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क्‍या विज्ञापनों का फर्जीवाड़ा मुसलमानों से धोखा नहीं?

आज़ादी के छह दशकों बाद भी भारत में मुसलमानों के बदतर हालात में सुधार के लिये देश की सरकारों ने कभी सच्चर आयोग तो कभी रंगनाथ मिश्रा अयोग का गठन करके उनका राजनीतिक फायदा उठाने की भरपूर कोशिशें कीं और हर बार मुसलमान इसी उम्मीद में राजनीतिक रूप से शोषित हो कर छल का शिकार होता रहा कि उसको सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक पिछड़ेपन के कलंक से अब छुटकारा मिल जाएगा। मुसलमान मुल्क की सियासी तन्ज़ीमो से निरंतर यह सवाल करता रहा कि कब उसके विकास की पतवार रफ्तार पकड़ेगी? नतीजा भी  किसी से छिपा नहीं है कि सरकार नें जितने आयोग इस कौम के तरक्की में पिछड़ने की पहचान के लिए गठित किये, उनकी रिपोर्टों पर अमल तो हुआ नहीं पर वो फाइलें सचिवालयों की आलमारियों में ठंड का शिकार होकर कहां दफन है ये भी किसी को पता नहीं है। मुस्लिम सियासतदानों को इतनी फुर्सत नहीं है कि वह मुसलमानों के मसाइल पर सरकार से बात करें।

आज़ादी के छह दशकों बाद भी भारत में मुसलमानों के बदतर हालात में सुधार के लिये देश की सरकारों ने कभी सच्चर आयोग तो कभी रंगनाथ मिश्रा अयोग का गठन करके उनका राजनीतिक फायदा उठाने की भरपूर कोशिशें कीं और हर बार मुसलमान इसी उम्मीद में राजनीतिक रूप से शोषित हो कर छल का शिकार होता रहा कि उसको सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक पिछड़ेपन के कलंक से अब छुटकारा मिल जाएगा। मुसलमान मुल्क की सियासी तन्ज़ीमो से निरंतर यह सवाल करता रहा कि कब उसके विकास की पतवार रफ्तार पकड़ेगी? नतीजा भी  किसी से छिपा नहीं है कि सरकार नें जितने आयोग इस कौम के तरक्की में पिछड़ने की पहचान के लिए गठित किये, उनकी रिपोर्टों पर अमल तो हुआ नहीं पर वो फाइलें सचिवालयों की आलमारियों में ठंड का शिकार होकर कहां दफन है ये भी किसी को पता नहीं है। मुस्लिम सियासतदानों को इतनी फुर्सत नहीं है कि वह मुसलमानों के मसाइल पर सरकार से बात करें।

गुजि़श्ता सालों में मुसलमानों के ताल्लुक से इन्तेहाई खुशहाली का दावा करने वाले विज्ञापन कांग्रेस और भाजपा की मौजूदा राज्य सरकारों नें अखबारात में प्रकाशित करके बड़ी गैरतमंदी से यह जताने की कोशिश की के मुस्लिम उत्थान हमारे शासित प्रदेश में आसमानी उंचाइयों पर है। तहकीक के नतीजे में यह हकीकत सामने आई कि गुजरात में नरेन्द्र मोदी एवं राजस्थान में अशोक गहलोत की सरकारें अपने अपने राज्यों में मुसलमानों की खुशहाली को दर्शाने के लिऐ भ्रामक प्रचार सामग्री का सहारा ले रही हैं। विचार धारा से पृथक नजर आने वाले इन दोनों ही राजनैतिक दलों के मुख्यमंत्री इस मुद्दे पर समानता के व्यवहार में दिखते हैं। जिसका ताजा उदाहरण गुजरात सरकार और राजस्थान सरकार ने मुसलमानों के संदर्भ दिऐ गये विज्ञापन में देखने को मिलता है। इन दोनों ही सरकारों में इस छदम प्रचार के जरिये मुसलमानों को अपनी और आकर्षित करने की होड़ मची हुई है जबकी हकीकत में अधिकांश मुस्लिम.जनसंख्या बदहाली का जीवन जीने को मजबूर है।

