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खुद का ही वैचारिक चक्रव्यूह नहीं भेद पाए प्रकाश झा

 

पश्चिम बंगाल के झारग्राम में ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को उड़ा कर नक्सलियों द्वारा एक साथ ही दर्जनों जान ले लेने का वाकया आपको याद होगा. उस घटना के कुछ दिनों बाद ही उसी रास्ते कोलकाता जाना हुआ था. पश्चिम बंगाल की सीमा में प्रवेश करते ही स्वाभाविक रूप से झारग्राम का वह स्टेशन देखने का मन था. तो ट्रेन के दरवाज़े पर ही खडा होकर इंतज़ार करने लगा. उस स्टेशन से थोड़े पहले ही उल्टे-पलटे करीब दर्जन भर रेल के डब्बे चीख-चीख कर माओवादियों के करतूत को बयां कर रहे थे. इस हमले में करीब दो सौ लोग हताहत और इतने ही घायल भी हुए थे. दरवाज़े पर ही खड़े मिल गए एक ‘विशेषज्ञ’ उस घटना के बारे में बिलकुल आँखों-देखा जैसा हाल सुनाने लगे. जिज्ञासावश उनसे पूछ बैठा कि झारग्राम किस जिले में आता है? विशेषज्ञ कुछ देर सोचते रहे फिर उन्होंने कहा कि जिले का तो मालूम नहीं लेकिन राज्य यह ‘छत्तीसगढ़’ है. सुन कर अब सर पीटने की बारी अपनी थी. छत्तीसगढ़ से झारग्राम तक पहुंचने में आपको तीन राज्यों से गुजरना होता है. यानी छग के बाद ओडिशा वहां से झारखंड फिर पश्चिम बंगाल. बंगाल की सीमा में भी पहुंचने के घंटों बाद पश्चिमी मिदनापुर जिले का वह क्षेत्र आता है लेकिन बात अगर नक्सलवाद की होगी तो झारग्राम को भी छत्तीसगढ़ का ही हिस्सा मान लिया जाएगा. इस विशेषज्ञता और विद्वता को क्या नाम दें समझना मुश्किल है. खैर.

 

पश्चिम बंगाल के झारग्राम में ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को उड़ा कर नक्सलियों द्वारा एक साथ ही दर्जनों जान ले लेने का वाकया आपको याद होगा. उस घटना के कुछ दिनों बाद ही उसी रास्ते कोलकाता जाना हुआ था. पश्चिम बंगाल की सीमा में प्रवेश करते ही स्वाभाविक रूप से झारग्राम का वह स्टेशन देखने का मन था. तो ट्रेन के दरवाज़े पर ही खडा होकर इंतज़ार करने लगा. उस स्टेशन से थोड़े पहले ही उल्टे-पलटे करीब दर्जन भर रेल के डब्बे चीख-चीख कर माओवादियों के करतूत को बयां कर रहे थे. इस हमले में करीब दो सौ लोग हताहत और इतने ही घायल भी हुए थे. दरवाज़े पर ही खड़े मिल गए एक ‘विशेषज्ञ’ उस घटना के बारे में बिलकुल आँखों-देखा जैसा हाल सुनाने लगे. जिज्ञासावश उनसे पूछ बैठा कि झारग्राम किस जिले में आता है? विशेषज्ञ कुछ देर सोचते रहे फिर उन्होंने कहा कि जिले का तो मालूम नहीं लेकिन राज्य यह ‘छत्तीसगढ़’ है. सुन कर अब सर पीटने की बारी अपनी थी. छत्तीसगढ़ से झारग्राम तक पहुंचने में आपको तीन राज्यों से गुजरना होता है. यानी छग के बाद ओडिशा वहां से झारखंड फिर पश्चिम बंगाल. बंगाल की सीमा में भी पहुंचने के घंटों बाद पश्चिमी मिदनापुर जिले का वह क्षेत्र आता है लेकिन बात अगर नक्सलवाद की होगी तो झारग्राम को भी छत्तीसगढ़ का ही हिस्सा मान लिया जाएगा. इस विशेषज्ञता और विद्वता को क्या नाम दें समझना मुश्किल है. खैर.

