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खनन मजदूरों के सीने को छलनी कर रहा बारूद!

देश के आदिवासी और दलित मजदूर इन दिनों पूंजीपतियों, सफेदपोशों और नौकरशाहों की एक नई साजिश का शिकार हो रहे हैं, जिसकी बुनियाद मौतों की दास्तां लिखने वाले बारूद से तैयार की गई है। या यूं कहें कि सामंती ताकतें आदिवासियों और दलितों के सीने में बारूद ठूंस रही हैं, जिसकी चपेट में आकर उनका सीना (फेफड़ा) छलनी हो रहा है और वे मौत को गले लगा रहे हैं। चाहे उड़ीसा की नियमगिरि और कालाहांडी की पहाड़ियां हों या फिर राजस्थान के अलवर की पहाड़ियां। झारखंड का कोयला खनन क्षेत्र हो या उत्तर प्रदेश की विंध्य और कैमूर की पहाड़ियां। हर जगह खनन मजदूरों के रूप मौजूद आदिवासियों और दलितों के सीने में बारूद के धुएं का जहर ठूंसा जा रहा है। वे टीबी (क्षय रोग), दमा और कैंसर सरीखे खातक रोगों का शिकार होकर इस दुनिया विदा कह रहे हैं। कभी-कभी वे उस चक्रव्यूह का सीधे शिकार हो जाते हैं जो बारूद के ढेर पर पूंजीपतियों, सफेदपोशों और भ्रष्ट नौकरशाहों ने रचा है।

देश के आदिवासी और दलित मजदूर इन दिनों पूंजीपतियों, सफेदपोशों और नौकरशाहों की एक नई साजिश का शिकार हो रहे हैं, जिसकी बुनियाद मौतों की दास्तां लिखने वाले बारूद से तैयार की गई है। या यूं कहें कि सामंती ताकतें आदिवासियों और दलितों के सीने में बारूद ठूंस रही हैं, जिसकी चपेट में आकर उनका सीना (फेफड़ा) छलनी हो रहा है और वे मौत को गले लगा रहे हैं। चाहे उड़ीसा की नियमगिरि और कालाहांडी की पहाड़ियां हों या फिर राजस्थान के अलवर की पहाड़ियां। झारखंड का कोयला खनन क्षेत्र हो या उत्तर प्रदेश की विंध्य और कैमूर की पहाड़ियां। हर जगह खनन मजदूरों के रूप मौजूद आदिवासियों और दलितों के सीने में बारूद के धुएं का जहर ठूंसा जा रहा है। वे टीबी (क्षय रोग), दमा और कैंसर सरीखे खातक रोगों का शिकार होकर इस दुनिया विदा कह रहे हैं। कभी-कभी वे उस चक्रव्यूह का सीधे शिकार हो जाते हैं जो बारूद के ढेर पर पूंजीपतियों, सफेदपोशों और भ्रष्ट नौकरशाहों ने रचा है।

उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल सोनभद्र जिले में करीब एक दर्जन मजदूरों की अप्रत्यक्ष हत्या (जिसे प्रशासन के नुमाइंदे दुर्घटना करार दे रहे हैं) ऐसे ही चक्रव्यूह की देन है। इसके अलावा राजस्थान के अलवर, झारखंड के धनबाद, मध्य प्रदेश के बैढ़न, छत्तीसगंढ़ के दंतेवाड़ा, महाराष्ट्र के विदर्भ और गढ़चिरौली, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खिरी, सोनभद्र, मिर्जापुर, चित्रकूट, उड़ीसा के नियमगिरि और कालाहांडी, कर्नाटक के बेल्लारी जिलों में मौत का ऐसा ही खेल खेला जा रहा है। इस पूरे खेल की बिसात ही बारूद के ढेर से तैयार की गई है जिसकी सच्चाई कैमूर वन क्षेत्र की पहाड़ियों में फैले पूंजीपतियों के अवैध खनन कारोबार से बखूबी समझा जा सकता है। कैमूर वन क्षेत्र की पहाड़ियां उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, मिर्जापुर, मध्य प्रदेश के सिंगरौली, सीधी, झारखंड के पलामू और गढ़वा, बिहार के भभुआ और कैमूर जनपदों तक फैली हैं, जो खनिज संपदा से भरी-पड़ी है। इन इलाकों में कोयला, डोलो स्टोन, सैंड स्टोन, लाइम स्टोन, बालू और मोरम सरीखे खनिजों की भारी तादात है, जिसकी वजह से इन इलाकों में डोलो स्टोन, कोयला, सैंड स्टोन, लाइम स्टोन, बालू और मोरम का काम पिछले चार दशक से भी अधिक समय से चल रहा है।

