Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

बिजनेस

कौन कहता है बिहार में मीडिया स्वतंत्र नहीं है?

कौन कहता है बिहार में मीडिया स्वतंत्र नहीं है? भले ही सरकार के खिलाफ लिखने की आजादी न हो? लेकिन बोलने की आजादी है? भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू ने बिहार में ही आकर जब यह कह दिया कि था कि लालू जी की सरकार के समय प्रेस को आजादी होती थी, जो वर्तमान सरकार में नहीं हैं। इस पर खूब बवाल मचा। मचना ही था। बात जो पते की थी? भले ही बिहार में पत्रकारों को कथित तौर पर सरकार के खिलाफ लिखने की मनाही हो? लेकिन बोलने की मनाही नहीं दिखती? वह भी चौक-चौराहों पर नहीं बल्कि सरकारी आयोजन यानी बिहार सरकार के आयोजन में? पत्रकारों ने मौके का भरपूर फायदा उठाया और जम कर भड़ास निकाली। मौका था, ’विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ पर सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, बिहार सरकार द्वारा आयोजित, ‘समाजिक बदलाव में मददगार स्वतंत्र मीडिया’ विषय पर विचार गोष्ठी का। गोष्ठी में अधिकांश पत्रकार वक्ताओं ने विषयांतर होते हुए प्रेस की आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ही बोले। जाहिर सी बात है जो बातें स्याह पन्नों पर नहीं संभव प्रतीत नहीं होती दिख रहती थी वह वाणी के माध्यम से मुकाम पायी। हालांकि पटना से प्रकाशित अखबरों ने थोड़ी कैंची चलायी और पत्रकारों की भड़ास मीडिया के माध्यम से पूरी तरह सामने नहीं आ पायी।

कौन कहता है बिहार में मीडिया स्वतंत्र नहीं है? भले ही सरकार के खिलाफ लिखने की आजादी न हो? लेकिन बोलने की आजादी है? भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू ने बिहार में ही आकर जब यह कह दिया कि था कि लालू जी की सरकार के समय प्रेस को आजादी होती थी, जो वर्तमान सरकार में नहीं हैं। इस पर खूब बवाल मचा। मचना ही था। बात जो पते की थी? भले ही बिहार में पत्रकारों को कथित तौर पर सरकार के खिलाफ लिखने की मनाही हो? लेकिन बोलने की मनाही नहीं दिखती? वह भी चौक-चौराहों पर नहीं बल्कि सरकारी आयोजन यानी बिहार सरकार के आयोजन में? पत्रकारों ने मौके का भरपूर फायदा उठाया और जम कर भड़ास निकाली। मौका था, ’विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ पर सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, बिहार सरकार द्वारा आयोजित, ‘समाजिक बदलाव में मददगार स्वतंत्र मीडिया’ विषय पर विचार गोष्ठी का। गोष्ठी में अधिकांश पत्रकार वक्ताओं ने विषयांतर होते हुए प्रेस की आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ही बोले। जाहिर सी बात है जो बातें स्याह पन्नों पर नहीं संभव प्रतीत नहीं होती दिख रहती थी वह वाणी के माध्यम से मुकाम पायी। हालांकि पटना से प्रकाशित अखबरों ने थोड़ी कैंची चलायी और पत्रकारों की भड़ास मीडिया के माध्यम से पूरी तरह सामने नहीं आ पायी।

चर्चा में मीडिया की स्वतंत्रता, मीडिया पर अंकुश, वेज बोर्ड और पत्रकारों की माली हालत ही रही। आज जब बिहार में मीडिया पर अघोषित सेंसर की बात गाहे-बगाहे उठने लगी तब ऐसे में कुछ पत्रकारों का तेवर क्रांतिमयी दिखा। सभागार में फुस्फुसाहट भी हुई। मीडिया की स्वतंत्रता के प्रति सरकार की यह प्रतिबद्धता लोगों को जहां चैंकाया वहीं थोड़ी देर के लिए माहौल को हास्यास्पद बना डाला। खैर, भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संध के प्रतिनिधि चंद्रशेखरन ने कहा कि यूनेस्को को शिकायत मिलने के बाद पहली बार प्रेस की स्वतंत्रता के बारे में घोषणा करनी पड़ी। बिहार में भी प्रेस को लेकर काला कानून आया था। उन्होंने चिंता जाहिर की कि ये कैसी विडंबना है कि अब सुप्रीम कोर्ट पत्रकारों के लिए आचार संहिता बनाने जा रही है। वहीं, भारतीय चैनल और डिस्कवरी चैनल की तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि डिस्कवरी को देखिए वो हमे अंतरिक्ष से लेकर भूतल तक की बातें बताता है और एक भारतीय चैनल हैं जिन्हें सास-बहू, नाग-नागिन और निर्मल बाबा को दिखाने से फुरसत ही नहीं है। मीडिया से गायब होते गाँव पर भी उन्होने चिंता जाहिर की।

चंद्रशेखरन ने भारतीय मीडिया के गिरते स्तर पर चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि एक दिन उन्होंने मुंगेर जिले में हिन्दुस्तान दैनिक के पहले पन्ने की खबर को देखकर दंग रह गए। खबर का शीर्षक था, ‘अब पर्यावरण मुक्त होगा मुंगेर’। उन्होंने कहा कि आज के पत्रकारों को पर्यावरण और प्रदूषण में अन्तर समझ में नहीं आती है। चंद्रशेखरन ने कॉर्पोरेट मीडिया की आलोचना करते हुए कहा, इससे मीडिया के उपर खतरा मंडरा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रेस को चैथा खंभा कहा जाता है और इसे अधिकाधिक स्वतंत्रता मिलनी ही चाहिये

अपने तीखें तेवर से वरिष्ठ पत्रकार अरुण पाण्डेय ने माहौल में थोड़ी हलचल पैदा कर दी। उन्होंने कहा, प्रेस की स्वतंत्रता पर गोष्ठी की जाती है और दूसरी तरफ इस बात पर भी चिंतन चलता है कि मीडिया पर अंकुश कैसे लगे? सुप्रीम कोर्ट हमें हमारी लक्ष्मण रेखा बताने की बात कर रहा है। वहीं, विपक्ष हमें अपना दोस्त बनाना चाहता है और पक्ष हमें अपनी तारीफ करवाना चाहता है? उन्‍होंने कहा कि पिछले दिनों हमें सरकार की ओर से एक पत्र मिलता है कि आपकी खबरों से हमें एतराज हैं, आपकी खबरें हमारे अनुकूल नहीं होती। इस बात को सुनने के बात वहाँ बैठे सरकारी अधिकारी असहज महसूस जरूर करने लगे। लेकिन, सवाल मीडिया की आजादी का जो था? श्री पाण्डेय ने कहा कि मीडिया पर अंकुश लगाने को लेकर कई बार काला कानून बनाया गया।

पत्रकार रजनी शंकर ने मैक्सिको, चीन रूस इत्यादि देशों में मीडिया की चर्चा करते हुए कहा कि दो तिहाई देश मे आज मीडिया पर अंकुश है। उन्होंने कहा कि जब हम अपनी संस्था में ही आजाद नहीं हैं तो कोई बाहरी आदमी हम पर क्या अंकुश लगाएगा। रजनी ने इस बात पर बल दिया कि सिर्फ चर्चा करने से कुछ नहीं होगा पत्रकारों को एकजुट होना होगा। वरिष्ठ पत्रकार बृजनंदन ने कहा कि आज तो हम पत्रकारों की स्थिति तो सबसे बदतर है। उन्होंने सवाल दागा कि क्या प्रेस आजाद नहीं है कि हमें स्वतंत्र प्रेस दिवस मानाने की जरूरत है? मीडिया के उपर उठते सवालों और नजरिये पर बृजनंदन ने खुल कर कहा कि पक्ष को लगता है कि हम विपक्ष के आदमी हैं और विपक्ष को लगता है कि हम पक्ष के आदमी हैं। इन सबों के बीच समाज को लगता है कि हम बिके हुए आदमी हैं, आज तो हमारी विश्वसनीयता पर ही संकट आ गया है। उन्होंने कहा कि हम पत्रकारों को वेतन के रूप में क्या मिलता है यह सब जानते हैं, मरने पर कफन भी वेतन के पैसे से नसीब नहीं होगी। प्रेस स्वतंत्रता दिवस से बेहतर है कि हम गुलाम दिवस मनाएँ।

भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य अरुण कुमार ने कहा प्रेस फ्रीडम एक मिथ है। सोशल मीडिया न रहे, तो कई तरह की सूचनाएं सामने नहीं आ सकती। उन्होंने कहा, “हम काटजू साहब का आज के दिन अभिनन्दन करना चाहते हैं, आज उनकी ही वजह से यह बात बहस का मुद्दा तो बना कि प्रेस है क्या, उसकी जिम्मेवारियां क्या-क्या हैं।“ पहले लोगों मे ये धारणा थी कि भारतीय प्रेस परिषद एक दंतहीन संस्था है, लेकिन आज यह बात झूठी साबित हुई है। उन्होंने कहा कि आज अक्षम लोग भी मीडिया मे आने लगे हैं, जिन्हें इतिहास, भूगोल की सामान्य जानकारी तक नहीं होती है, आगे जाकर ऐसे ही लोग मीडिया को नेतृत्व प्रदान करेंगे। मीडिया के रवैये पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि आज देश में औसतन 76 किसान रोज आत्महत्या करने को मजबूर हैं लेकिन हमारी मीडिया के लिए खबर ये है कि बच्चा जानने के बाद ऐश्वर्या का वजन कितना बढ़ गया है। गोष्ठी में हालांकि कुछ पत्रकारों ने ‘समाजिक बदलाव में मददगार स्वतंत्र मीडिया’ पर भी प्रकाश डाला।

लेखक संजय कुमार पटना में इलेक्‍ट्रानिक मीडिया से जुड़े हुए हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

You May Also Like

ये दुनिया

रामकृष्ण परमहंस को मरने के पहले गले का कैंसर हो गया। तो बड़ा कष्ट था। और बड़ा कष्ट था भोजन करने में, पानी भी...

सोशल मीडिया

यहां लड़की पैदा होने पर बजती है थाली. गर्भ में मारे जाते हैं लड़के. राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में बाड़मेर के समदड़ी क्षेत्र...

दुख-सुख

: बस में अश्लीलता के लाइव टेलीकास्ट को एन्जॉय कर रहे यात्रियों को यूं नसीहत दी उस पीड़ित लड़की ने : Sanjna Gupta :...

ये दुनिया

बुद्ध ने कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने...