फिल्म माई लिटिल चिकेडी में जज ने फ्लावर बेली ली से पूछा- “तुम्हारी बातों से लगता है कि तुम अदालत के प्रति अवमानना का प्रदर्शन कर रहे हो”? ली ने पूरी मासूमियत से कहा- “नहीं महाशय मैं तो इसे छिपाने की कोशिश कर रहा हूं”। आज पूरे देश में अदालतों को लेकर भी एक ऐसा भाव उपजा है, गनीमत यह है कि अवमानना के डर से इसका उद्गगार उस तरह नहीं प्रकट हो रहा है जिस तरह खासकर निचली आदलतों के प्रति समाज का भाव है। आज यह मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया है। अदालतों खासतौर से हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में नियुक्ति प्रक्रिया को एक बार फिर से परखा जाए। एक बार फिर से यह आवाज़ उठने लगी है कि कोलेजियम पद्धति से होने वाली नियुक्ति जिसमें न्यायपालिका का ही वर्चस्व है, अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पायी है। हाल ही में हुयी कुछ घटनाओं ने इसे और पुख्ता किया है। यह आरोप हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीमकोर्ट तक के जजों तक लगे। माना यह जा रहा है कि पांच सदस्यीय जजों के कोलेजियम के पास वह साधन नहीं हैं जिससे कि चुनाव के पहले अभ्यर्थियों के चरित्र को जांच-परख सके।
अभी हाल ही में केंद्रीय सूचना आयोग ने एक सूचना आयोग ने एक सख्त टिप्पणी में कहा है कि मुख्य न्यायाधीश कार्यालय को सभी सूचनाओं को न देने जैसी कोई व्यवस्था सूचना का अधिकार कानून में नहीं दी गयी है। टिप्पणी में कहा गया है कि सूचना अधिकार कानून से मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को पूरी तरह से बाहर करने संबंधी कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है और साथ ही कानून की धारा 2(एफ) में जिन सूचनाओं को कानून की ज़द से बाहर रखा गया है उसमें इस कार्यालय का नाम शामिल नहीं है। दरअसल आर.टी.आई एक्टिविस्ट सुभाष चंद्र अग्रवाल ने आर.टी.आई के तहत आयोग से यह जानकारी मांगी थी कि जजों की नियुक्ति की तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के.जी बालकृष्णन और कानून मंत्री के बीच में क्या पत्राचार हुआ था। भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय ने वह पत्राचार आयोग को देने से मना कर दिया था। आयोग की टिप्पणी इसी संदर्भ में थी।
न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में बनाए जा रहे संवैधानिक प्रावधानों पर बोलते हुए डॉ. अंबेडकर ने कहा था, “इस बात में कोई शक नहीं है कि भारत का मुख्य न्यायाधीश प्रसिद्ध व्यक्ति होगा लेकिन फिर भी वह एक हमारे आपकी तरह एक आदमी ही होगा और उसमें भी वही गुण-दोष होंगे जो हमारे आप में होते हैं, लिहाजा हम भारत के मुख्य न्यायाधीश को ऐसी शक्ति नहीं दे सकते कि जो हमने राष्ट्रपति या तत्कालीन सरकार को नहीं दी है। लिहाजा मेरा मानना है ऐसा करना ख़तरनाक हो सकता है।” साथ ही अंबेडकर ने यह भी कहा, ”वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हमें नहीं लगता कि हमारे देश में अपनी जिम्मेदारियों के प्रति ऐसी संवेदनशीलता है जैसी कि अमेरिका में दिखायी देती है इसलिए राष्ट्रपति के हाथ में बगैर किसी सीमा-रेखा खींचे नियुक्ति की शक्ति देना खतरनाक हो सकता है। इसी तरह मुझे लगता है कि हर वह नियुक्ति जो कार्यपालिका करेगी उस पर विधायिका की अनुमति लेना भी उपयुक्त नहीं होगा”।
लेकिन हमने देखा कि जैसे-जैसे समय बदलता गया हर संस्था ने जजों के नियुक्ति के अधिकार को अपनी तरफ खींचना शुरू किया लेकिन हमने देखा कि सन 1982 में एस.