केवल सोनभद्र की बात करें तो पिछले डेढ़ दशक के दौरान यहां अवैध खनन और मानकविहीन स्टोन क्रशर प्लांटों की संख्या में जमकर इजाफा हुआ है, जिसकी वजह से इस जिले में बारूदी विस्फोटों की हजारों आवाज हर दिन सुनाई देती है। इन विस्फोटों को अंजाम देने के लिए श्रम कानूनों का भी पालन नहीं किया जाता है। सोनभद्र के बारी, डाला, बिल्ली-मारकुंडी, सुकृत आदि खनन क्षेत्रों में मानकविहीन स्टोन क्रशर प्लांटों के संचालन के लिए खुलेआम एयर (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ पॉल्यूशन) एक्ट-1981 के निर्देशों की जमकर धज्जियां उड़ाई जाती हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपनी जांच रिपोर्ट में इसकी पुष्टि भी कर चुका है।  केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्यों की एक जांच टीम ने मध्य प्रदेश के सिंगरौली और सोनभद्र के खनन क्षेत्रों का दौरा किया था, जिसके दौरान उन्होंने इस इलाके में संचालित मानकविहीन स्टोन क्रशर प्लांटों पर चिंता जाहिर की थी। टीम के एक सदस्य की मानें तो सोनभद्र के खनन क्षेत्र में संचालित हो रहे स्टोन क्रशर प्लांटों को शीघ्र बंद कर देना चाहिए क्योंकि यहां कोई भी स्टोन क्रशर प्लांट पर्यावरण संरक्षण के मानकों को पूरा नहीं करते हैं।

स्टोन क्रशर प्लांट के संचालन के लिए आवश्यक दिशा निर्देशों पर गौर करें तो जिस स्थान पर स्टोन क्रशर प्लांट संचालित होता है, वह स्थान चारों तरफ से चहारदीवारी से घिरा होना चाहिए। इस इलाके के 33 फीसदी भाग पर चहारदीवारी से पांच अथवा 10 मीटर की चौड़ाई पर चारों तरफ पौधे लगे होने चाहिए। स्टोन क्रशर प्लांट में लगी जालियां टिन शेड से ढंकी होनी चाहिए। प्लांट से निकलने वाले मैटिरियल (प्रोडक्ट) से उड़ने वाले धूल को हवा में घुलने से रोकने के लिए उसके चारों तरफ पानी के फव्वारों की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके अलावा स्टोन क्रशर प्लांट की चहरादीवारी के चारों ओर पानी के फव्वारे लगे होने चाहिए, जिससे हवा में एसपीएम (सस्पेंडेड पर्टिक्यूलेट मैटर्स) और आरएसपीएम (रिस्पाइरल सस्पेंडेड पर्टिक्यूलेट मैटर) न घुल सके। स्टोन क्रशर प्लांट से मैटिरियल को ढोने वाले वाहनों के खड़े होने वाली जगह और गुजरने वाले मार्ग तारकोल, गिट्टी अथवा बोल्डर के बने होने चाहिए। सोनभद्र के खनन क्षेत्र में संचालित होने वाला कोई भी क्रशर प्लांट उपरोक्त मानकों को पूरा नहीं करता है, जिससे खनन क्षेत्र के वातावरण में एसपीएम (सस्पेंडेड पर्टिक्यूलेट मैटर्स), आरएसपीएम (रिस्पाइरल सस्पेंडेड पर्टिक्यूलेट मैटर), सल्फर डाई ऑक्साइड, एनओएक्स आदि हानिकारक तत्वों की मात्रा सामान्य से कहीं ज्यादा हो चुकी है। इस वजह से बिल्ली-मारकुंडी, बारी, मीतापुर, डाला, पटवध, करगरा, सुकृत, खैरटिया, ओबरा, चोपन, सिंदुरिया, गोठानी, रेड़िया, अगोरी समेत कई क्षेत्रों के लोग टीबी यानी क्षय रोग और दमा जैसे घातक बीमारियों की चपेट में हैं।