 

 

अफ़सोस यह कि नक्सल मामले पर ‘चक्रव्यूह’ फिल्म बनाते हुए फिल्मकार प्रकाश झा भी इसी ‘छत्तीसगढ़ सिंड्रोम’ का शिकार हो गए. आलोच्य फिल्म में भी आपको ऐसी ‘विशेषज्ञता’ से हर फ्रेम में सामना होगा. नंदीघाट के रूप में पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम की जिस समस्या पर फिल्म को फोकस किया गया है वह नंदीग्राम भी छत्तीसगढ़ में, झारखंड की लातेहार की नक्सली जुही भी छत्तीसगढ़ी बोलने वाली ही, झारखंड के ही नक्सली किशन जी के अंदाज़ में पत्रकारों से बात करने वाला राजन भी बिलकुल छत्तीसगढी जुबान बोलना वाला, आंध्र प्रदेश के इलाके का ‘आज़ाद’ भी छत्तीसगढ़ के कोटे में ही समाहित. जबकि तथ्य यह कि छत्तीसगढ़ का भी कोई नक्सली छत्तीसगढ़ी नहीं बोलता है. अव्वल तो यह कि छग में एरिया कमांडर और ऊपर के सभी नक्सल पदों पर आंध्र प्रदेश के तेलगूभाषी लोग ही हैं. नीचे के दलम आदि में भी जो स्थानीय लोग हैं भी वह गोंडी-हल्वी आदि स्थानीय बोली ही बोलते हैं न कि छत्तीसगढ़ी.

हालांकि सवाल केवल भाषा का ही नहीं है. जैसा कि फिल्मकार भी जानते होंगे कि जिस नंदीघाट को नंदीग्राम के रूप में बताया गया है वहां कम से कम ‘सलवा-जुडूम’ तो नहीं चल रहा था. इस नाम का आंदोलन भी तो विशुद्ध बस्तर में ही शुरू हुआ था. बस्तर में भी नक्सलियों के विरुद्ध ये तीसरा या चौथा संगठित जन विद्रोह था. वो कम से कम वैसा तो नहीं था जैसा फिल्म में दिखाया गया है कि नंदीग्राम की ज़मीन को खाली कराने के लिए गुंडों की इस फौज का गठन कर लिया गया था. इतनी अज्ञानताओं के साथ फिल्म के अंत में नक्सली जुही और आज़ाद की मौत को फिल्मकार की ओर से ‘शहादत’ बताना तो इस फिल्म का सबसे आपत्तिजनक पक्ष और देशद्रोही कृत्य है. खैर.

 

अगर कोई फिल्मकार छत्तीसगढ़ खासकर बस्तर में माओवाद की समस्या पर इमानदारी से फिल्म बनाना चाहे तो उसे सबसे पहले इस मुद्दे के सरलीकरण से बचना चाहिए कि आदिवासियों ने शोषण के खिलाफ हथियार उठा लिया है, वे लोकतंत्र से असंतुष्ट हैं आदि-आदि. दूसरी बात यह कि देश के शेष भागों में चल रहे माओवादी आंदोलन से भी उसे अलग करके देखने होगा. समझना यह भी होगा कि बस्तर के इस आतंक की नाल कहीं से भी नक्सलबाड़ी से नहीं जुड़ा हुआ है न ही नक्सलबाड़ी जैसी कोई भी स्थिति बस्तर में है. यहां न वहां के जैसे कोई किसान हैं न ही भूमि को लेकर किसी तरह का बंगाल या बिहार जैसा कोई विवाद है या था बस्तर में. वहां कोई ज़मींदार या भूस्वामी भी नहीं है.

 