पी गुप्ता केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला था कि जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका का वर्चस्व होना चाहिए। नतीज़ा यह हुआ था कि ऐसे मामले सामने आए जिसमें मुख्यमंत्री और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एक समझौता करने लगे। उदाहरण के तौर पर अगर हाईकोर्ट के छह पद खाली होते थे तब दो-दो पदों पर मुख्यमंत्री व केंद्र सरकार का उम्मीदवार लिया जाता था और दो न्यायपालिका का। नतीज़तन न्यायाधीशों की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगने लगे। ऐसे मामले सामने आए जिसमें न्यायाधीशों पर राजनीतिक वफादारी का शक होने लगा। लेकिन 11 साल बाद एक नौ-सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने इस पूरे फैसले को उलट दिया। सन 1993 में एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत सरकार मामला सुप्रीमकोर्ट की नौ सदस्यीय बेंच के पास भेजा गया, जिसने अपने 1982 के फैसले को पूरी तरह पलटते हुए कहा कि जजों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश का ही पूर्ण वर्चस्व रहना चाहिए। तब से आज तक लगभग 18 साल से जजों की नियुक्ति न्यायपालिका के ही कोलेजियम द्वारा की जाती है। अब जाकर इस पद्धति में भी दोष पाया गया।
ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में 23 मई 1954 को सर विस्टन चर्चिल ने कहा था- शायद वही लोग जिन्होंने न्यायाधीश का जीवन जिया हो, यह समझ सकते हैं कि एक जज एकाकीपननिष्ठ ज़िम्मेदारी कैसे निभा पाता है। आज भारत में अगर कोई एक संस्था है जिसकी विश्वसनीयता अपेक्षाकृत सर्वाधिक है तो वह है भारत का सर्वोच्च न्यायालय। हाल में जिस तरह से कुछ मामलों में इस संस्था ने अपनी दृढ़ता व निष्पक्षता का परिचय दिया उसने न केवल पूरे सिस्टम को दुरुस्त करने में एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुयी है बल्कि भारतीय समाज के सोच में भ्रष्टाचार को लेकर क्रांतिकारी परिवर्तन भी आया है। बेचैन भारत सरकार के नुमाइंदे को सर्वोच्च न्यायालय में कहना पड़ा, “अदालत अपनी लक्ष्मण रेखा समझे”। यह अलग बात है कि अदालत ने भी उसी तत्परता और उससे बेहतर तर्कशक्ति दिखाते हुए उसी लाक्षणिक शैली में कहा- “अगर लक्ष्मण रेखा न लांघी गयी होती तब रावण का वध न होता”। संस्थाओं के कार्यकलापों का विश्लेषण करना समुन्नत प्रजातंत्र में अपरिहार्य क्रिया मानी जाती है लेकिन कई बार यह विश्लेषण अतिवादी स्वरूप ले लेता है और उन संस्थाओं को ढहाने का काम करने लगता है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि निचली अदालतों को लेकर जनता में एक आक्रोश है और उसे सुधारा जाना निहायत ज़रूरी है। यह भी उतना ही सही है कि अगर अवमानना के अधिकार अदालतों के पास न होते तब यह जनाक्रोश एक दूसरा ही रंग अब तक ले चुका होता। 1968 में लॉर्ड डेनिंग ने अपनी एक टिप्पणी में कहा था- “मुझे तत्काल यहां यह बताना है कि अवमानना का अधिकार हमें अपनी गरिमा को अक्षुण्ण रखने कि लिए कभी नहीं करना होगा क्योंकि गरिमा दूसरी पुख्ता बुनियादों पर खड़ी है और न ही हम इसे किसी की आवाज़ दबाने के लिए इस्तेमाल करेंगे”। लॉर्ड एटकिन्स ने भी कहा था- “न्याय को सामान्य आदमियों की आलोचना झेलना सीखना होगा”।
आज भारत में न्यायिक प्रक्रिया कहीं अपनी पटरी से खिसक गयी है और हाल ही में सुप्रीमकोर्ट को यह पूछना पड़ा कि एल.एन मिश्रा की हत्या का 36 साल पुराना मामला आज तक अधर में क्यों लटका रहा। बेपटरी हुए इस न्याय-प्रक्रिया का एक चौकाने वाला उदाहरण लें। आज समूचे देश में ज़िला व सत्र अदालतों में करीब दो करोड़ फौजदारी मामले हैं जबकि 80 लाख दीवानी के मामले हैं। लेकिन हाईकोर्ट में जाते-जाते यह मामला उलटा हो जाता है और देश के उच्च न्यायालयों में जहां केवल सवा आठ लाख फौजदारी के मामले हैं वहीं 33 लाख दीवानी के मामले हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि चूंकि अधिकांश गरीब ही आपराधिक मामलों में फंसते है और उनकी हैसियत नहीं होती ऊपरी अदालतों में जाने की लिहाज़ा पैसे के अभाव में ऊपर नहीं जा पाते और जेल में सड़ते हैं, जबकि पैसे वाला आदमी आराम से हाईकोर्ट से सुप्रीमकोर्ट तक अपनी ज़मीन-ज़ायदाद के मामले लेकर चला जाता है। उपरोक्त कारण
शायद स्थिति की सबसे प्रबल व्याख्या करते हैं।
लेखक एनके सिंह वरिष्ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्लॉग पोस्टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख आज के राष्ट्रीय सहारा में भी प्रकाशित हो चुका है.


