मोबाइल के व्याकरण के मुताबिक मिसकॉल नपुसंक लिंग है क्योंकि मिस्टर करे या मिस मिसकॉल हर हाल में मिसकॉल ही रहता है। और जिन्हें मिसकॉल की लत एक बार लग जाती है वह लागी छूटे ना की तर्ज पर मरणोपरांत भी नहीं छूटती। कुछ ऐसी ही नस्ल के प्राणी हैं हमारे मिसकॉल लगाऊ। मिसकॉल लगाऊ खानदानी मिसकॉल लगाऊ हैं। कॉल लगाने की मिस्टेक वे कभी नहीं करते हैं। और कभी ये मिस्टेक हो जाती है तो मिस्टर मिसकॉल लगाऊ अपनी सतर्कता के मिसमैनेजमेंट पर मिसमिसाकर रह जाते हैं। ये सिर्फ मिसकॉल लगाने के लिए ही पैदा हुए हैं। इनका सारा कारोबार ही मिसकॉल की बुनियाद पर खड़ा है। मिसकॉल ही इनके जनसंपर्क के प्राण हैं। सुबह उठते ही सौ-दो सौ मिसकॉल लगाने का नियमित व्यायाम ही इनकी तंदरुस्ती का राज है।
मिसकॉल देखकर जो शरीफ लोग पलटकर मिस्टर मिसकॉल लगाऊ को फोन करते हैं उसे सुन-देखकर इन्हें वैसी ही खुशी होती है, जैसे कि मछेरे को जाल में फंसी मछली को देखकर होती है। इनकी चूंकि फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं होती इसलिए ये फट्ट से लोकल से ग्लोबल हो जाते हैं। यूं भी भाई मिसकॉल लगाऊ धाराप्रवाह बकवास में डबल पीएचडी हैं। शोले फिल्म के बीरू की तरह बातचीत में ये कहीं अमेरिका की टंकी पर चढ़ गए तो उतरने का नाम ही नहीं लेते। और वहीं से फट्ट उछलकर चीन की दीवार पर टहलकदमी करने लग जाते हैं। सामनेवाला बेचारे ये पूछने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता कि फोन क्यों किया था। दिन में ऐसे बीस-पच्चीस मिसकॉल मैच्योर होएं तो मिस्टर मिसकॉल लगाऊ की बांछें खिल जाती हैं। और ऐसे समय में बातचीत करते हुए इनके चेहरे पर ऐसी दिव्य आभा बिखर जाती है कि ये आदमी कम निर्मल बाबा ज्यादा नज़र आने लगते हैं। दिनभर मिसकॉल लगाने और उन्हें भुनाने में मिसकॉल लगाऊ घोर विजी रहते हैं। मिसकॉल लगाने के रसिया मिसकॉल लगाऊ मिसकॉल लगाने के बारीक हुनर के बूते पर दर्जनभर प्रेमिकाएं कमा चुके हैं।
ये बात दीगर है कि मिसकॉल के बूते पर ही डेटिंग की जंग जीतने के चक्कर में इनकी कई असंतुष्ट प्रेमिकाएं दल बदल कर गईं और कई इश्क के कैबिनेट से त्यागपत्र देकर भगवती जागरण करने लगीं। मिसकॉल लगाने की लत इनके जिस्म में इतनी गहरी जड़ें जमा चुकी हैं कि मौका मिलते ही ये मिसकॉल टांक देते हैं। कुछ दिन पहले इनके घर चोर घुस आए। मिसकॉल लगाऊ ने ऐसे नाजुक मौके पर बीस-पच्चीस पड़ोसियों के अलावा पुलिस तक को मिसकॉल लगाकर ही पुकारते रहे। और इस तरह अपनी कर्तव्यकरायणता का मिसकॉल लगाऊ ने दुर्दांत परिचय दे डाला। मगर इतने मिसकॉल लगाने के बावजूद पड़ोसी और पुलिस मदद के लिए नहीं आए तो इन्हें पुख्ता यकीन हो गया कि पृथ्वी पर घोर कलयुग आ गया है। मगर जब घर में आग लगी और मिसकॉल लगाने पर फायरब्रिगेड भी नहीं पहुंची तब तो मिसकॉल लगाऊ को लगने लगा कि पापियों के बोझ से चरमराती पृथ्वी पर प्रलय आ जानी चाहिए। इसी में दुनिया की भलाई है।
एक जमाना वो था कि द्रौपदी ने चीरहरण के बीच कृष्ण को मिसकॉल मारी तो पुष्पक विमान में बैठकर झट से कन्हैया बाबू आ गए। अब तो गैंगरेप हो जाता है और हजारों मिसकॉल के बावजूद भगवान तो क्या पुलिस तक नहीं पहुंचती। मिसकॉल की अब कोई वैल्यू नहीं रही। दूसरी तरफ कुछ निठल्ले मोबाइल से चुपके ही बैठे रहते हैं। मिसकॉल लगाया नहीं कि फट्ट से उठा लेते हैं। दो मिसकॉल भी लपेटे में आ गए तो मिसकॉल लगाऊ को दिनभर कमजोरी रहती है। अभी किसी दुष्ट ने उनके मिसकॉल का वध कर दिया है। गुस्से में वो मुझे बीस-पच्चीस मिसकॉल लगाने का जघन्य पराक्रम कर चुके
हैं। मिसकॉल लगाऊ के मिसकॉल का घड़ा भर चुका है। अगर मेरी खोपड़ी घूम गई तो इनके हर मिसकॉल को लपक कर मैं इन्हें बरबाद कर दूंगा। और मिसकॉल की अकाल मृत्यु के साथ मिसकॉल लगाऊ भी संसार से चल बसने की मुद्रा में आ जाएंगे।
इस हास्य-व्यंग्य के लेखक पंडित सुरेश नीरव हैं. पंडित जी काव्यमंच के लोकप्रिय कवि हैं. 16 पुस्तकें प्रकाशित. 7 धारावाहिकों का पटकथा लेखन. अंग्रेजी, उर्दू, फ्रेंच में अनुवाद. 30 वर्ष तक कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध. छब्बीस देशों की विदेश यात्राएं. भारत के राष्ट्रपति से सम्मानित. आजकल स्वतंत्र लेखन और यायावरी. उनसे संपर्क सुरेश नीरव, आई-204, गोविंद पुरम, गाजियाबाद या मोबाइल नंबर 09810243966 के जरिए किया जा सकता है.