बस्तर के नक्सल मामले का सूत्र मूलतः तेलंगाना के माओवादी आंदोलनों के साथ जुडता है. वहीं के कोंडापल्ली सीतारमैया ने बस्तर को इसलिए चुना क्यूंकि तेलंगाना क्षेत्र में आन्दोलन को चलाने के लिए उसे एक आधार भूमि की ज़रूरत थी. भौगोलिक रूप से अबूझमाड़ के घने जंगल वाला क्षेत्र आंध्र से नज़दीक होने के कारण भी उसके लिए काफी मुफीद था. फिर चूंकि अबूझमाड़ में रहने के लिए कुछ कारण चाहिए थे, आदिवासियों के बीच पैठ बनाने के लिए कुछ उनके हित की बात भी कहनी थी तो उन्होंने फिर उनके शोषण आदि को एक उत्पाद के रूप में इस्तेमाल कर उसे प्रचारित करना शुरू कर दिया. यहां आशय यह नहीं है कि आदिवासियों के शोषण, उनकी गरीबी, उपेक्षा, उनके संसाधनों की लूट आदि की बात झूठी है लेकिन आशय यह है कि इन कारणों से वहां नक्सलवाद नहीं शुरू हुआ बल्कि कोंडापल्ली को अपने मूवमेंट के लिए वहां की ज़मीन चाहिए थी तो इन कमियों को बहाने के रूप में इस्तेमाल किया गया. यही कारण है कि आज भी बस्तर के नक्सलियों में तेलगुभाषी लोगों का वर्चस्व है. भाषा के इसी समानता के कारण स्वामी अग्निवेश जैसे तेलगुभाषी लोग वहां के नक्सलियों के बीच अपनी पैठ बनाने में सफल हो पाते हैं. और इस तरह एक बार पांव ज़माने के बाद शुरू हुआ झूठ-सच को गढ़ते हुए अंचल और लोकतंत्र को लगातार बदनाम करने का सिलसिला जो आज तक भारत विरोधी देशी-विदेशी ताकतों के गठजोड़ के साथ अनवरत चल रहा है. अफ़सोस कि दुनिया के सबसे भोले-भाले लोगों के सबसे सुन्दर इस क्षेत्र को बिसात की तरह बिछा कर वहां खूनी शतरंज खेला जा रहा है. फिल्मकार भी दुष्प्रचार की उसी साज़िश का जाने-अनजाने हिस्सा हो गए लगते हैं.

 

फ्रेम दर फ्रेम यह फिल्म केवल दुष्प्रचार का शिकार लगता है. जैसे यह स्थापित तथ्य है कि नक्सली स्थानीय बच्चों और महिलाओं को अपने ढाल के रूप में इस्तेमाल करते हैं ताकि पुलिस उन पर गोली नहीं चला सके लेकिन फिल्म में इसके विपरीत पुलिस वालों को बच्चों को मारते-पीटते और उससे विचलित होकर महिला नक्सली को आत्मसमर्पण करते हुए दिखाया गया है. यह पंक्ति लिखते-लिखते ग्यारह और तेरह साल की दो आदिवासी बच्चियों के बारे में खबर आ रही है जिन्हें तीन साल से नक्सलियों द्वारा बंधक बना कर उनका बलात्कार किया जा रहा था. ऐसी ख़बरें यहां रोजमर्रा की बातें हैं जिसे फिल्म में न केवल नज़रंदाज़ किया गया है बल्कि उसका बिलकुल विपरीत चित्रित करते हुए लगभग हर जगह नक्सलियों के कथित सहृदयता का ही जिक्र है. बात चाहे ज़रूरी होने के बावजूद हथियार के लिए वसूले रकम का इस्तेमाल गांवों के पुनर्वास में लगाने के दृश्य का हो, खुफिया बन कर जाने वाले जवान के ‘ह्रदय परिवर्तन’ का या फिर जन अदालत में ग्रामीणों द्वारा फैसला लिए जाने का झूठ दिखाने का, बस्तर के नक्सलवाद की सच्चाई से आपका कहीं इस फिल्म में सामना नहीं होगा.

अगर फिल्मकार वास्तव में छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद को लेकर गंभीर होते तो उन्हें सबसे पहले अपने शोध का स्रोत बताना चाहिए था. हाल में बस्तर के नाम का इस्तेमाल करते हुए ही एक चर्चित किताब आयी जिसके बारे में कहा जाता है कि कोबाद गांधी ने दिल्ली में बैठ कर एक ‘पंडित’ को डिक्टेट किया और हो गया चु-चु का मुरब्बा तैयार जिसमें बस्तर के अलावा और सब कुछ है. तो यह फिल्म भी ऐसे ही किसी फीडबैक पर आधारित दिखाई देती है.

