एक महीने पहले मैं एक रेस्तरां में रद्जा पोपोविक के साथ बैठा था, वह एक लोकतांत्रिक कार्यकर्ता हैं और कुछ साल पहले सर्बिया में हुई उस क्रांति के नेता थे, जिसमें स्लोबोदान मिलोसेविक की सरकार का तख्ता पलट हो गया था। हम पश्चिम एशिया में हो रही बगावतों पर बात कर रहे थे। उनका कहना था, ‘बुरे लोगों के लिए यह बहुत बुरा साल है। छह महीने पहले तक किसने सोचा था कि बेन अली और हुस्नी मुबारक चले जाएंगे। गद्दाफी और सालेह पस्त होने को मजबूर हो जाएंगे, असद परेशानियों से घिरे होंगे। अगर पिछले साल किसी ने इसकी भविष्यवाणी की होती, तो कोई भी विद्वान इसे मानने को तैयार न होता।’
पिछले हफ्ते तानाशाहों की बिरादरी का एक और सदस्य चला गया। लीबिया के बागियों ने जब त्रिपोली में मुअम्मर गद्दाफी के परिसर पर हल्ला बोला, तो अरब का यह तानाशाह भगोड़ा बनकर रह गया। लीबिया अरब के भूगोल का वह नया टुकड़ा है, जिसे आप अगर टय़ूनीशिया और मिस्र से जोड़ दें, तो आज आपको यह एक तानाशाह मुक्त क्षेत्र दिखाई देगा। लेकिन यह सिलसिला उत्तरी अफ्रीका या पश्चिम एशिया में ही क्यों रुक जाना चाहिए? सच यह है कि तानाशाह मुक्त दुनिया अब एक मुश्किल बात नहीं रही। और तानाशाह बनना आज जितना मुश्किल है, उतना पहले कभी नहीं था। पश्चिमी विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं की एक फौज अब मानवाधिकारों के उल्लंघन और भारी भ्रष्टाचार के खिलाफ हमेशा तैयार रहती है। और अगर आपने अपने यहां किसी बगावत को हिंसक तरीके से दबाने की कोशिश की, तो ज्यादा आशंका यही है कि यह घटना कुछ ही देरी में आईफोन पर रिकॉर्ड करके पूरी दुनिया में प्रसारित कर दी जाएगी। एकदलीय और सर्वसत्तावादी तानशाही तो अब लगभग लुप्तप्राय-सी हो गई है। यह अब घाटे को सौदा है। जोसेफ स्टालिन, पोलपोत और इदी अमीन जैसे नेता बीसवीं सदी के नेतृत्व के नमूने थे। अब कोई उत्तर कोरिया या म्यांमार जैसा नहीं बनना चाहता। पुलिस राज्य का युग बीत गया। अब सफेद कोट वालों के आतंक से डरने की कोई जरूरत नहीं।
और अब थोड़ी देर के लिए कल्पना कीजिए एक तानाशाह मुक्त दुनिया की। एक ऐसी दुनिया, जहां कोई भी देश आतंकवाद को प्रायोजित न करता हो, जहां नरसंहार करने वालों को कहीं शरण न मिलती हो। इसके मानवीय फायदे अनगिनत होंगे। एक बार जब आखिरी तानाशाह ढेर हो जाएगा, तो कल्पना कीजिए कि अभी तक जो लोग डर और दमन के बीच खुद को किसी तरह से बचाए रख सके थे, उन करोड़ों लोगों की रचनात्मकता इस दुनिया को क्या बना देगी। तब हमें तानाशाहों का एक अजायबघर बनाना पड़ेगा- शायद रंगून में- जहां सभी तानाशाहों की तस्वीरें लगी होंगी, जिनके नीचे उनके अपराधों का जिक्र होगा। जिन्हें देखकर लोगों को हैरत होगी कि कोई इतने सारे लोगों के प्रति इतना क्रूर कैसे हो सकता है।
लेकिन यहां पर एक समस्या है। सबसे जालिम किस्म के तानाशाहों के चले जाने का यह अर्थ भी नहीं है कि दुनिया ज्यादा आजाद हो जाएगी। तानाशाहों की विदाई के बाद भी वह लोकतंत्र नहीं आ रहा, जिसकी हम उम्मीद करते हैं। फ्रीडम हाउस नाम के संगठन का कहना है कि पिछले पांच साल से दुनिया में राजनैतिक आजादी लगातार कम हुई है। यह संगठन 1973 से ही ये आकलन कर रहा है, और इस दौरान इसके कम होने का यह सबसे लंबा सिलसिला है। इतना ही नहीं, पूरी तरह से मतदाता आधारित लोकतंत्र की संख्या 1995 के बाद से अब तक के अपने सबसे निचले स्तर पर है। इस दौरान हमें ब्लादिमीर पुतिन और ह्यूगो शॉवेज जैसी हस्तियां दिखाई देती हैं, जो चुनी तो जनता के वोटों से गई हैं, लेकिन एक लंबे समय में उन्होंने ज्यादा से ज्यादा सत्ता को अपने हाथों में केंद्रित कर लिया है। रूस के पिछवाड़े में तो तानाशाहियों का अंबार लगा हुआ है- अजरबैजान, बेलारूस, उज्बेकिस्तान और न जाने कितनी ही। इनके नेता यह माने बैठे हैं कि उन्हें जो ओहदा मिला है, वह आजीवन उनके लिए ही है। चीन में अब माओ जैसी कोई हस्ती नहीं है, लेकिन आर्थिक सफलता ने वहां की सत्ता को और कपटी बना दिया है। एशिया के कुछ देश जैसे मलेशिया, थाईलैंड और सिंगापुर कुछ उदार तो दिखते हैं, लेकिन वे लोकतंत्र के आदर्श किसी भी तरह से नहीं हैं। ऐसे देशों को क्या कहा जाए, राजनीतिशास्त्री इसी चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं। ये देश ‘अर्ध-तानाशाह’ हैं या ‘संकर’ या ‘छद्म लोकतांत्रिक’ या फिर कुछ और ही। यानी वे लोकतंत्र तो नहीं ही हैं।
इतिहास बिना किसी बाधा के सीधी रेखा में प्रगति करता जाए, ऐसा नहीं होता। तानाशाही व्यवस्था से लोकतंत्र तक की यात्राएं अक्सर गलत दिशा में चली जाती हैं और कुछ तो पुरानी व्यवस्था में लौट जाती हैं। हाल ही में हमने जिन क्रांतियों को बड़े उत्साह से देखा, उनमें से कुछ में सरकार बनते ही लोकतंत्र की चूलें हिलती दिखाई दीं। जॉजिर्या और किर्गिस्तान में क्रांति करने वाले नेताओं ने सत्ता में पहुंचते ही अपना तानाशाही चरित्र दिखाना शुरू कर दिया। वहां मीडिया पर पाबंदियां लगा दी गईं और नागरिक अधिकारों में कटौती की जाने लगी। यूक्रेन में 2005 में जब विक्टर यानूकोविच ने मतदान के दौरान सत्ता में बने रहने के लिए भारी पैमाने पर घपले किए, तो उनके खिलाफ प्रसिद्ध ऑरेंज क्रांति हुई। लेकिन 2010 में जनता ने उन्हें फिर से चुनकर सत्ता में पहुंचा दिया। जनता ने उन्हें चुना इसमें कोई दिक्कत नहीं है, दिक्कत यह है कि सत्ता में पहुंचते ही उन्होंने फिर से तानाशाहीपूर्ण रवैया अपना लिया।
अरब देशों में जो हुआ, उसके अंजाम के बारे में अभी कुछ कहना ठीक नहीं होगा। मिस्र में फौज ने देश को लोकतंत्र की ओर ले जाने का वायदा किया है, लेकिन उसका व्यवहार शक पैदा करता है। मनचाहे ढंग से गिरफ्तारियां करना, नागरिकों पर सैनिक अदालतों में मुकदमा चलाना, प्रदर्शन करने वाली लड़कियों के कौमार्य परीक्षण करवाना, इस सबसे बहुत उम्मीद नहीं बंधती। लीबिया में लोकतांत्रिक समाज की स्थापना का काम त्रिपोली पर कब्जे से कहीं ज्यादा कठिन काम है।
बेशक, लीबियाई लोगों को अपनी जीत का जश्न मनाने का पूरा हक है। अगले हफ्ते गद्दाफी की सत्ता के 42 साल पूरे होने वाले थे। अब उसका जश्न कभी नहीं मनेगा। बीस साल पहले पूर्वी यूरोप के देशों ने राह दिखाई थी। अब लीबिया और पश्चिम एशिया के देशों ने दिखाया है कि सबसे क्रूर तानाशाहों का किस तरह विरोध किया जाए और उन्हें किस तरह हटाया जाए। लेकिन अफ्रीका और एशिया का क्या होगा? फिलहाल कोई नहीं मानेगा कि वहां ऐसा हो सकता है।
लेखक विलियम जे डॉबसन ”फॉरेन पॉलिसी” पत्रिका के पूर्व प्रबंध संपादक हैं. उनका यह लिखा हिंदुस्तान अखबार में प्रकाशित हुआ है. वहीं से साभार लेकर इसका प्रकाशन भड़ास4मीडिया पर कराया गया है.


