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ख्‍वाजा की दरगाह की धोखाधड़ी

अजमेर स्थित ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह में आज लोगों को धड़ल्ले गुमराह किया जा रहा है। आप दुनिया की किसी भी दरगाह पर चले जाइये वहाँ पर दरगाह का प्रमुख एक व्यक्क्ति होता है, जिसको सज्जादानशीन (गद्दीनशीन) कहा जाता है। और अजमेर स्थित ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह के सज्जादानशीन को मुग़ल बादशाह अकबर द्वारा “दीवान” का लक़ब दिया गया. मुग़ल बादशाह शाहजहाँ द्वारा “अली खान” का लक़ब दिया गया व महारानी विक्टोरिया द्वारा “शैख़ उल मशाइख” का लक़ब दिया गया. ख्वाजा की दरगाह की यह परंपरा है कि यहाँ पर ख्वाजा का सज्जादानशीन ख्वाजा साहब के परिवार का सदस्य ही बन सकता है, तो इससे साफ़ हो जाता है की ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह का सज्जादानशीन (गद्दीनशीन), दीवान, ख्वाजा साहब का वंशज (औलाद) होता है.

अजमेर स्थित ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह में आज लोगों को धड़ल्ले गुमराह किया जा रहा है। आप दुनिया की किसी भी दरगाह पर चले जाइये वहाँ पर दरगाह का प्रमुख एक व्यक्क्ति होता है, जिसको सज्जादानशीन (गद्दीनशीन) कहा जाता है। और अजमेर स्थित ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह के सज्जादानशीन को मुग़ल बादशाह अकबर द्वारा “दीवान” का लक़ब दिया गया. मुग़ल बादशाह शाहजहाँ द्वारा “अली खान” का लक़ब दिया गया व महारानी विक्टोरिया द्वारा “शैख़ उल मशाइख” का लक़ब दिया गया. ख्वाजा की दरगाह की यह परंपरा है कि यहाँ पर ख्वाजा का सज्जादानशीन ख्वाजा साहब के परिवार का सदस्य ही बन सकता है, तो इससे साफ़ हो जाता है की ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह का सज्जादानशीन (गद्दीनशीन), दीवान, ख्वाजा साहब का वंशज (औलाद) होता है.

ख्वाजा साहब के कितने गद्दीनशीन (सज्जादानशीन)? : अजमेर शरीफ की दरगाह का हर खादिम (नौकर, चौकीदार) “(Their case was that the Khadims were and are no more, than servants of the holy tomb and their duties are similar to those of chowkidars. AIR 1961SC 1402)” खुद को खुद को आज  ख्वाजा साहब का गद्दीनशीन (सज्जादानशीन) बता रहा है। दरगाह में लाखों के तादाद में जायरीन आते हैं उन जायरीनों के साथ यह एक बहुत बड़ा धोखा है, लोगों को गुमराह किया जा रहा है, उनकी आस्था के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।

ख्वाजा साहब के खादिम हैं कौन? : ख्वाजा के खादिम मूलतः आदिवासी है… पर खादिमों को यह बताते हुए शर्म आती है…”यह जानना काफी आश्चर्यजनक हो सकता है पुष्कर के पण्डे और ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह के खादिम एक ही खानदान के वंशज है. मूल रूप से भील आदिवासी पूर्वजों की इन आधुनिक संतानों ने तरक्की, दौलत और शोहरत के नशे में अपने बुजुर्गों को न केवल भुला दिया है बल्कि अपना शिजरा भी फखरुद्दीन गुर्देजी और मोहम्मद यादगार से जोड़ दिया है” (डायमंड इण्डिया अगस्त 2004 पेज 29).

that the khuddam are descended from converts originally belonging to the Bhil tribe. It is said that there were five brothers called Laikha-, Taikha, Shaikha, Jhoda and Bhirda. Jhoda and Bhirda never accepted Islam and settled in Pushkar. The other three brothers became converts through Mu’in al-din himself.  “The Shrine and Cult of Muin Al-Din Chishti of Ajmer page 147”

news on internet —>

“King Prithviraj Chauhan’s sons dedicated their lives to dargah”.

http://www.sunday-guardian.com/news/king-prithviraj-chauhans-sons-dedicated-their-lives-to-dargah.

