Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

ये दुनिया

कार्टून वाले बाल ठाकरे की कूंची

लखनऊ के अम्‍मा का घर और मुम्‍बई के मातोश्री के बीच का रास्‍ता बहुत फसादी है। रूसी भाषा की प्रोफसर साबरा हबीब वाले अम्‍मा का घर नामक मकान में समाज के निर्माण की चादर बुनी जाती है, जबकि बाल ठाकरे के मातोश्री में साजिशों और सामाजिक विखंडन की बिसात बिछ रही है जहां सिर्फ होती है बाल ठाकरे और उनके बाद महाराष्‍ट्र और पूरे देश की राजनीति, बरास्‍ता मुम्‍बई, की राजनीतिक उठापटक। जिन्‍दगी भर कार्टूनिस्‍ट बाल ठाकरे ने जातीय राजनीति का आंवा फूंका है, वहां अब मातोश्री से बंटी दोनों शाखाएं धौंकनी की तरह चल रही हैं लेकिन बाल ठाकरे की सांसें वेंटिलेटर पर। गैर-हिन्‍दू राजनीति के झंडाबरदार बाला ठाकरे का इलाज अब डॉक्‍टर जलील पार्कर के हाथों में है।

लखनऊ के अम्‍मा का घर और मुम्‍बई के मातोश्री के बीच का रास्‍ता बहुत फसादी है। रूसी भाषा की प्रोफसर साबरा हबीब वाले अम्‍मा का घर नामक मकान में समाज के निर्माण की चादर बुनी जाती है, जबकि बाल ठाकरे के मातोश्री में साजिशों और सामाजिक विखंडन की बिसात बिछ रही है जहां सिर्फ होती है बाल ठाकरे और उनके बाद महाराष्‍ट्र और पूरे देश की राजनीति, बरास्‍ता मुम्‍बई, की राजनीतिक उठापटक। जिन्‍दगी भर कार्टूनिस्‍ट बाल ठाकरे ने जातीय राजनीति का आंवा फूंका है, वहां अब मातोश्री से बंटी दोनों शाखाएं धौंकनी की तरह चल रही हैं लेकिन बाल ठाकरे की सांसें वेंटिलेटर पर। गैर-हिन्‍दू राजनीति के झंडाबरदार बाला ठाकरे का इलाज अब डॉक्‍टर जलील पार्कर के हाथों में है।

कई महीनों से उन्‍हें लगातार नली के माध्यम से तरल आहार दिया जा रहा है। जबकि बुधवार की रात से ही उनका हिलना-डुलना और बोलना पूरी तरह बंद है। बताया गया है कि उनका गुर्दा बेकार हो चुका है। पुलिस और नगर निगम ने ठीक उसी तरह की तैयारियां कर ली हैं, मानो सूरज डूबने ही वाला है। शिवसैनिक भी सड़क पर हैं। न जाने क्‍यों, लेकिन वे अब बहुत गुस्‍से में हैं। ठाकरे को देखने मातोश्री पहुंचे अमिताभ बच्‍चन और अभिषेक के साथ हाथापाई की खबर है, जिसमें बिग-बी के कपड़े फाड़ दिये गये। चोटें अभिषेक को भी आयीं हैं। उधर राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपना मुम्‍बई दौरा रद कर दिया है, जहां उन्‍हें जमनालाल बजाज पुरस्कार बांटना था।

कभी बेइंतिहा जोश और सकारात्‍मकता की अपनी जबर्दस्‍त पारी खेलने वाले बाल ठाकरे का सूरज अब अस्‍ताचल पर है। बाल ठाकरे को समझना हो तो पहले उनके करीबी दोस्‍त आरके लक्ष्‍मण के नजरिये से देखिये ना। ठाकरे ने देश के इतिहास के सर्वाधिक सम्‍मानित पत्रकार और कार्टूनिस्‍ट आरके लक्ष्‍मण के साथ फ्री प्रेस जर्नल में बतौर कार्टूनिस्‍ट काम शुरू किया था। उसी दौरान संवेदना और सार्थक निर्माणशीलता की बेमिसाल आरके लक्ष्‍मण ने एक बार कहा कि बाल ठाकरे में अदम्‍य क्षमता और नेतृत्‍व है, लेकिन दिक्‍कत यह है कि बाल ठाकरे की राजनीतिक समझ ने उन्‍हें खुद को ही एक संकरी में कोठरी में समेट लिया, जहां उनकी क्रियाशीलता सड़ांध में बदल गयी। लक्ष्‍मण और बाल ठाकरे में शायद यही फर्क रहा, जिसके चलते एक ने जहां शीर्षता हासिल कर ली, तो दूसरे ने पूरे जीवन भर देश-विदेश में अपनी निंदा कमायी ही नहीं, बल्कि पूरी सामाजिकता में नासूर जैसे गहरे घाव भी पहुंचाये। लक्ष्‍मण ने जहां अपनी कूंची से देश की राजनीति और समाजिक मसले पर हस्‍तक्षेप किया, वहीं बाल ठाकरे ने अपनी खालिस जहरबुझी बोली में देश में सामाजिकता का ऐसी कार्टूननुमा आग लगा डाली, जिसे बुझा पाना सदियों में भी मुमकिन नहीं।

