कथाकार को कभी-कभी अपनी कुर्सी छोड़कर पाठक की कुर्सी पर भी बैठना चाहिए। लेखक को पाठक से साझेदारी करनी चाहिए। जो धीरे-धीरे विकसित होती है। हालांकि पाठक की तरफ से यह देर से पैदा होती है। सन 1959 में ‘सपाट चेहरे वाला आदमी’ कहानी लिखकर जो ‘लहर’ पत्रिका में छपी, अपने कथा लेखन की शुरुआत करने वाले वरिष्ठ कथाकार श्री दूधनाथ सिंह ने इलाहाबाद शहर के रचनाकारों के बीच कहा कि मैं बराबर यह देखता हूँ कि किन-किन कहानियों में असफल हुआ। और यह तय पाया कि जिन कहानियों में फैंटेसी में कहने की कोशिश की, वही असफल हुआ। उन्होंने कहा कि कहानी को वृतांत और व्यौरों से बाहर नहीं जाना चाहिए। कहानी फैटेंसी और प्रतीकों में नहीं व्योरों में होती है और विवरण कहे नहीं जाने चाहिए, बखाने जाने चाहिए। कहने और बखनाने में अंतर है।
अपने वक्तव्य के अन्त में उन्होंने कहा कि मैं गुज़रे जमाने का आदमी हूँ, श्रीकान्त वर्मा की पंक्ति लूं तो ‘जो हमसे नहीं हुआ वह हमारा संसार नहीं है’। वक्तव्य के उपरान्त उन्होंने अपनी अप्रकाशित कहानी ‘क्या करूं साब जी’ का पाठ किया। कहानी के पात्र ओम प्रकाश और श्यामलाल ने सबको बांधे रखा। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, के इलाहाबाद क्षेत्रीय केंद्र द्वारा आयोजित ‘‘मेरी शब्दयात्रा’’ का यह दूसरा आयोजन था। उल्लेखनीय है कि पहले आयोजन में हिंदी के वरिष्ठ कथाकार श्री शेखर जोशी अपना लेखकीय वक्तव्य और कहानी पाठ कर चुके हैं। ‘‘मेरी शब्दयात्रा’’ कार्यक्रम के संयोजक प्रो.संतोष भदौरिया ने कहा कि इस कार्यक्रम का मुख्य ध्येय वरिष्ठ एवं अग्रज पीढ़ी को समकालीन युवा रचनाकारों और साहित्य प्रेमियों से रूबरू कराना है। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से अक़ील रिजवी, ए.ए. फातमी, अनीता गोपेश, नीलम शंकर, रमेश ग्रोवर, श्रीप्रकाश मिश्र, सतीश अग्रवाल, असरार गांधी, सुरेन्द्र राही, अशोक सिद्धार्थ, हिमाशु रंजन, पूनम तिवारी, उर्मिला जैन, धनंजय चोपड़ा, फज़ले हसनैन, अनुपम आनंद, सूर्यनारायण, शशिभूषण, विनोद शुक्ल, शैलेन्द्र प्रताप सिंह, गिरीश कठाने, सतेन्द्र सिंह, फ़खरूल करीम आदि उपस्थित रहे।