“Flurry of activity among Khadims.”

http://hindu.com/HYPERLINK “http://hindu.com/2001/07/11/stories/14112212.htm”2001HYPERLINK
“http://hindu.com/2001/07/11/stories/14112212.htm”/HYPERLINK “http://hindu.com/2001/07/11/stories/14112212.htm”07HYPERLINK “http://hindu.com/2001/07/11/stories/14112212.htm”/HYPERLINK “http://hindu.com/2001/07/11/stories/14112212.htm”11HYPERLINK “http://hindu.com/2001/07/11/stories/14112212.htm”/stories/HYPERLINK “http://hindu.com/2001/07/11/stories/14112212.htm”14112212HYPERLINK “http://hindu.com/2001/07/11/stories/14112212.htm”.htm

दरगाह शरीफ के आज के हालात : दरगाह ख्वाजा साहब के प्रबंध के लिए भारत सरकार द्वारा बनाई गई दरगाह कमेटी इन खादिमों के हाथों बिक चुकी है. यूँ तो दरगाह शरीफ का पूरा प्रबंध दरगाह कमेटी के जिम्मे है पर ये सो रही है. खादिमों ने दरगाह ख्वाजा साहब पर अवैध कब्ज़ा कर रखा है और करते जा रहे हैं. हालात बद से बदजर होते जा रहे हैं. अब हालात ऐसे हो गए हैं कि जहां ख्वाजा साहब के गुम्बद में कोई भी आम आदमी आसानी से जाया करता था, वो अब गुम्बद के अंदर जा भी नहीं सकता. सहूलियत के नाम पर गुम्बद के एक गेट पर तो जायरीनों की लाइन लगवाना शुरू कर दी है और वहाँ जायरीनों को घण्टों लाइन में लगना पड़ रहा है. वहीँ दूसरी और इन खादिम चौकीदारों, नौकरों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि इन होने गुम्बद के दो गेटों पर ऐसा कब्ज़ा कर लिया कि वहाँ से अब आम आदमी गुम्बद के अंदर ही नहीं जा सकता.

अगर आप इन खादिम चौकीदारों को पैसे देते हो तो ये आपकों इन दो गेटों से से गुम्बद के अंदर ले जायेंगे और आप गरीब हो पैसे नहीं दे सकते तो दो घण्टों लाइन में लगे रहो, और पैसे देने वाले अवैध तरीके से गुम्बद में जाकर भी आ जायेंगे. दादा गिरी तो यहाँ तक हो गई कि इन खादिम (चौकीदारों, नौकरों) खुद दरगाह के नौकर हैं और दरगाह कमेटी के मुलाजिम हैं, परन्तु आज इन नौकरों ने अपने लिए नौकर रख लिए जिनको दरगाह के गुम्बद के गेटों के बाहर खड़ा कर दिया और इनको जिम्मा सोंपा गया है. एक आम आदमी को ख्वाजा साहब के गुम्बद में जाने से रोकने का, और जो पैसे देके जाता है. उसको आसानी से जाने देने का, यह सब दरगाह कमेटी के आँखों के सामने हो रहा है पर वो सो रही है, या फिर वो इन खादिमों के हाथों बिक गई है.

जो लोग पैसे देके ज्यारत करते है तो ठीक है, परन्तु जो बिना पैसे के जियारत करना चाहते हैं. उनके साथ ये खादिम चौकीदार बदसलूकी करते हैं. उनका गिरेबान पकड़ कर और धक्का दे करे गली गलोच करके गुम्बद और दरगाह से बहार निल्काल देते हैं. दरगाह के प्रबंध के लिए भारत सरकार द्वारा दरगाह ख्वाजा साहिब अधिनियम 1955 भी बना रखा है, पर ये अधिनियम रद्दी की टोकरी में पड़ा हुआ है. दरगाह कमेटी की जिम्मेदारी है कि वह दरगाह ख्वाजा साहिब का प्रबंध इस अधिनियम के अनुसार करे परन्तु बात यह है कि दरगाह कमेटी भारत सरकार का भाग होते हुए भी इन खादिमों (नौकरों चौकीदारों) की गुलाम बन कर इन के तलवे चाट रही है और आम जायरीन परेशान हो रहा है. ख्वाजा तो सबके है फिर उनकी जियारत के लिए अमीर और गरीब का ये अलग-अलग रास्ता बनाया जा रहा है और भारत सरकार आँख मूंदे सब देख कर भी अनदेखा कर रही है.

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