केवल अपनी कटु-उक्तियों और क्षेत्र व जाति-विशेष के नाम पर दूसरों के खिलाफ आक्रामक माहौल बनाने वाले ठाकरे का पूरा नाम बालासाहेब केशव ठाकरे है। तब के बाम्‍बे प्रेवीसेंस नामक इलाके के पुणे में सन 26 की 23 जनवरी को मराठी परिवार में जन्‍मे बाल ठाकरे के हौसले शुरू से ही बुलंद थे। राजनीतिक समझ भी सटीक थी, जो विरासत में अपने पिता केशव सीताराम ठाकरे से मिली। दरअसल, केशव ठाकरे देश के भाषाई अस्मिता का संघर्ष चलाते थे और अपने वक्‍त में उन्‍होंने मराठी भाषा के नाम पर संयुक्‍त महाराष्‍ट्र आंदोलन चलाया। आज का महाराष्‍ट्र का नक्‍शा उनके विचारों और प्रयासों से भी वजूद में है। लेकिन जैसे-जैसे वक्‍त बदलता गया, बाल ठाकरे की महत्‍वकांक्षा कार्टूनिस्‍ट के बजाय, राजनीतिक हैसियत पाने की दिशा में बढ़ गयी। एक तरफ पिता की राजनीतिक थाती, और दूसरी ओर फ्री प्रेस जर्नल अखबार में तीखी सोच ने रंग चढ़ा दिया। अपने दौर का यह सर्वाधिक प्रतिष्ठित अखबार था। यह 60 के दशक की बात है। इसके बाद वे टाइम्‍स ऑफ इंडिया में कार्टून बनाने लगे। उनका तीखा मिजाज जब लोगों को अखरा तो उन्‍होंने मार्मिक नाम की एक कार्टून-पत्रिका शुरू कर दी। उनके कार्टून पहले भी आग उगलते थे, लेकिन तब केवल समाज में हो रहे अन्‍याय और असमानता के खिलाफ होता था, ताकि आम लोगों की पीड़ा के प्रति शासकों में अहसास हो सके। तब बाल ठाकरे माध्‍यम थे, पाठक और शासक के बीच सेतु की तरह।

लेकिन जब उनकी डगर माध्‍यम के बजाय खुद अकेले हासिल करने की ख्‍वाहिशों तक समिट गयी, तो उनके यही चुभते तीर विषैले बन गये, स्‍थायी होकर। उन्‍होंने धर्म और उसके प्रतीकों का इस्‍तेमाल करके राजनीति को खेलना शुरू कर दिया। रूद्र-भाव के आक्रामक-भाव को राजनीति में घसीट कर उन्‍होंने अपनी राजनीतिक सोच को ध्‍वंस और मारक हरावल दस्‍ते में बदलने के लिए बाकायदा शिवसेना नामक राष्‍ट्रवादी हिन्‍दू संगठन बनाया जो खासकर राजस्‍थानी, मारवाड़ी, सिंधी समाज समेत उत्‍तर भारतीयों के खिलाफ था। दरअसल, उनका राजनीतिक दर्शन उनके पिता से प्रभावित रहा। उनके पिता केशव सीताराम ठाकरे ‘संयुक्‍त महाराष्‍ट्र मूवमेंट’ के जाने-पहचाने चेहरा थे। बाल ठाकरे के पिता केशव सीताराम ठाकरे ने भाषायी आधार पर महाराष्‍ट्र राज्‍य के निर्माण की नींव तैयार की थी। शिवसेना ने उनके सपनों को साकार करा दिया। मुम्‍बईकरों को उन्‍होंने यह यकीन दिलाने की कोशिश की कि इन्‍हीं गैर-मराठियों के चलते ही मराठियों की रोटी छिन रही है। यह नारा गले में उतरते ही मुम्‍बई की 21 फीसदी मराठी आबादी में खुद के होने का अहसास होने लगा और नौजवानों की हजार तादात शिवसैनिक बन गयी। बनिया यानी बिजनेस क्‍लास में ठेस लगाने की क्षमता तो शिवसेना में आ ही चुकी थी। कुल मिलाकर वे गैर-मराठी विरोधी आंदोलन के शीर्षस्‍थ नेता बन गये। चूंकि मुम्‍बई शुरू से ही आर्थिक राजधानी रही है और इसी चलते देश भर के समुदाय वहां बसते रहे हैं, इससे शिवसैनिकों की गैर-मराठी राजनीति का फौरन संदेश और असर देश भर में पहुंचता रहा।