पर्यावरणविद् और प्रदूषण नियंत्रण के लिए काम कर रहे विशेषज्ञों की मानें तो खनन क्षेत्र के वातावरण की हवा में एसपीएम (पत्थर क्रश करते समय निकलने वाला धूल का कण) की औसत मात्रा 2000 मिलीग्राम प्रति क्यूबिक नार्मल मीटर (एमजीपीसीएनएम) पाई गई है जो शुद्ध हवा में पाए जाने वाले एसपीएम की सामान्य मात्रा 600 एमजीपीसीएनएम से कहीं ज्यादा है। वहीं यहां की हवा में आरएसपीएम (हवा में घुले पत्थर के कण जो नंगी आंखों से दिखाई नहीं देते हैं) की मात्रा औसतन 1000 एमजीपीसीएनएम पाई गई है, जो सामान्य से कही ज्यादा है। विशेषज्ञों की मानें तो आरएसपीएम बहुत ही घातक है जो सांस लेते समय फेफड़ों के अंदर पहुंच जाता है। धीरे-धीरे ये फेफड़े को छलनी करने लगता है और लोग टीबी, दमा और कैंसर सरीखे घातक रोगों का शिकार हो जाते हैं। आरएसपीएम की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सोनभद्र के खनन क्षेत्र में रोगियों की संख्या अन्य क्षेत्रों की तुलना में कहीं ज्यादा है। जिला स्वास्थ्य विभाग के एक कर्मचारी की बातों पर यकीन करें तो संयुक्त जिला चिकित्सालय में खनन क्षेत्र से हर महीने 20 से 25 व्यक्ति टीबी का इलाज कराने आते हैं।

जिला क्षय रोग विभाग, सोनभद्र के आंकड़ों पर गौर करें तो 2005 से 2010 के बीच यानी पांच साल के दौरान करीब 100 लोगों की मौत क्षय रोग यानी टीबी के कारण हुई। जबकि इस दौरान विभाग में 6871 लोगों का पंजीकरण क्षय रोग के इलाज के लिए किया गया था। इस दौरान विभाग में कुल 29272 लोगों की जांच की गई थी। या यूं कहें कि सोनभद्र के जिला क्षय रोग विभाग में जांच कराने वाला हर चौथा व्यक्ति क्षय रोग से पीड़ित था। क्षय रोगियों की संख्या यहां हर साल बढ़ रही है। जिला क्षय रोग विभाग, सोनभद्र के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2005 में कुल 2035 लोगों ने क्षय रोग से पीड़ित होने की आशंका जाहिर करते हुए जांच कराई थी। इनमें 498 लोग इस रोग से पीड़ित मिले जबकि इस दौरान क्षय रोग से पीड़ित 12 लोगों की मौत हो गई थी। एक साल बाद यानी वर्ष 2006 में 4458 लोगों ने क्षय रोग से पीड़ित होने की आशंका में जांच कराई थी। इनमें 840 लोग क्षय रोग से पीड़ित मिले जबकि इस दौरान 23 क्षय रोगी मौत की नींद सो गए। यूं कहें कि एक साल के अंदर क्षय रोगियों की संख्या दोगुने के करीब पहुंच गई। क्षय रोग से मरने वालों की संख्या भी इस अवधि के दौरान दोगुनी हो गई। वर्ष 2007 में 6299 लोगों ने क्षय रोग से पीड़ित होने की आशंका में जांच कराई। इनमें से 1391 लोग इस रोग से पीड़ित मिले जबकि इस दौरान 22 क्षय रोगियों ने जीवन की अंतिम सांस ली। वर्ष 2008 में क्षय रोग से मरने वालों की संख्या 28 हो गई जबकि क्षय रोग की आशंका जाहिर करते हुए इसकी जांच कराने वाले 7292 में से 1800 लोग क्षय रोग से पीड़ित मिले। वर्ष 2009 में 7482 लोगों ने इस मामले में जांच कराई जिसमें से 1881 लोग क्षय रोगी मिले। इस तरह से सोनभद्र में हर साल क्षय रोगियों और इससे मरने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है।

