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क्‍या राष्‍ट्रगान का सम्‍मान करने का दायित्‍व पत्रकारों पर लागू नहीं होता?

पिछले दिनों एक ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल में काम करने का मौका मिला. पत्रकारिता की पढ़ाई के साथ काम करने का मौका मिला तो ज्‍यादा उत्साह था, इसी सिलसिले में फरीदाबाद के हरियाणा राज्य खेल परिसर में मैं भी हाथ में कैमरा लिए निकल पड़ा. 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस का मौका था. मंत्री महोदय सुखबीर कटारिया ने ध्वजारोपण किया तो राष्ट्रगान शुरू हो गया. पूरे खेल परिसर में जितने भी लोग मौजूद थे, चाहे वह सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी लोग सावधान की मुद्रा में खड़े हो गए थे. उसी भीड़ मे एक ऐसा युवा भी था जो पैरो से अपाहिज था, अपने पैरों पर खड़ा होने में लाचार था, लेकिन वो भी हाथ उपर खड़ा करके अपने खड़े होने का सबूत दे रहा था कि मैं भी राष्ट्रगान के सम्मान में खड़ा हूं. एक तरफ उस लाचार व्यक्ति को देखा और दूसरी तरफ अपने पत्रकार भाइयों को, जो राष्ट्रगान के समय मंत्री और अफसरों की फोटो लेने मे मशगूल थे.

पिछले दिनों एक ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल में काम करने का मौका मिला. पत्रकारिता की पढ़ाई के साथ काम करने का मौका मिला तो ज्‍यादा उत्साह था, इसी सिलसिले में फरीदाबाद के हरियाणा राज्य खेल परिसर में मैं भी हाथ में कैमरा लिए निकल पड़ा. 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस का मौका था. मंत्री महोदय सुखबीर कटारिया ने ध्वजारोपण किया तो राष्ट्रगान शुरू हो गया. पूरे खेल परिसर में जितने भी लोग मौजूद थे, चाहे वह सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी लोग सावधान की मुद्रा में खड़े हो गए थे. उसी भीड़ मे एक ऐसा युवा भी था जो पैरो से अपाहिज था, अपने पैरों पर खड़ा होने में लाचार था, लेकिन वो भी हाथ उपर खड़ा करके अपने खड़े होने का सबूत दे रहा था कि मैं भी राष्ट्रगान के सम्मान में खड़ा हूं. एक तरफ उस लाचार व्यक्ति को देखा और दूसरी तरफ अपने पत्रकार भाइयों को, जो राष्ट्रगान के समय मंत्री और अफसरों की फोटो लेने मे मशगूल थे.

कोई बैठ कर फोटो खींच रहा था तो कोई खड़ा होकर राष्ट्रगान का अपमान कर रहा था. दो चार भाइयों को छोड़कर सभी पत्रकार भाई फोटो लेने में मशगूल थे. ये देख कर मैं शर्मसार हो गया और जेहन में एक सवाल उठा कि क्या समाज के इस तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग पर राष्ट्रगान का सम्‍मान करना लागू नहीं होता क्या? ये देश के नागरिक नहीं है? आखिर समाज का ये तबका क्यों इतना व्यवसायी हो गया है कि अपने राष्ट्र धर्म को भी भूल गया है. दिल में बहुत दिनों से भड़ास थी सोचा कि निकल दूं. क्या मेरा कोई साथी इस बात पर प्रकाश डालेगा?

राजेश तरगोत्रा

ट्रेनी जर्नलिस्‍ट

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
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