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क्या २जी घोटाले का सच सामने आएगा?

१५ माह बाद जमानत पर तिहाड़ से बाहर आए पूर्व दूरसंचार मंत्री एवं द्रमुक सांसद ए.राजा ने जिस बेपरवाही से अपने समर्थकों की ओर चुम्बन उछाला, वह उनकी सनक तथा “जो किया ठीक किया” की मानसिकता को दर्शाता है। २जी स्पेक्ट्रम घोटाले में २०० करोड़ की रिश्वत लेने के आरोपी राजा को दिल्ली की एक अदालत ने सिर्फ इसलिए जमानत दी क्यूंकि इस मामले से जुड़े १३ अन्य अभियुक्तों को पूर्व में जमानत मिल चुकी है। इस मौके पर द्रमुक कार्यकर्ताओं ने ऐसे खुशियाँ मनाई मानो राजा किसी जंग को जीत कर लौट रहे हों। राजा तो राजा; उनकी ख़ास “प्रजा” की आँखों में देश के साथ गद्दारी करने के लिए शर्म का नामों निशान तक नहीं था। हालांकि अदालत ने राजा को सशर्त जमानत दी है किन्तु सबसे बड़ा सवाल यह है कि अब २जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़ी जांच का क्या होगा? क्या अब जांच की निष्पक्ष उम्मीद की जानी चाहिए? क्या राजा अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर मुद्दे को कमजोर नहीं करेंगे? क्या जमानत मिल जाने से राजा पर लगे तमाम दाग स्वतः धुल जायेंगे?

१५ माह बाद जमानत पर तिहाड़ से बाहर आए पूर्व दूरसंचार मंत्री एवं द्रमुक सांसद ए.राजा ने जिस बेपरवाही से अपने समर्थकों की ओर चुम्बन उछाला, वह उनकी सनक तथा “जो किया ठीक किया” की मानसिकता को दर्शाता है। २जी स्पेक्ट्रम घोटाले में २०० करोड़ की रिश्वत लेने के आरोपी राजा को दिल्ली की एक अदालत ने सिर्फ इसलिए जमानत दी क्यूंकि इस मामले से जुड़े १३ अन्य अभियुक्तों को पूर्व में जमानत मिल चुकी है। इस मौके पर द्रमुक कार्यकर्ताओं ने ऐसे खुशियाँ मनाई मानो राजा किसी जंग को जीत कर लौट रहे हों। राजा तो राजा; उनकी ख़ास “प्रजा” की आँखों में देश के साथ गद्दारी करने के लिए शर्म का नामों निशान तक नहीं था। हालांकि अदालत ने राजा को सशर्त जमानत दी है किन्तु सबसे बड़ा सवाल यह है कि अब २जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़ी जांच का क्या होगा? क्या अब जांच की निष्पक्ष उम्मीद की जानी चाहिए? क्या राजा अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर मुद्दे को कमजोर नहीं करेंगे? क्या जमानत मिल जाने से राजा पर लगे तमाम दाग स्वतः धुल जायेंगे?

कैग रिपोर्ट के अनुसार, राजा के कार्यकाल में हुए २जी स्पेक्ट्रम आवंटन से सरकारी खजाने को १.७५ लाख करोड़ रुपये का चूना लगा था, क्या जनता का वह धन जो विकास कार्यों में खर्च होना था, राजा के तिहाड़ से बाहर आने से उसकी भरपाई होगी? और भी न जाने कितने सवाल हैं जो अब तक अनुत्तरीय हैं। राजा के तिहाड़ से बाहर आने के सवाल पर मनमोहन सिंह अपने चिर-परिचित अंदाज में चुप्पी साध गए तो तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता का मानना है कि अब २जी स्पेक्ट्रम घोटाले को कमजोर करने के प्रयास शुरू होंगे| वहीं स्वामी ने राजा की जान को खतरा बताते हुए उनकी सुरक्षा की मांग की है। कुल मिलाकर अब इस मामले का लगभग पटाक्षेप हो चुका है बस पर्दा गिरना बाकी है। और जनता तो वैसे भी ३जी ४जी के जमाने में २जी को लगभग भूल ही चुकी है। हाँ, इस मामले को लेकर राजनीति ज़रूर चलती रहेगी तथा २०१४ में भी इस मामले को भुनाने का प्रयास किया जाएगा।

दरअसल २जी स्पेक्ट्रम घोटाले के तार कहीं और ही इशारा करते हैं। राजा तो इस घोटाले का मोहरा मात्र थे। प्रधानमंत्री से लेकर वित्तमंत्री तक, सभी जानते थे कि घोटाले की शुरुआत हो चुकी है किन्तु किसी ने अपनी जुबान नहीं खोली। शायद बताने की जरुरत भी नहीं कि इन सभी की बोलती किसके लिए बंद होती है? देश के १३ सर्कलों के लिए ३४० मिलियन डॉलर में लाइसेंस खरीदने वाली स्वान टेलीकॉम में शीर्ष परिवार के दामाद की हिस्सेदारी की बात भी उठती रही है। लिहाजा इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच होना चाहिए थी किन्तु सीबीआई ने भी मामले को दबाने की भरपूर कोशिश की। क्या यह संभव है कि जब सभी तथ्य एवं सबूत राजा के खिलाफ जा रहे थे तब सीबीआई ने राजा के खिलाफ क्यूँ मजबूत केस नहीं बनाया? क्यूँ सीबीआई मीडिया को देखते ही राजा की जमानत का नकली विरोध करने लगी? क्यूँ सीबीआई ने राजा द्वारा उपलब्ध कराए गए सबूतों को आधार बनाकर भी उनके औचित्य पर ही सवालिया निशान लगाए? क्यूँ शीर्ष न्यायालय तथा कैग की फटकार के बाद ही सीबीआई इस मामले में कुछ करने का नाटक करती रही?

खैर राजा के तिहाड़ से बाहर आने के बाद जनता को भी समझ लेना चाहिए कि २जी स्पेक्ट्रम मामला भी बोफोर्स मामले की तरह रहस्यात्मक रूप लेकर साल दो साल में राजनीति की वजह बन जाएगा। हालिया परिस्थितियों में निष्पक्ष जांच की उम्मीद बेमानी है अतः देश के सबसे बड़े घोटाले को नियति मान अपनी बददिमागी हालत को न कोसें बल्कि इसे एक सबक की तरह लें ताकि चुनाव रुपी हवन में इन सभी सत्ता-लोलुप ताकतों का होम कर एक साफ़ सुथरी सरकार का सपना साकार हो सके। हाँ, इस पूरे मामले में सबसे बड़ा दुःख यही है कि कहीं से भी, देश के किसी भी हिस्से से सरकार और राजा के विरुद्ध असहमति एवं विरोध के स्वर नहीं सुनाई पड़े हैं। निष्क्रिय हो चुके समाज को देखकर लगता है कि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ इससे भी अधिक दब्बू किस्म की होंगी जिन्हें अन्याय का प्रतिरोध करना ही नहीं आता होगा। आने वाले समय में न जाने कितने “राजाओं” से देश की जनता की खून पसीने की कमाई का दुरुपयोग होता रहेगा और हम चुपचाप सब सहते रहेंगे? क्या इसी लोकतंत्र की ताकत पर गुमान है हमें? ज़रा सोचिए।

लेखक सिद्धार्थ शंकर गौतम पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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