अगर जिले के आदिवासी बहुल इलाकों की बात करें तो म्योरपुर इलाके में क्षय रोगियों की संख्या एक लाख आबादी पर सबसे अधिक है। इस इलाके के अधिकतर लोग बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में मजदूरी का काम करते हैं। इसके बाद आदिवासी और दलित बहुल घोरावल इलाका आता है जबकि चोपन (बिल्ली-मारकुंडी) इलाका तीसरे पायदान पर है। इन इलाकों के अधिकतर गरीब आदिवासी और दलित बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र समेत विभिन्न इलाकों में स्थित पत्थर की खदानों में काम करते हैं।  कुछ ऐसा ही हालात मिर्जापुर जिले का भी है। यहां के जिला क्षय रोग विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2008 में 15890 लोगों ने क्षय रोग की आशंका जाहिर करते हुए सेहत की जांच कराई थी। इनमें 1961 लोग क्षय रोग से पीड़ित मिले। जबकि 2009 में ये आंकड़ा बढ़कर 1991 हो गया। इस दौरान विभाग में कुल 16068 लोगों ने सेहत की जांच कराई थी। इन दो सालों में 137 क्षय रोगियों की मौत हुई। इन रोगियों में तीन -चौथाई अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग के थे।

इन आंकड़ों से साफ जाहिर है कि उत्तर प्रदेश के सोनभद्र और मिर्जापुर समेत देश के विभिन्न खनन क्षेत्रों में किस तरह से गरीब आदिवासी और दलित मजदूरों को मौत के मुंह में ढकेला जा रहा है। इसके लिए कहीं न कहीं, खनन क्षेत्रों में प्रयोग होने वाला बारूद जिम्मेदार है, जो गरीब खनन मजदूरों के सीने (फेफड़े) को छलनी कर रहा है। इसके अलावा खनन माफिया एक साजिश के तहत खनन क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों को, ना ही सुरक्षा यंत्र मुहैया कराते हैं और ना ही उनका बीमा कराते है, जिसके कारण गरीब आदिवासी और दलित खनन मजदूर बारूदी विस्फोटों और पहाड़ियों की धंसान की चपेट में आकर मौत को गले लगाते रहते हैं। खनन माफियाओं की इस करतूत में सामंतवादी सोच वाले नौकरशाह और पूंजीपति बढ़चढ़कर सहयोग करते हैं।

अब सवाल उठता है कि पूंजीपतियों, खनन माफियाओं और सामंतवादी सोच वाले भ्रष्ट नौकरशाहों की इस साजिश से कैसे निपटा जाए? क्या इस वर्तमान व्यस्था पर छोड़ देना चाहिए? क्या वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था देश के विभिन्न खनन क्षेत्रों में काम करने वाले गरीब आदिवासी और दलित मजदूरों को उनका मानव और लोकतांत्रिक अधिकार दिला पाएगा? समाज के सबसे निचले तबके के इस हालात के लिए कौन जिम्मेदार है? जो जिम्मेदार हैं उन्हें सजा कब और कैसे मिलेगी? और इस सजा को कौन निर्धारित करेगा? इन सवालों का जवाब बारूद के ढेर पर बिछे मौत के शतरंजी बिसात का शिकार हुए प्यादों के परिजन आज भी ढूंढ रहे हैं, जिसका जवाब एक दिन हमें ही देना होगा। कभी बेटे और बेटियों के सवालों के जवाब के रूप में तो कभी वातानुकूलित कमरों में होने वाली गोष्ठियों के वक्ता के रूप में।

लेखक शिवदास पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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