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चिदर्पिता गौतम ने यमुना किनारे तप किया और पीएम को ज्ञापन भेजा

रुद्रसेना की संयोजक चिदर्पिता गौतम ने आज यमुना के किनारे छट पूजा घाट पर गंगा और समस्त नदियों के हित में एक दिन का तप किया और प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन भेजा। उन्होंने कहा कि गंगा को निर्मल बनाए रखने के लिए संत अपने भक्तों को सलाह देते हैं कि पूजा के फूल गंगा में न डालें, गंगा में साबुन का प्रयोग न करें। सुनकर भक्त समुदाय के अधिकांश लोग मुग्ध हो जाते हैं, पर आश्चर्य के साथ दुख की बात यह है कि उनमें से अधिकांश संतों के पाँच तारा सुविधाओं वाले आश्रमों के सीवर का कचरा, पतित पावनी गंगा में सीधे जा रहा है। कमरों में एसी है, ग्रेनाइट का फर्श है, लॉंन पर करोड़ों का खर्च कर रहे हैं, पर वह एक ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लगवा सकते। ऐसी मानसिकता के संतों की कार्यप्रणाली से साफ है कि यह लोग गंगा आंदोलन के नाम पर सिर्फ और सिर्फ समझौते कर राजनैतिक और आर्थिक स्वार्थों की पूर्ति ही कर रहे हैं।

रुद्रसेना की संयोजक चिदर्पिता गौतम ने आज यमुना के किनारे छट पूजा घाट पर गंगा और समस्त नदियों के हित में एक दिन का तप किया और प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन भेजा। उन्होंने कहा कि गंगा को निर्मल बनाए रखने के लिए संत अपने भक्तों को सलाह देते हैं कि पूजा के फूल गंगा में न डालें, गंगा में साबुन का प्रयोग न करें। सुनकर भक्त समुदाय के अधिकांश लोग मुग्ध हो जाते हैं, पर आश्चर्य के साथ दुख की बात यह है कि उनमें से अधिकांश संतों के पाँच तारा सुविधाओं वाले आश्रमों के सीवर का कचरा, पतित पावनी गंगा में सीधे जा रहा है। कमरों में एसी है, ग्रेनाइट का फर्श है, लॉंन पर करोड़ों का खर्च कर रहे हैं, पर वह एक ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लगवा सकते। ऐसी मानसिकता के संतों की कार्यप्रणाली से साफ है कि यह लोग गंगा आंदोलन के नाम पर सिर्फ और सिर्फ समझौते कर राजनैतिक और आर्थिक स्वार्थों की पूर्ति ही कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि गंगा को असल खतरा बांधों और औद्योगिक कचरे से है। राष्ट्रनदी घोषित होने के बाद गंगा की सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं, पर नीयत और नीति सही न होने के कारण धन सिर्फ बर्बाद ही हो रहा है, क्योंकि समस्या कम होने या रुकने की बजाय लगातार गंभीर होती जा रही है। उन्होंने सलाह दी कि, नदियों में नया कचरा डालना बंद करने पर ही सफाई का कोई औचित्य है। नदियों के प्रति सफाई और जागरूकता अभियान चलाने के साथ-साथ नदियों में कचरा डालना गंभीर अपराध घोषित किया जाना चाहिए। साथ ही विकास के लिए कारखाने भी बेहद आवश्यक हैं पर नीतियाँ गड़बड़ हैं। कानून बनाकर उद्योगपतियों के सामने शर्त रखनी चाहिए कि वह जितना जल दूषित कर रहे हैं, उतना जल स्वच्छ भी करें। 

उन्होंने कहा कि बांध या कारखानों के विरुद्ध सरकार जिस प्रकार मौन है, वैसे ही संत समाज भी अधिक कुछ नहीं कर पाएगा। क्योंकि जो धनपति सरकार चलाते हैं, वही आश्रमों के भी बड़े दानदाता हैं। इसलिए गंगा और अन्य नदियों की रक्षा के लिए आम आदमी को ही आगे आना होगा। उन्होंने देश की जनता से अपील की, कि वह नेतृत्व का इंतज़ार न करें, क्योंकि नेतृत्वकर्ता आपके दम पर सरकार या उद्योगपतियों से तमाम तरह के हित साध सकता है और अगर वास्तव में ईमानदार है, तो भी उसे शक्ति आप से ही मिलेगी। ऐसे में आप जहां भी हैं, जो भी करते हैं, वहीं से और अपने तरीके से गंगा के हित में आवाज़ बुलंद करनी शुरू कर दें। एक बार आप सब उठ खड़े हुये तो गंगा को प्रदूषण मुक्त होने से कोई नहीं रोक पाएगा।

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