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चैनलों में कार्यरत ‘राज्‍य सभा’ और ‘लोकसभा’ के पत्रकार

राजनीति में गर कोई पड़े पद (मसलन – प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री) पर बैठा व्यक्ति पिछले दरवाजे (राज्य-सभा या विधान-परिषद्) से चुनकर आता है तो उस पर ये आरोप लगते हैं कि- ये ज़मीन से जुड़े लोग नहीं हैं। ऐसे लोगों को ड्राइंग-रूम पोलिटिशियन कहा जाता है। खुद कई पत्रकार, कई बार, इन्हें “ज़मीन से जुड़ा हुआ नेता” करार नहीं देते। इन ड्राइंग-रूम पोलिटिशियन के बारे में ये भी कहा जाता है कि – ये नेता अपनी काबिलियत के बल पर चुनाव नहीं जीत सकते, लिहाजा जुगाड़ के बल पर, पिछले दरवाज़े से चुन कर आते हैं। पर बहुत कम लोगों का ध्यान इस बात पर गया होगा कि – यही हाल स्वयंभू “राष्ट्रीय-मीडिया” संस्थान के पत्रकारों का भी है। इन पत्रकारों में ज़्यादातर “बड़े पत्रकार” कहे जाने वाले महानुभाव भी कभी दिल्ली या मुंबई से बाहर नहीं जाते, पर हिन्दुस्तान के बड़े पत्रकारों में इनका नाम शुमार होता है। स्ट्रिंगर  के बल पर स्टोरी मंगा कर स्टूडियो से ही लफ्फाजी करने वाले ये पत्रकार “राज्यसभाई पत्रकार” माने जाते हैं।

राजनीति में गर कोई पड़े पद (मसलन – प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री) पर बैठा व्यक्ति पिछले दरवाजे (राज्य-सभा या विधान-परिषद्) से चुनकर आता है तो उस पर ये आरोप लगते हैं कि- ये ज़मीन से जुड़े लोग नहीं हैं। ऐसे लोगों को ड्राइंग-रूम पोलिटिशियन कहा जाता है। खुद कई पत्रकार, कई बार, इन्हें “ज़मीन से जुड़ा हुआ नेता” करार नहीं देते। इन ड्राइंग-रूम पोलिटिशियन के बारे में ये भी कहा जाता है कि – ये नेता अपनी काबिलियत के बल पर चुनाव नहीं जीत सकते, लिहाजा जुगाड़ के बल पर, पिछले दरवाज़े से चुन कर आते हैं। पर बहुत कम लोगों का ध्यान इस बात पर गया होगा कि – यही हाल स्वयंभू “राष्ट्रीय-मीडिया” संस्थान के पत्रकारों का भी है। इन पत्रकारों में ज़्यादातर “बड़े पत्रकार” कहे जाने वाले महानुभाव भी कभी दिल्ली या मुंबई से बाहर नहीं जाते, पर हिन्दुस्तान के बड़े पत्रकारों में इनका नाम शुमार होता है। स्ट्रिंगर  के बल पर स्टोरी मंगा कर स्टूडियो से ही लफ्फाजी करने वाले ये पत्रकार “राज्यसभाई पत्रकार” माने जाते हैं।

ज़्यादातर चैनल्स में “बड़े पत्रकार” कहे जाने वाले महानुभावों के करियर पर नज़र डालेंगे तो पता चलेगा कि – ये लोग निर्मल बाबा से भी ज़्यादा चमत्कारी हैं। दिल्ली-मुंबई के बाहर बिना गए, ये पत्रकार हिन्दुस्तान को जान गए और अब “अनुभवी पत्रकार” कहलाने लगे। ठीक वैसे ही, जैसे बिना चुनाव जीते, कई नेता “बड़े नेता” कहलाये जाने लगते हैं। इन “राज्यसभाई पत्रकारों” का (६-१२ महीने का छोटा सा भी) अनुभव किसी छोटे शहर, गाँव या कस्‍बे का नहीं होता, बल्कि दिल्ली और मुंबई तक सीमित होता है। दिल्ली या महानगरों में जन्म, परवरिश, पढ़ाई – और फिर यहीं नौकरी। फिर भी सारे हिन्दुस्तान के चुनिन्दा पत्रकारों में गिनती। है न- निर्मल बाबा से भी बड़ा चमत्कार? विनोद दुआ, पुण्य-प्रसून वाजपेयी, राजदीप सरदेसाई, अजय कुमार, मनोरंजन भारती, कमाल खान, निखिल वागले, रवीश कुमार, आशुतोष, योगेश दामले और प्रबल प्रताप जैसे तमाम बड़े कहे जाने वाले पत्रकार हैं, जिन्होंने “राज्यसभा” की बजाय “लोकसभा” का रास्ता चुना और अपनी काबिलियत और ज़मीन पहचानने की ताक़त की बदौलत “लोकसभाई पत्रकार” बने (दुःख की बात ये है कि “लोकसभाई रास्ता” को पत्रकारिता की बुनियाद समझने वाले ये पत्रकार भी अपने मातहत “राज्यसभाई रास्ता” अख्तियार करने वालों को जगह दे रहे हैं। अलावा इसके, आज इनके काम करने के तरीकों पर या इन पर पूंजी का गुलाम बनने का आरोप लगाया जा सकता है, पर यक़ीनन इनका शुरुवाती पेशेवर रास्ता “लोकसभा” वाले रास्ते से होकर ही गुज़रा)।

