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काटजू साहब, अकु श्रीवास्‍तव, रवि प्रकाश नहीं बिहार में एकमात्र संपादक हैं स्‍वयं प्रकाश

दरअसल ये विडम्बना है कि नीतीश कुमार जैसे व्यक्ति पर मीडिया को मैनेज करने का आरोप लग रहा है. मैं उनका कायल भी हूँ. आखिर उन्होंने ये साबित तो कर दिया कि पत्रकारिता में दलाली नीचे के लोग ही नहीं करते, ऊपर वाले ज्यादा शामिल रहते है. जहाँ तक अघोषित सेंसर के बात है तो यह बात सही भी है, अगर नहीं है तो फिर आइये पांच महीने पहले या उससे कुछ और महीने पहले की कुछ घटनाओं पर प्रकाश डालते है. अकु श्रीवास्तव का होगा तबादला, इसकी जानकारी सभी हिंदी मीडिया वेबसाइट पर चली, आज हो ही गया. अकु श्रीवास्तव ना सिर्फ एक अच्छे पत्रकार हैं, वरण प्रबंधन का गज़ब गुर उनमे है, पर नीतीश के आगे तो नहीं चली.

दरअसल ये विडम्बना है कि नीतीश कुमार जैसे व्यक्ति पर मीडिया को मैनेज करने का आरोप लग रहा है. मैं उनका कायल भी हूँ. आखिर उन्होंने ये साबित तो कर दिया कि पत्रकारिता में दलाली नीचे के लोग ही नहीं करते, ऊपर वाले ज्यादा शामिल रहते है. जहाँ तक अघोषित सेंसर के बात है तो यह बात सही भी है, अगर नहीं है तो फिर आइये पांच महीने पहले या उससे कुछ और महीने पहले की कुछ घटनाओं पर प्रकाश डालते है. अकु श्रीवास्तव का होगा तबादला, इसकी जानकारी सभी हिंदी मीडिया वेबसाइट पर चली, आज हो ही गया. अकु श्रीवास्तव ना सिर्फ एक अच्छे पत्रकार हैं, वरण प्रबंधन का गज़ब गुर उनमे है, पर नीतीश के आगे तो नहीं चली.

दूसरी घटना, रवि प्रकाश के नेतृत्व में निकले जा रहे जागरण ब्रांड आई नेक्स्ट पर नीतीश बिफर पड़े थे, कहा था कि क्या है ये अखबार, अत: रवि प्रकाश को हिंदी बेल्ट से दूर बंगाल भेज दिया गया. अब वहा सड़ते रहें वो. हिंदी बेल्ट में चार अखबार है पहले हिन्दुस्तान, वो तो उनको रखने से रहा. दूसरा जागरण, तो मालिकों की असीम कृपा है कि नौकरी ना गयी भाई साहब की. तीसरा प्रभात खबर…. कदापि नहीं…. ये तो हो ही नहीं सकता, मैं जिस शहर का रहने वाला हूँ, कभी वहां रवि जी प्रभात खबर के आरई हुआ करते थे. हालाँकि देवघर एडिशन विवादों से भरा रहा है. 2004 से लेकर आज तक लगभग आठ सालों में वहां पांच-छह संपादक बदले गए है. और भास्कर तो बिहार में है नहीं, झारखण्ड में श्री मान ने खुद दामन छोड़ा है. कुल मिलाकर अब रवि जी की बिहार/झारखण्ड में वापसी संभव नहीं है. हाँ जागरण में रास्ता है, पर झारखण्ड में आने का, पर देखिये नीतीश के डंडे की चोट कब तक रहती है.

अब आइये, तृतीय एपिसोड पर, जो की श्री स्वयं प्रकाश जी की है. लगभग यही कुछ आठ महीने पूर्व खबर पता चली थी कि स्वयं प्रकाश ने प्रभात खबर से इस्तीफा दे दिया. बाद में इस घटना को बीमारी बता दिया गया. अब यार दिल्ली के मीडिया वाले इतने तो कामचोर नहीं होंगे कि श्री स्वयं प्रकाश जी दिल्ली में इलाज करवाएं और उन्हें लोग खोज ना पायें. सात समुन्दर पार अमेरिका में युवराज़ ने इलाज करवाया सो मीडिया ने खोज निकला, तो भाई बिहारी पत्रकारों के लिए तो स्वयं जी बिहार के युवराज़ तो है ना. चलो कोई बात नहीं, ना ही इस्तीफा हुआ और ना प्रभात खबर ने उन्हें विदा किया. क्यूं…क्यूं कि वे अभी नीतीश जी के चेहते हैं. जी हाँ दोस्तों ये बड़ी खबर है. हालांकि प्रभात खबर में ये सब लोग जानते हैं, पर कौन बोलोगे भाई. हम तो इसलिए बोल लेते हैं कि हमे और कहीं नौकरी मिल ही जाती है, नहीं तो पंडित जी है, पीठ ठोंक कर भी बाबा की नगरी में दाल-रोटी चला सकते है, पर मुह बंद नहीं रख सकते.

पत्रकारिता खून में है, और गर्व है की इमानदार पत्रकार का बेटा हूँ. मेरे पिताजी देवघर के एक मात्र ऐसे पत्रकार है जिन्हें आज से 23 वर्ष पूर्व बिहार पत्रकारिता संस्थान ने यंग और ईमानदार पत्रकारिता करने का पुरस्कार दिया था, उसके बाद आज तक यह पुरस्कार देवघर में किसी को नहीं मिला है. खैर छोडिये, आइये मूल मुद्दे पर, कि आखिर रवि प्रकाश, अविनाश, सुशील भारती, राघवेन्द्र (मेरी नज़र में अभी तक इनलोगों ने कभी दलाली नहीं की है) को क्यूं प्रभात खबर ने पटना में मौका नहीं दिया. और तो और खुद प्रभात खबर के पूर्व कार्यकारी संपादक ओम प्रकाश अश्क, जो अभी हिंदुस्तान धनबाद में हैं, उन्हें ही स्टेट हेड बना देते. क्या हो जाता. इन सबों में श्री अश्क जी तो सबसे सीनियर हैं, उन्हें प्रभात खबर ने क्यूं मौका नहीं दिया. ये कहीं ना कहीं नीतीश फैक्टर है. काटजू जी की बात में दम तो है, पर तीनों अख़बार, छोटे को छोड़ दीजिये, वेसे भी भारतीय समाज में छोटों को और उनकी बातों को नज़र अंदाज़ करने का रिवाज़ है. काटजू जी की बात को कभी मानने के लिए तैयार नहीं होगा.

लेखक उदय शंकर खवाड़े पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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