अखबार की ताकत से बाला ठाकरे खूब अवगत थे, इसीलिए सन 66 में उन्‍होंने मराठी लोगों के अधिकार को लेकर मराठी भाषा में सामना नाम का अखबार शुरू किया। पकड़ और बने, इसके लिए उन्‍होंने दोकासा यानी दोपहर का सामना नामक हिन्‍दी का भी एक अखबार चलाया। और इसके साथ ही मराठों को शिवसैनिक बना कर वे खुद को मराठी शेर बन गये। इसके साथ ही तो ठाकरे ने जिधर भी मनमर्जी हुई, अपने पंजा मारना शुरू कर दिया। गैर-मराठियों को मुम्‍बई में रहने या न रहने वाली उनकी इसी शर्त के बल पर उन्‍होंने कभी हिटलर और लिट्टे के पक्ष में प्रदर्शन किया तो कभी उनको भयभीत किया। अपनी हनक बनाने के लिए उन्‍होंने पाकिस्‍तान क्रिकेट टेस्‍ट रद करवा दिया और स्‍टेडियम की पिच खोद डाली। उनका ऐतराज था पाकिस्‍तान का विरोध और कारण बना पाकिस्‍तानी खिलाड़ी का वह छक्‍का जो शारजाह में लगा था। ठाकरे ने बयान दिया था कि इस छक्‍का से मैं हिल गया हूं। खुद को जमाने के लिए ठाकरे को जमीन चाहिए थी, और इसके लिए उन्‍होंने हर चक्‍कर चलाया। उनका वेलेंटाइन-डे विरोध आंदोलन केवल इसी ख्‍वाहिश की जमीन से उपजा था। फिर क्‍या, मुम्‍बई हिल गयी थी जब रेस्‍टोरेंट में युवक-युवतियों को सड़क पर घसीट कर शिवसैनिकों ने सरेआम पीटा था। अयोध्‍या विवाद पर भड़के मुम्‍बई दंगों पर भी शिवसैनिक ने अपनी रोटियां सेंकी थी। इसी बीच सन 96 की 20 अप्रैल को एक सड़क हादसे में बेटे बिंदुमाधव की मौत हो गयी और चंद दिनों बाद ही उनकी पत्‍नी मीना ठाकरे की भी मृत्‍यु भी। मगर ठाकरे न केवल अविचलित रहे, बल्कि उन्‍होंने अपने हाथ-पांव भी राष्‍ट्रीय राजनीति में पसार दिये।

मुस्लिम विरोधी राजनीति के चलते ही उन्‍होंने हिन्‍दू आत्‍मघाती दस्‍ता बनाने का ऐलान कर पूरे देश में सनसनी मचायी थी। हालांकि उसके दो दशक पहले उन्‍होंने मुसलमानों को कैंसर बता दिया था। हमेशा मराठी मानुष की वकालत करने वाले ठाकरे ने इस आग को खूब हवा दी। लेकिन जल्‍दी ही बाल ठाकरे को बोलना ही पड़ा कि वे हर मुसलमान के खिलाफ नहीं हैं। मगर उनकी यह नरमी ज्‍यादा तक नहीं टिकी। तब की देश की डावांडोल राजनीति का लाभ भी उन्‍हें खूब मिला। अटल बिहारी बाजपेई को सरकार बचाने के लिए शिवसेना की मदद लेनी पड़ी। शिवसेना को बीजेपी साथी का चेहरा मिला और दोनों ने सन 95 में महाराष्‍ट्र विधानसभा चुनाव जीत लिया। अगले पांच बरसों तक मनोहर जोशी महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री बने। अपनी अराजक नीति के चलते 99 को बाल ठाकरे को चुनाव आयोग ने छह साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया। इस पर उन्‍होंने मराठावाद को आग फैलाया और सारा ध्‍यान खासकर बिहार के लोगों पर थोप दिया। वे आग उगले कि एक बिहारी सौ बीमारी। निरीह उत्‍तर भारतीयों पर जमकर हमले और पिटाई हुई। जिसने भी विरोध किया, हमला हुआ। कई चैनल के दफ्तर फूंके और तोडे गये। उनका हमला दक्षिण भारतीयों पर भी हुआ जब उन्‍होंने ‘लुंगी हटाओ पुंगी बजाओ’ आंदोलन छेड़ा। दरअसल, ठाकरे जब भी कमजोर दिखे, उन्‍होंने अपनी आक्रामकता बढ़ा दी। कभी सचिन तेंदुलकर को औकात बताने की धमकी दी तो कभी राष्‍ट्र-कोकिला लता मंगेशकर को वीजा न दिलाने की चेतावनी दे डाली। इतना ही नहीं, सानिया की शादी पर भी उन्‍होंने हस्‍तक्षेप किया और कहा कि सानिया अब पाकिस्‍तानी हैं, भारतीय नहीं। फिल्‍में तो उनके सीधे निशान पर रहती ही रही हैं, क्‍यों कि उनपर हमला करना आसान होता है। बस एक पत्‍थर चला नहीं, कि सिनेमाघर बंद हो जाते हैं और देश भर में चर्चा शुरू हो जाती है। यही तो बाल ठाकरे वाली शिवसेना की न्‍यूसेंस-वैल्‍यू है, जिसे बाल ठाकरे अपनी न्‍यूज-सेंस वाले दिमागी-मर्म से खूब समझते हैं। ताजा मामला है बिहार के लोगों के लिए परमिट सिस्‍टम लागू करना।

तो, यानी अब वक्‍त आ गया है। बाल ठाकरे के साथ ही उनकी आक्रामक राजनीति का भी। आज वे वेंटिलेटर पर हैं, उनके बेटे, पोते और उनके भतीजे भी यह रणनीति अपनाये हुए हैं। राज ठाकरे अब अपना अलग संगठन मनसे चला रहे हैं। इस बंटवारे से शिवसेना की ताकत बहुत कमजोर हुई है। असर मनसे पर भी है। पिछले विधानसभा और महानगर कमेटी चुनाव में शिवसेना और मनसे को करारी चोट खा चुके हैं। इसीलिए वे अब फिर आक्रामकता का जामा पहनने लगे हैं। जबकि दोनों ही एक-दूसरे से बहुत भय खाते हैं। मेल-मिलाप की कोशिशें जब बाल ठाकरे नहीं करा पाये तो उनके वंशज क्‍या कर पायेंगे, यह बड़ा सवाल है, जिसका हल दोनों के पास नहीं। हकीकत यह है कि बदले हालातों में बाल ठाकरे और उनकी आक्रामक सोच भी वेंटिलेटर तक पहुंच ही चुकी है। जाहिर है कि इन दोनों को विदाई-गीत तैयार करने का मौका आ गया है।

लेखक कुमार सौवीर यूपी के जाने-माने और वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्होंने दैनिक जागरण, दैनिक हिंदुस्तान, महुआ समेत कई अखबारों चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम किया है. उनसे संपर्क [email protected] या [email protected] या 09415302520 के जरिए किया जा सकता है. उनका यह लिखा हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट में प्रकाशित हो चुका है.

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

You May Also Like

ये दुनिया

रामकृष्ण परमहंस को मरने के पहले गले का कैंसर हो गया। तो बड़ा कष्ट था। और बड़ा कष्ट था भोजन करने में, पानी भी...

सोशल मीडिया

यहां लड़की पैदा होने पर बजती है थाली. गर्भ में मारे जाते हैं लड़के. राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में बाड़मेर के समदड़ी क्षेत्र...

दुख-सुख

: बस में अश्लीलता के लाइव टेलीकास्ट को एन्जॉय कर रहे यात्रियों को यूं नसीहत दी उस पीड़ित लड़की ने : Sanjna Gupta :...

ये दुनिया

बुद्ध ने कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने...