उत्तराखंड में इन दिनों जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर आंदोलन चल रहे हैं। कहीं समर्थन में तो कहीं विरोध में। बांध समर्थकों की एक नई जमात खड़ी हो गयी है। यह गठजोड़ सरकार, बांध बनाने वाली कंपनियों और ठेकेदारों का है। इनमें इस बीच सरकार से नजदीकियां रखने वाले कुछ बुद्धिजीवी भी जुड़ गये हैं। जलविद्युत परियोजनाओं के समर्थन में पिछले दिनों पद्यमश्री प्राप्त दो महानुभावों ने अपने सम्मान वापस देने की चेतावनी दे डाली। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अचानक बांधों के समर्थन में खड़ा हो गया। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने पद संभालते ही पहला काम बांधों के समर्थन का किया। इन सबका मानना है कि जलविद्युत परियोजनायें यहां की आर्थिकी और रोजगार के लिये जरूरी हैं। साधु-संत गंगा की अविरलता को लेकर बांधों के खिलाफ हैं। अगर गंगा की अविरलता नहीं रहेगी तो करोड़ों की आस्था की चिन्ता उन्हें है। स्वयंसेवी संगठनों को लगता है कि बांध बनने से पर्यावरण को भारी नुकसान होगा। इसलिये वे बांधों का विरोध कर रहे हैं। इन सबके बीच पिछले चार दशक से अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिये संघर्शरत लोगों की सुनने को कोई तैयार नहीं है। उनके पूरे आंदोलन को कभी आस्था कभी विकास तो कभी पर्यावरण के नाम पर हाशिये पर धकेला जा रहा है। असल में जलविद्युत परियोजनाओं का विरोध आस्था और पर्यावरण का नहीं है, बल्कि यह हिमालय को बचाने की लड़ाई है। आस्था और पर्यावरण भी तभी तक हैं जब तक हिमालय है। विकास के नाम पर जिस तरह से हिमालय को सुरंगों के हवाले किया जा रहा है वह आने वाले दिनों मे पूरे देश के लिये भारी खतरे के संकेत हैं।
विकास, आस्था और पर्यावरण के इस फरेब के बीच हिमालय और हिमालयवासियों के दर्द को समझना बहुत आवश्यक है। मध्य हिमालय दुनिया के सबसे कच्चा पहाड़ हैं। उत्तराखंड में नीति-नियंताओं ने माना है कि यहां की जल संपदा से चालीस हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा सकता है। इसके लिये उन्होंने एक उपाय सुझाया है जिलविद्युत परियोनायें बनाने का। इसकी शुरुआत सत्तर के दशक में टिहरी बांध निर्माण से हुयी। 2400 मेगावाट की इस परियोजना को दुनिया की सबसे बड़ी परियोजनाओं में से एक बताया गया। सरकारों ने कहा कि इससे पहाड़ का जीवन बदल जायेगा। देश की संपन्नता में यह बांध मील का पत्थर साबित होगा। इसके लिये सांस्कृतिक और ऐतिहासिक शहर टिहरी के अलावा 125 गांवों को जलसमाधि दे दी गयी। बड़ी संख्या में लोगों का विस्थापन हुआ। जिस परियोजना से दावा किया जा रहा था कि इससे 2400 मेगावाट बिजली पैदा होगी उससे आज मात्र 700 मेगावाट बिजली का उत्पाद हो पा रहा है। इससे नीतिकारों को समझ जाना चाहिये था इस तरह की परियोजनायें कभी भी विकास का मानक नहीं होती।
लगता है सरकारों ने मुनाफा कमाने वाली कंपनियों के हितों के सामने सर्मपण कर दिया है। अगर सरकारें अपनी तरह से काम करती रही तो आने वाले दिनों उत्तराखंड में 558 बांध अस्तित्व में आ सकते हैं। मौजूदा समय में अलकनन्दा और भागीरथी पर 76 से अधिक बांध बन रहे हैं। आने वाले दिनों में 176 बांध उत्तराखंड में होंगे। इन बांधों से निकलने वाली सुरंगों की लंबाई 1600 किलोमीटर से अधिक है। बदरीनाथ से लेकर देवप्रयाग तक की 135 किलोमीटर की लंबाई में 76 बांध प्रस्तावित हैं। औसतन हर तीन किलोमीटर पर एक बांध बनेगा। इन सभी बांधों से दो से लेकर नौ किलोमीटर तक की सुरंगे बनने वाली हैं। एक अनुमान के अनुसार अगर ऐसा होता है तो उत्तराखंड की 27 लाख से अधिक आबादी इन सुरंगों के ऊपर होगी। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर जोशीमठ के नीचे से तपोवन-विष्णुगाड परियोजना के लिये सुरंग खोद दी गयी है। जोशीमठ के सामने बसे चांई गांव को विष्णुगाड परियोजना के पावर हाउस ने पहले ही लील लिया है। चमोली के छह गांव पहले ही नेस्तनाबूत हो गये हैं, जबकि 38 गांवों पर भूस्खलन का खतरा मंडरा रहा है। पर्यावरण की प्रहरी रही गौरा देवी का गांव और रैंणी जंगल ताला जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंग के उपर आ गया है। दो वर्ष पहले बागेश्वर जनपद के कपकोट में सरयू नदी पर बन रही परियोजना की सुरंग की जद में आकर स्कूल का भवन टूट गया था। इसमें 18 बच्चों की मौत हो गयी थी।
यह एक मोटा आंकड़ा है उत्तराखंड में जलविद्युत परियोजनाओं का। इसे नजरअंदाज कर कुछ बुद्धिजीवियों ने कहा कि बिना जलविद्युत परियोजनाओं के यहां का विकास संभव नहीं है। वे मानते हैं कि इन परियोजनाओं से रोजगार मिलेगा, पलायन रूकेगा और प्रदेश में विद्युत आपूर्ति के अलावा बाहर भी बिजली बेची जा सकेगी। उन्होंने जो तर्क दिये हैं वे बचकाना हैं। दुनिया की कोई भी जलविद्युत परियोजना ऐसी नहीं है जो रोजगार पैदा करती हो। इस तरह की परियोजनायें ठेकेदार और दलाल तो पैदा करती हैं लेकिन रोटी पैदा नहीं करती। हर परियोजना विस्थापन और पलायन को साथ लाती है। विकास का यह विनाशकारी मॉडल हिमालय के संसाधनों को खत्म कर लूटने की साजिश है। यही वजह है कि दुनिया के तमाम देश अपने यहां बने बांधों को तोड़ रहे हैं। वे अपने यहां ऊर्जा के नये स्त्रोत तलाश रहे हैं। परियोजनाओं के समर्थकों का कहना है कि इन विद्युत परियोजनाओं से गांवों को बिजली मिलेगी। यह बात बिल्कुल बेबुनियाद है। राज्य से जो बिजली बनती है वह सेन्ट्रल ग्रिड में जाती है वहीं से बिजली का बंटवारा होता है। पावर हाउस से लोगों के घरों मे सीधे तार नहीं खीचें जाते। राज्य को उसके हिस्से की बिजली मिलेगी और उत्पादन का एक हिस्सा मिलता है जो बहुत कम होता है। जिस तरह से जलविद्युत परियोजनाओं के पक्ष में कुतर्कों से माहौल बनाया जा रहा है यह एक बड़ी साजिश का हिस्सा है। उत्तराखंड में आजादी के बाद लगभग 37 लाख लोगों ने स्थायी रूप से पलायन किया है। राज्य बनने के इन 12 वर्षों में ही राज्य से 19 लाख स्थायी रूप से पहाड़ छोड़ चुके हैं। राज्य के पौने दो लाख घरों में ताले लटके हैं। दो साल पहले आयी आपदा ने लगभग 3500 गांवों को अपनी चपेट में लिया। पहाड़ पर जमीनों का टूटना जारी है। इससे पलायन और तेज हुआ है। कृषि से लेकर और रोजगार घटे हैं। अब इन बांधों के निर्माण से पांच लाख लोगों के विस्थापन का खतरा मंडरा रहा हे। सिर्फ पंचेश्वर बांध से ही सवा लाख लोगों का विस्थापन होगा। तब यह सवाल है आखिर ये पद्मश्री प्राप्त बुद्धिजीवी किनकी लड़ाई लड़ना चाहते हैं।
दूसरा पक्ष हैं बांधों के विरोध करने वालों का। इनमें साधु-संतों के अलावा पर्यावरणविद हैं। साधु-संतों को गंगा अविरल चाहिये, स्वच्छ चाहिये। गंगा को वे अपनी मां मानते हैं। दुनिया और विशेषकर यूरोप के देशों में नदियों को कोई अपनी मां नहीं मानता। वहां गाय और पेड़ भी पूजे नहीं जाते हैं। बावजूद इसके वहां की नदियों को साफ रखने की संस्कृति है। वहां की किसी भी नदी से आप पानी पी सकते हैं। किसी छोटे नाले को भी उन्होंने प्रदूषण से मुक्त रखा है। वहां के लोगों ने अपने जंगलों को और जैव विविधता को बनाये रखा है उससे नदियों को मां और पेड़ों को भगवान मानने वाले संतों को सबक लेना चाहिये। संत-महात्माओं को अभी भी अपने आस्था के दरकने की चिन्ता है। वे इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि जब लोग रहेंगे तभी आस्था रहेगी। वे गंगा को बचाने की बात तो करते हैं, धारीदेवी की चिन्ता तो उन्हे हैं लेकिन गंगा में आचमन करने और धारी देवी को पूजने वाले लोगों के बारे में नहीं सोचते। असल में नदियों के किनारे रहने वाले लोगों और हिमालय की जैव विविधता को बनाये रखने वाले गांवों और आबादी को बचाये रखना बहुत जरूरी हे। यदि वहां के गांव खाली होते हैं तो हिमालय और गंगा को कोई नहीं बचा सकता। पिछले दो दशक से खाली होते गांवों ने इस बात को साबित भी किया है। तथ्य यह है कि कई वनस्पतियां और प्राणी ऐसे हैं जो बिना मनुष्य के नहीं रह सकते। जिन जगहों पर पर बसावट नहीं होगी वहां का पारिस्थितिकी संतुलन अपने आप बिगड़ जाता हे। उत्तराखण्ड में मौजूदा समय में चालीस हजार से ज्यादा एनजीओ काम कर रहे हैं। ये सभी पर्यावरण संरक्षण, जंगलों को बचाने, जलस्त्रों के संरक्षण और नदियों पर काम कर रहे हैं। राज्य में सत्रह हजार गांव हैं। इस लिहाज से हर गांव में तीन एनजीओ काम कर रहे हैं। इन्हें देश-विदेश से भारी पैसा मिलता है। दुभार्ग्य से जितनी एनजीओ और उनके काम करने का क्षेत्र बढ़ा उतना ही पहाड़ से पानी, जंगल और पर्यावरण गायब होता गया। इसलिये पहाड़, विकास, पर्यावरण और गंगा के बारे में नये सिरे से सोचने की जरूरत है।
पिछले दिनों से गंगा को बचाने, विकास और पर्यावरण की इस बहस के बीच उन सवालों को तलाशना जरूरी है जो वहां के निवासियों के लिये परेशानी का कारण बने हैं। इन दिनों उत्तराखंड में जलविद्युत परियोजनाओं के समर्थन में जिस तरह से एक सुनियोजित षडयन्त्र कुछ बुद्धिजीवी कर रहे हैं उससे हिमालय में मुनाफाखोरों की पैठ मजबूत हो रही है। असल में यह विकास के नाम पर हिमालय में विनाशकारी विकास के मॉडल को लाने की साजिश का हिस्सा है। मध्य हिमालय में बन रही टनलों को बनाने के लिये उपयोग की जा रही तकनीक ने पहाड़ों को हिला दिया है। प्रतिवर्ष मानवजनित आपदा से पहाड़ डरे-सहमे हैं। लगातार भूस्खलन और पहाडों के टूटने की घटनायें सामने आ रही हैं। उत्तराखंड में जहां भी बांध बन रहे हैं उसके चारों ओर 15 किलोमीटर की दूरी तक सारे जलस्त्रोत सूख गये हैं। टिहरी के पास प्रतापनगर का क्षे़त्र प्रतिवर्ष अपने सैकड़ों जलस्त्रोतों को खोता जा रहा है। इन क्षेत्रों से पलायन लगातार जारी है। रही-सही कसर सरकारी योजनाओं ने पूरी कर दी है। अब पहाड़ इन बांधों से अपने ताबूत में अन्तिम कील ठुकने के इंतजार में है। इसलिये गंगा और हिमालय के सवाल को यहां के लोगों की बेहतरी के साथ जोडकर देखा जाना जरूरी है। सबको यह बात समझनी होगी कि हिमालय जब तक बसेगा नहीं वह बचेगा भी नहीं। गंगा को आचमन के लिये बचाने की लफाजी, पर्यावरण की राजनीति और विकास के छलावे से बाहर निकालकर जनता के दर्द को समझते हुये गांवों को बचाने की पहल होगी चाहिये। गांव रहेंगे तो गंगा रहेगी।
चारु तिवारी जनपक्ष आजकल के कार्यकारी संपादक हैं.