 

अगर फिल्म बनाने से पहले बस्तर या छत्तीसगढ़ में आ कर गंभीरता से शोध किया गया होता, यहां के स्थानीय अख़बारों के पिछले कुछ सालों की फ़ाइल देख ली जाती, तब जा कर फिल्मकार की समझ साफ़ हो सकती थी और वे नक्सली दुष्प्रचार के विरुद्ध इन तथ्यों को फिल्मांकित कर सकते थे कि किस तरह महिलाओं-बच्चियों के साथ नक्सली ज्यादती करते हैं, कैसे दांतेवाडा के एर्राबोर में डेढ़ साल की बच्ची ज्योति कुट्टयम समेत 65 आदिवासियों को ज़िंदा जला दिया जाता है. कैसे नक्सली आतंक से मुक्ति हेतु रानीबोदली शिविर में शरण लिए 35 निर्दोष अबूझमाडियों का निर्ममता पूर्वक खून कर दिया जाता है. कैसे फिल्म में दिखाए गए विवरण से उलट हर हफ्ते नक्सलियों के आतंक से बच कर बच्चियां, महिलायें, युवा आदि समाज के मुख्यधारा में शामिल होने आते हैं. कैसे कोई ‘रेड्डी’ जंगल से सैकड़ों किलोमीटर दूर भिलाई के बंगले में अपने परिवार के साथ जिंदगी बिताते हुए ‘गुडसा उसेंडी’ के छद्म नाम से नक्सलियों का आधिकारिक प्रवक्ता बना रहता है. नक्सलियों का किस तरह पन्द्रह सौ करोड़ के वसूली का सालाना कारोबार चलता है. किस तरह लेवी वसूली में रंगे हाथों पकड़े जाने पर महीनों बाद कहानी गढी जाती है और दांतेवाडा से हज़ारों किलोमीटर दूर दिल्ली के द्वारिका के आलीशान फ़्लैट से एक ‘मसीहा’ द्वारा दिल्ली के पत्रकारों को ‘आँखों देखा हाल’ सुनाया जाता है. ऐसे मसीहा जिनके बच्चे दून जैसे महंगे स्कूल में शिक्षा ग्रहण कर रहे होते हैं. कैसे दिल्ली की किसी प्रख्यात लेखिका के लेख और नक्सलियों के प्रेस विज्ञप्ति में आश्चर्यजनक समानता पायी जाती है. आशय यह कि आंतरिक सुरक्षा की इस सबसे बड़ी चुनौती पर फिल्मकार को ऐसी फार्म्यूला फिल्मों के निर्माण से बच अपने राष्ट्रीय सरोकार का परिचय देना था. कम से कम उन्हें नक्सलियों के महिमामंडन से तो ज़रूर बचना चाहिए था.

 

कभी एक फिल्मकार ने कहा था कि ‘बालीवुड में दो या तीन ही कहानी है जिस के फार्मूला पर सारी फ़िल्में बनती है.’ उन फ़ार्मुलों कहानी में एक शायद यह होगा कि ज़मींदार या पुलिस के अत्याचार से पीड़ित होकर एक व्यक्ति डाकू बन जाता है. वह डाकू गरीबों के लिए काफी सहृदय होता है. अंततः अमीरों को लूटते हुए गरीबों की रक्षा करते हुए ‘हीरो’ अपनी शहादत को प्राप्त होता है. बस इसी फार्मूला में सहृदय डाकू की जगह कथित मध्य भारत के नक्सलियों को रख कर बिना किसी सोच-विचार के ( या फिर काफी शातिराना तरीके से ज्यादा ही सोच-विचार कर) तैयार कर दी गयी यह फिल्म. बात अगर किसी सामान्य घटना से प्रेरित होकर किसी तरह का सृजन करने का हो तो निश्चय ही घटना को चित्रित करने में सर्जक को यह स्वतंत्रता है कि वह अपने हिसाब से कहानी में रद्दोबदल कर दे. लेकिन बात अगर लोकतंत्र और देश की आंतरिक सुरक्षा पर उत्पन्न सबसे बड़े संकट नक्सलवाद का हो तब इस तरह की स्वछंदता उचित नहीं. बस्तर के नक्सलवाद को बिलकुल वहीं के परिप्रेक्ष्य में देखने की ज़रूरत है. उसे बिहार, बंगाल, झारखंड, ओडिशा आंध्र के चश्मे से देखना समझना संभव नहीं. न ही इसे रूस या चीन से देख कर समझना संभव है.

 

लेखक पंकज झा छत्‍तीसगढ़ से प्रकाशित भाजपा के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.

 

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