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गुन्डागर्दी में रिलायंस को पीछे छोड़ा आदित्य बिरला ने

सिंगरौली के विभिन्न जन संगठनों के सहयोग से और लोकविद्या आश्रम के संयोजकत्व में आदिवासी किसान कामगार एकता के लिए निकली लोकसंघर्ष यात्रा के चैथे दिन बरगवां क्षेत्रा मे लग रहे हिन्डालको के एल्युमिनियम प्लान्ट और कैप्टिव पावर प्लान्ट के उन क्षेत्रों में पहुंची जहां कम्पनी सैकड़ों परिवारों को उजाड़कर जले हुउ कोयले की राख रखने का बांध बना रही है। ओरगड़ी और गिधेर गांव को उजाड़कर ये सारा उपक्रम किया जा रहा है जो मूलतः खेती किसानी करने वाले लोग रहे हैं। जमीन के उर्वरता का आलम यह है कि गांव में किसी को भी अनाज और सब्जियां खरीदने की जरूरत कभी नहीं पड़ी। लेकिन अब सभी लोग बाजार पर निर्भर हैं। सब कुछ खरीदना है और आमदनी का जरिया कोई नहीं। लोगों से बातचीत में आदित्य बिरला समुह द्वारा दूसरी कम्पनियों की तुलना में जारी क्रूरता की सभी हदें तोड़ देने की अंधी दौड़ के भी कई प्रमाण मिले। केवल मौखिक आश्वासनों से आजि़ज आ चुके भोले भाले किसान जब सभी आश्वासन लिखित तौर पर दिये जाने कि मांग पर अड़ गये तो कम्पनी के अधिकारियों ने गुन्डों का इस्तेमाल किया और लिखित आश्वासन के बजाय गोलियों का सहारा लिया।

सिंगरौली के विभिन्न जन संगठनों के सहयोग से और लोकविद्या आश्रम के संयोजकत्व में आदिवासी किसान कामगार एकता के लिए निकली लोकसंघर्ष यात्रा के चैथे दिन बरगवां क्षेत्रा मे लग रहे हिन्डालको के एल्युमिनियम प्लान्ट और कैप्टिव पावर प्लान्ट के उन क्षेत्रों में पहुंची जहां कम्पनी सैकड़ों परिवारों को उजाड़कर जले हुउ कोयले की राख रखने का बांध बना रही है। ओरगड़ी और गिधेर गांव को उजाड़कर ये सारा उपक्रम किया जा रहा है जो मूलतः खेती किसानी करने वाले लोग रहे हैं। जमीन के उर्वरता का आलम यह है कि गांव में किसी को भी अनाज और सब्जियां खरीदने की जरूरत कभी नहीं पड़ी। लेकिन अब सभी लोग बाजार पर निर्भर हैं। सब कुछ खरीदना है और आमदनी का जरिया कोई नहीं। लोगों से बातचीत में आदित्य बिरला समुह द्वारा दूसरी कम्पनियों की तुलना में जारी क्रूरता की सभी हदें तोड़ देने की अंधी दौड़ के भी कई प्रमाण मिले। केवल मौखिक आश्वासनों से आजि़ज आ चुके भोले भाले किसान जब सभी आश्वासन लिखित तौर पर दिये जाने कि मांग पर अड़ गये तो कम्पनी के अधिकारियों ने गुन्डों का इस्तेमाल किया और लिखित आश्वासन के बजाय गोलियों का सहारा लिया।

बृज लाल साकेत पिता राजमन साकेत उन कई उदाहरणों में एक हैं जिनपर गोलिया चलाई गयीं। उन्होंने स्थानीय थाने मे रिपोर्ट भी लिखवाई जिसका कोई फायदा नहीं निकला। अस्पताल में इलाज हुआ और जान तो बच गई लेकिन छर्रे शरीर में अब तक मौजूद हैं। डाक्टर ने छर्रे निकालने से तब तक इन्कार किया है जब तक उसे एफआईआर की प्रतिलिपि न मिले और थाने ने प्रतिलिपि देने में छह महीने लगा दिये। अब आपरेशन में जितने पैसे चाहिये उससे घर का खर्च कई महीनो चल सकता है, इसलिए बृज लाल ने छर्रों के साथ ही जिन्दगी कबूल कर ली है। आज पांचवें दिन की यात्रा मझगवां में बनाये गये विस्थापितों की बस्ती से शुरू होनी है। समय और व्यवस्थाओं की कमी के कारण दिन भर की वार्ताओं का पूरा विवरण दिया जाना सम्भव नहीं है। विस्तृत रिपोर्ट यात्रा के पूरे होने पर हम आप तक पहुंचायेंगे।

रवि शेखर की रिपोर्ट.

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