई उनकी बातों को सही बता रहा है तो कोई उन्हें अहंकारी बता रहा है। उन्होंने जो कारण बताए हैं वे मुख्यतः अंधविश्वास, सांप्रदायिकता और सामंतवाद-रूढीवाद से जुड़े हैं। काटजू को उनकी विद्वता, बेबाकी और साहस के लिए जाना जाता है। उनकी बातों को लोग गंभीरता से लेते भी हैं। उन्होंने जिन 90 प्रतिशत लोगों को मूर्ख बताया है, वे निम्न और मध्य वर्ग के होंगे। इन्हें काटजू की बात को गंभीरता से लेना चाहिए और आत्मनिरीक्षण करते हुए जरूरी सुधार अपने में करना चाहिए। अंधविश्वास के कारण समाज काफी बुरी दशा में है, लेकिन इसे दूर करने का प्रयास किसी भी स्तर पर गंभीरता से व्यापकता में नहीं हुआ है। काटजू के बहाने यह काफी चर्चा में हैं इस पर बहस और तेज होनी चाहिए।
हमारे समाज और राष्ट्र की बदहाली का लोगों का अपना अंधविश्वास ही कारण नहीं है। पूरी व्यवस्था ही झूठ, फरेब, छल-कपट, नौटंकियों पर टिकी हुई है। इसमें सुधार के नुस्खे लेकर तरह-तरह के रंगे सियार यहां आते रहे हैं और बताते रहे हैं कि ऐसा करने से व्यवस्था ठीक हो जाएगी, वैसा करने से हालात ठीक हो जाएंगे। पिछले दिनों अन्ना हजारे और स्वंभू बाबा रामदेव भी भ्रष्टाचार, लोकपाल और विदेश में जमा काले धन को मुद्दा बनाकर आंदोलन चलाए थे, इन्होंने मीडिया मैनेजमेंट के जरिये करोड़ों लोगों को अपने साथ जोड़ लिया। ऐसा माहौल बना दिया जैसे इन दोनों चीजों के हो जाने से सारी समस्याओं का हल हो जाएगा। यद्यपि उस समय भी सरकार ने आंदोलनकारियों को जनता मानने से इनकार कर दिया और संसद की साठवीं वर्षगांठ पर विशेष सत्र में भी अपने को सगर्व जनप्रतिनिधि बताने वालों ने अन्ना और रामदेव के आंदोलन में शरीक करोड़ों लोगों को तुच्छ समझते हुए उसे ‘भीड़’ कहा जनता को महत्वहीन करार देते हुए अपने को, संसद को सर्वोच्च बताया।
अनेक सुधारवादियों ने अनेक विषयों को लेकर आंदोलन चलाए, लोगों को समस्याओं के मूल बताए लेकिन दिक्कत यह रही कि समस्या की जड़ जहां रही वहां उन्होंने निर्णायक प्रहार नहीं किया। एक समय फ्रांस, रूस और चीन में समस्याओं की जड़ को खत्म किया गया और पूरी तत्कालीन व्यवस्था को तहस-नहस करके नई व्यवस्था बनाई गई। लेकिन कुछ समय बाद उसमें भी नई-नई विकृतियां आयीं। जहां तक अंधविश्वास की बात है वह आज का या दो-चार सौ साल का इतिहास नहीं है। ईसा पूर्व जब आर्य यहां आये उन्होंने तरह-तरह के अंधविश्वासों को पैदा कर और जनमानस में स्थापित कर अपनी सत्ता कायम की तभी राजा को भगवान का अवतार बताया गया। इतिहास में हमारे यहां राजा को भगवान का अवतार माना जाता था और करीब एक दशक पहले नेपाल में राजा वीरेंद्र की हत्या उनके परिवार के सदस्यों सहित कर दी गई, जिसका सच आज तक सामने नहीं आया लेकिन माना जाता है कि हत्या में उनके भाई ज्ञानेंद्र और भतीजा पारस शामिल थे। वीरेंद्र को भी भगवान विष्णु का अवतार माना जाता था। आर्यों ने ही यहां देवी-देवता और भगवान पैदा किए। तब से देवी-देवताओं की संख्या लगातार बढ़ती गई और शासकों को लगातार देवी-देवताओं, भगवानों, भूत-प्रेतों और अन्यान्य अदृश्य शक्तियों के विश्वास ने जबरदस्त मदद दी इसलिए इस विश्वास को निरंतर न केवल बनाए रखा गया, बल्कि इसे लगातार प्रोत्साहित किया गया। दूसरी ओर मनुष्य के ज्ञान प्राप्त करने, स्वतंत्र चिंतन को लगातार हतोत्साहित किया गया। धर्म, अध्यात्म आदि खरबों रुपये का कारोबार है। आमतौर पर किसी भी जनप्रतिनिधि को जनता की समस्याओं से कोई मतलब नहीं होता है, राजनीति में आमतौर पर लोग अपना भला करने के लिए आते हैं, जो यह कहते हैं कि वे जनसेवा के लिए राजनीति में आए हैं वे आंशिक सत्य बोलते हैं। उसी प्रकार धर्म-अध्यात्म के क्षेत्र में काम करने वाले लोग भी जनसेवा नहीं करते। हो सकता है कि शुरुआती दिनों में मन निर्मल रहता हो और उत्साह रहता हो, लेकिन धीरे-धीरे उनके शुरुआती विचार बदल जाते हैं।
तो काटजू महोदय अंधविश्वास लिए देश की 90 प्रतिशत आबादी को बेवकूफ बताकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते हैं। बात सही होते हुए भी अपूर्ण है। इसे उन्हें समग्रता में व्यक्त करना चाहिए और इसके साथ ही उन्हें अपने जैसे कुछ साहसी और बेबाक लोगों को इस बेबकूफी के खिलाफ लामबंद कर अंधविश्वास के खिलाफ बिगुल फूंकना चाहिए। वे मीडिया में व्याप्त बुराइयों से चिंतित हैं, इसके लिए वे ईमानदार पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को गोलबंद कर मोर्चा खोल सकते हैं। किस मीडिया संस्थान में क्या घपले चल रहे हैं उन्हें यह भी उजागर करना चाहिए। अंधविश्वास के खिलाफ दिल्ली प्रेस पत्र प्रकाशन की पत्रिकाओं ‘सरिता’ आदि ने जागरूकता फैलाई लेकिन प्रख्यात पत्रकार और कथाकार कमलेश्वर के संपादन में 1980 के दशक में निकली ‘गंगा’ पत्रिका में छपी एक रिपोर्ट से हमें यह पता चला कि जीवन पर्यंत अपनी पत्रिकाओं के माध्यम से अंधविश्वास के खिलाफ अभियान चलाने वाले और इसके लिए अनेक मुकदमों का सामना करते रहे दिल्ली प्रेस पत्र प्रकाशन के स्वामी विश्वनाथ और उनके कर्मचारी उस साईकिल की पूजा किया करते थे, जिस पर अपने शुरुआती दिनों में विश्वनाथ पत्रिकाएं ढोकर वितरण केंद्रों तक ले जाते थे। कमलेश्वर ने कई और प्रकाशन संस्थानों को भी ‘गगा स्नान’ (संबंधित स्तंभ का नाम) कराया था। काटजू साहब अभी एक नख-दंतविहीन मगर संवैधानिक संस्था के प्रमुख पद पर हैं और मीडिया संस्थानों के कुकर्मों को प्रेस परिषद के जरिये न सही व्यक्तिगत स्तर पर उघाड़ सकते हैं।
अगर समस्याओं पर चोट करनी हो तो काटजू साहब यह चोट भी कर सकते हैं कि अदालतों में वकील फीस के चक्कर में मुकदमों को लंबा खींचते हैं और मुअक्किलों को खूब लूटते हैं। बहुत पहले अल्लामा इकबाल ने लिखा भी था-मुअक्किल छूटे उनके पंजे से तो कौम-ए-मरहूम के सर हुए….। काटजू साहब न्यायिक, प्रशासनिक, राजनीतिक, धर्म, निजी, कारपोरेट आदि संस्थाओं के करीब रहे हैं उन्हें इनकी असलियत मालूम होगी, वे इनके बारे में सच-सच देश की जनता को बता सकते हैं। वे कारपोरेट कुकर्मों की पोल खोल सकते हैं। हम उनसे उम्मीद करते हैं कि वे भारत की एक-एक समस्या की सूची बनाएं और उस समस्या के मूल कारण को देश के सामने रखें। समस्याओं के मूल कारणों को खत्म करने का प्रयास प्रारंभ करें तो और बेहतर होगा। अगर काटजू आगे ऐसा नहीं करते तो हम यही समझेंगे कि कई समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए उन्होंने एक और समस्या में उलझा दिया।
लेखक अयोध्या प्रसाद ‘भारती’ पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. वे रुद्रपुर से प्रकाशित साप्ताहिक पीपुल्स फ्रैंड के संपादक हैं.