दरअसल बाटला हाउस एनकाउन्टर के बाद आतंकवाद के इल्जाम से धूमिल हुई आज़मगढ़ की छवि को उभारने के लिए प्रख्यात न्यूज़ पोर्टल टीसीएन ने आजमगढ़ के मुसलमानों का एक साकारात्मक पहलू नवम्बर 2008 में उजागर करते हुए आजमगढ़ के शिबली नेशनल कालेज पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की। जिसका मकसद और नजरिया यह था कि बाटला हाउस एनकाउन्टर से पूरी मुस्लिम क़ौम को जोड़ कर न देखा जाये क्योंकि यहां का मुस्लिम वर्ग अपनी नौजवान नस्ल को आधुनिक शिक्षा के क्षेत्र में आगे ला रहा है और मुस्लिम छात्राएं किस प्रकार अत्याधुनिक तकनीक एवं कम्पयूटर शिक्षा के क्षेत्र में मजबूती से प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं, जिसका उल्लेख टीसीएन ने किया था। और साथ ही शिबली कालेज आजमगढ़ के कम्पयूटर विभाग में बुरका पहनी मुस्लिम छात्राओं द्वारा संचालित किये जा रहे कम्पयूटर की एक तस्वीर भी प्रकाशित कर मुस्लिम युवतियों की बदलती तस्वीर को दर्शाया था।

अब बात 10 जून 2010 की, पटना बिहार में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकार्यकारिणी कि बैठक में शामिल होने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को आना था। बिहार में मुसलमानों की बाहुल्ता को मद्देनजर रखते हुऐ गुजरात सरकार ने मोदी के बैठक में पहुंचने वाले दिन एक विज्ञापन प्रमुख समाचार पत्रों में में प्रकाशित करवाया जिसका शीर्षक था ‘गुजरात में खुशहाल मुसलमान’ सुनने और पढ़ने में यह जुमला कितना अटपटा सा लगता है। भला कौन यकीन करेगा गुजरात सरकार की इस बात पर कि गुजरात में मुसलमान चैन सकून और खुशहाली से है। बहरहाल यह नरेंद्र मोदी की सियासी मजबूरी थी या मुसलमानों के साथ एक और धोखा इसका अंदाजा निकालना तो राजनीतिक जानकारों का काम है। मगर रोचक बात यह है कि जन सामान्य को भ्रमित करने के लिये उस विज्ञापन में प्रकाशित की गई फोटो में बुरका पहनी मुस्लिम छात्राओं को कम्पयूटर संचालित करने हुऐ दिखाया गया था, जो नवम्बर 2008 में टीसीएन ने अपनी रिपोर्ट में प्रकाशित की थी। जिससे यह स्वःमेव प्रमणित होता है कि गुजरात सरकार द्वारा आजमगढ़ यूपी की छात्राओं को गुजरात की बता कर भ्रामक मुस्लिम खुशहाली का प्रचार किया गया।

यह विडम्बना ही है कि गुजरात सरकार की तर्ज पर राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने भी 63वें राजस्थान दिवस पर जारी विज्ञापन में शिबली कालेज आजमगढ़ की मुस्लिम छात्राओं का वही फोटो प्रकाशित किया, जो गुजरात सरकार ने प्रकाशित किया था। ऐसा महज यह दिखाने के लिए किया गया कि राजस्थान में मुस्लिम युवतियां आधुनिक युग की शिक्षा तकनीक से कदम ताल हैं। क्या यह कांग्रेस का मुसलमानों के धोखा नहीं है? वह आजमगढ़ की छात्राओं को राजस्थान का बता कर राज्य के मुसलमानों से विश्वासघात नहीं कर रही है? या फिर नरेन्द्र मोदी की तरह राजस्थान सरकार के पास भी ऐसा कोई मुस्लिम इदारा नहीं है जिसके कारण मुसलमानों में खुशहाली आई हो। नतीजतन उसे मुसलमानों को झूठी तसल्ली देने के लिये इस प्रकार के भ्रामक एवं झूठे प्रचार का सहारा लेना पड़ रहा है। दरअसल सच्चाइ भी यही है कि राजस्थान में अल्पसंख्यकों के लिए कोई ऐसा सरकारी संस्थान नही है कि गहलोत सरकार छाती ठोंक कर अपने दावे को मजबूती से मुसलमानों के सामने प्रस्तुत कर सकें। असल में वक्त का तकाज़ा तो यह है कि राजस्थान की कांग्रेस सरकार प्रदेश भर में सर्वे करवाकर मुसलमानों के वास्तविक हालात सामने लाने होंगे, और अगर वास्तव में कांग्रेस सरकार को राज्य में मुसलमान की खुशहाली के लिए व्यापकता से काम करने की इच्छाशक्ति है तो पिछले तीन सालों में ईटीवी राजस्थान द्वारा राज्य भर के जिलों में चलाऐ गऐ कार्यक्रम अधूरे ख्वाब के एपीसोड देखें और विज्ञापनों के इस फर्जीवाड़े को बंद करके धरातल पर मुस्लिम उत्थान के कार्यक्रम चलाएं।  अतः दोनों सरकारों को अपने इस आचरण के लिये सार्वजनिक रूप से मुसलमानों से क्षमा याचना करनी चाहिये।

लेखक मुजफ्फर भारती अजमेर के निवासी हैं तथा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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