जहां तक स्ट्रिंगर की बात है, तो वो ज़्यादातर (अपवाद हर जगह होते हैं) “लोकसभा” से ही आते हैं। क्योंकि इनका तजुर्बा ज़मीनी होता है, स्टूडियो या दिल्ली-मुंबई की ज़मीन तक सीमित नहीं होता। मैं चैनल मालिकों की राय जानना चाहता हूँ, उन पत्रकारों के बारे में, जिन्हें चैनल के मालिकों ने बिना ज़मीनी तजुर्बे के “राष्ट्रीय मीडिया” की कमान सौंप दी या अपने स्वयंभू “राष्ट्रीय संस्थान” का “अनुभवी चेहरा”  घोषित कर रखा है। इन “राज्यसभाई पत्रकारों” को किस बिना पर योग्य या अनुभवी घोषित किया गया है, इसका स्पष्टीकरण चैनल मालिकों को देना चाहिए। १२० करोड़ की जनसंख्या वाले मुल्क (जिसका ७५% तबका आज भी गाँव-कस्बों या छोटे शहरों में रहता है) में दिल्ली और मुंबई, प्रभावशाली पर एक छोटा सा हिस्सा भर है। इन हिस्सों में रहने वाले लोग खुद को औरों से ज्यादा काबिल मानते है। महज इन हिस्सों पर रहने मात्र से अनुभवी कहलाने का चलन बंद होना चाहिए। इस चलन से ना सिर्फ चैनल्स की साख दांव पर लग रही है, बल्कि न्यूज़ चैनल्स के नाम पर “अजब न्यूज़ के गज़ब किस्से”, राष्ट्रीय मीडिया की हंसी उड़ा रहे हैं।

आप नज़र उठा कर देखिये तो ज़्यादातर चैनल्स में “राज्यसभाई पत्रकार” पत्रकारों या एंकर्स का जमावड़ा है। ये पत्रकार मोटी रकम तनख्वाह के नाम पर लेते हैं, पर बायोडाटा में डेल्ही-मुंबई से बाहर का ज़िक्र भी नहीं होता। राष्ट्रीय राजनीति और पत्रकारिता में लम्बे और ज़मीनी अनुभव का तकाज़ा होना चाहिए। ये बात देश के भावी नेता राहुल गांधी को भी समझ में आती है, जिसके चलते उन्होंने लगातार मेहनत की (भले ही प्रदर्शन निराशाजनक रहा) और आज भी ज़मीन से जुड़े रहने की वकालत कर रहे हैं। राहुल गांधी ने, मनमोहन सिंह जी के राज्यसभा के रास्ते को दरकिनार कर लोकसभा का रास्ता पकड़ा है। जो हिन्दुस्तान जैसे बेहद विशाल देश के संभावित मुखिया के लिए ज़रूरी भी है। वरना राज्यसभा से देश को चलाने पर उद्योगपतियों को मुनाफ़ा कमाने देने का गुण भले ही समझ आ जाए पर देश की नब्ज़ समझ में नहीं आती और आम आदमी महंगाई की मार झेलते-झेलते अधमरा हो जाता है। मनमोहन सिंह इस बात को बखूबी समझते होंगे। कमोवेश यही हाल स्वयंभू “राष्ट्रीय-मीडिया” संस्थान का है, जहां “राज्यसभा” से निर्वाचित पत्रकार चैनल्स को चलाने का अजीबो-गरीब नुस्खा ईज़ाद कर रहे हैं, पर मामला कुछ लोगों को लाभान्वित करने तक ही सीमित रह जा रहा है, “न्यूज़” के नाम पर सिफ़र। ज़मीन से ऊपर उठकर रहने वालों को लाखों की पगार और ज़मीन से जुड़े (स्टिंगर्स) को पेमेंट का रोना। वही मनमोहन सिंह वाली बात (उद्योगपतियों को मुनाफ़ा कमाने देने का गुण, पर देश की नब्ज़ समझ में नहीं आती और आम आदमी महंगाई की मार झेलते-झेलते अधमरा हो जाता है!)।

गर राष्ट्रीय राजीनीति में राज्यसभा से चुना हुआ व्यक्ति, गैर-ज़मीनी या ड्राइंग-रूम पोलिटिशियन माना जाता है, तो बिना ज़मीनी लम्बे अनुभव के राष्ट्रीय मीडिया का चेहरा “अनुभवी” किस बिना पर कहा जाता है? ये सवाल आज हर जगह पूछा जा रहा है क्योंकि ये समझ से परे है – उनके लिए जो लोकसभा और राज्यसभा का अंतर समझते हैं। ये सवाल मीडिया के लोगों से इसलिए पूछा जा रहा है, क्योंकि मीडिया ही राजनीति और नेताओं पर सबसे ज्यादा बहस आयोजित (प्रायोजित?) कराता/करता है। राज्यसभा के चुनाव की बजाय, लोकसभा के चुनाव में उसे (मीडिया को) ज़्यादा दिलचस्पी होती है और होनी भी चाहिए। बिना लोकसभा के कैसी संसद? गर सारे सदस्य राज्यसभा से चुन कर आ जाएँ तो क्या हाल होगा, हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का? ऐसे में लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ, मीडिया के अन्दर भी “राज्यसभाई पत्रकार” बनाम “लोकसभाई पत्रकार” सवाल लाजिमी है। राष्ट्रीय मीडिया के स्वयंभू एडिटर-इन-चीफ ( या  मालिकों) को इसका जवाब देना ही चाहिए कि – आज राष्ट्रीय मीडिया के कर्ता-धर्ता (ज़्यादातर) “राज्यसभा” से ही चुन कर क्यों आ रहे हैं और “लोकसभा” से चुने हुए उम्मीदवार दरकिनार या उपेक्षित क्यों हैं?

लेखक नीरज टेलीविजन पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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