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जनगणना श्वानसंग्राम सेनानियों की

आजकल हमारी सरकार अलग-अलग डिजायन की जनगणना कराने पर आमादा है। जातियों के आधार पर जनगणना, लिंग के आधार पर जनगणना, आर्थिक आधार पर जनगणना, भाषा के आधार पर जनगणना। लगे हाथ मैं सरकार से कहना चाहूंगा कि वो श्वान संग्राम सेनानियों की भी जनगणना करवाए। इससे सरकार को दो फायदे होंगे। एक तो फालतू पड़े सरकारी अमले से सरकार साधिकार बेगार ले सकेगी साथ ही तेज़ी से घट रहे स्वतंत्रता सेनानियों के स्टाक की भरपायी वह श्वान संग्राम सेनानियों के बूते पर करने का कीमती मौका लपककर आर्थिक मंदी के दौर में भी अपनी असरकारी चुस्ती-फुर्ती से जनता में अपना सिक्का जमा सकती है। श्वान संग्राम सेनानी भारत देश के वो जांबाज लोग हैं जो अपने दुपहिए के आगे अचानक आ जानेवाले कुत्‍तों को बचाने के चक्कर में अपने जीवन में एक-दो बार हाथ-पांव तुड़वाकर अपने प्रबल पराक्रम प्रचंड परिचय दे चुके होते हैं। इस कुत्ताप्रधान देश में ये कुत्ते दुपहियाधारियों के लिए हादसों का निशुल्क कच्चा माल होते हैं। और इस दुर्लभ कच्चे माल को दुर्घटनाग्रस्त होने से बचाने के लिए श्वान संग्राम सेनानी स्वेच्छा से अपनी जान हथेली पर लेकर दुर्दांत स्टंट खेल जाते हैं।

आजकल हमारी सरकार अलग-अलग डिजायन की जनगणना कराने पर आमादा है। जातियों के आधार पर जनगणना, लिंग के आधार पर जनगणना, आर्थिक आधार पर जनगणना, भाषा के आधार पर जनगणना। लगे हाथ मैं सरकार से कहना चाहूंगा कि वो श्वान संग्राम सेनानियों की भी जनगणना करवाए। इससे सरकार को दो फायदे होंगे। एक तो फालतू पड़े सरकारी अमले से सरकार साधिकार बेगार ले सकेगी साथ ही तेज़ी से घट रहे स्वतंत्रता सेनानियों के स्टाक की भरपायी वह श्वान संग्राम सेनानियों के बूते पर करने का कीमती मौका लपककर आर्थिक मंदी के दौर में भी अपनी असरकारी चुस्ती-फुर्ती से जनता में अपना सिक्का जमा सकती है। श्वान संग्राम सेनानी भारत देश के वो जांबाज लोग हैं जो अपने दुपहिए के आगे अचानक आ जानेवाले कुत्‍तों को बचाने के चक्कर में अपने जीवन में एक-दो बार हाथ-पांव तुड़वाकर अपने प्रबल पराक्रम प्रचंड परिचय दे चुके होते हैं। इस कुत्ताप्रधान देश में ये कुत्ते दुपहियाधारियों के लिए हादसों का निशुल्क कच्चा माल होते हैं। और इस दुर्लभ कच्चे माल को दुर्घटनाग्रस्त होने से बचाने के लिए श्वान संग्राम सेनानी स्वेच्छा से अपनी जान हथेली पर लेकर दुर्दांत स्टंट खेल जाते हैं।

गली, सड़क से लेकर हाइवे तक पर्यटन का सुख उठाना इन जागरूक श्वानों का अलिखित मौलिक अधिकार होता है। और कुत्तों के इस मौलिक अधिकार पर हाथ डालने की जुर्रत समाजसेवी संस्थाएं तो क्या खुद सरकार तक नहीं कर पाती है। आखिर कुत्ते भी तो इस देश के सम्मानित नागरिक हैं। कई मायनों में तो आदमी से भी ज्यादा सम्मानित नागरिक। उनके भी तो कुछ मौलिक अधिकार हैं। कुछ असामाजिक सिरफिरों ने जब-जब कुत्तों के मुंह लगने की कोशिश की तो ऐसे सिरफिरों को चौदह इंजक्शनों का दाऱुण दुख तो भोगना ही पड़ा साथ-ही-साथ सामाजिक अपमान की जलालत भी झेलनी पड़ी। उपेक्षा के मामले में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और श्वान संग्राम सेनानियों दोनों की हालत एक जैसी ही है। इन श्वान संग्राम सेनानियों को सरकार से कोई मदद मिलना तो दूर आज तक इन वीरों और वीरांगनाओं की सरकार ने जनगणना कराने तक की जरूरत नहीं समझी। क्या सरकार का यही सामाजिक न्याय है। किसी राजनैतिक पार्टी ने भी संसद तो क्या किसी पंचायत तक में इन बेचारों की आवाज नहीं उठाई। जब कि कुत्तों का अखंड जनता दरबार हर गली में हर हाल में नियमित रूप से लगता है। जहां कि वे अपनी समस्याओं को बेखौफ रखते रहते हैं। लगता है कि ये बेचारे श्वान संग्राम सेनानी ऐसे ही गुमनामी के अंधेरे में एक दिन दफन हो जाएंगे।

ये कुत्तों की ही दहशत थी की महाबली पांडवों ने अपने जीवन में कभी दुपहिये की सवारी नहीं की। पांडवों की इस ओछी हरकत से कुत्ता समाज इतना कुपित हो गया कि एक क्रांतिकारी कुत्ते ने उन्हें यमलोक तक खदेड़ने की ठान ली। और वह अपने मकसद में कामयाब भी हुआ। कुत्ता पीडित श्वान संग्राम सेनानियों का हाल ये हैं कि वो टूटे हाथ-पैर लिए अपनी ही अंटी ढीली करते हुए हॉटडॉग खा-खा कर कुत्तों के खिलाफ अपने विकलांग रोष का इजहार करते रहते हैं। कितनी हाइयेस्ट डिग्री की सविनय अवज्ञा से भरपूर होता है इन बेचारों का यह लजीज़ विरोध प्रदर्शन। इन श्वान संग्राम सेनानियों को नागालैंड के उन रणबांकुरों से सीख लेनी चाहिए जो कुत्तों का फास्टफूड की तरह इस्तेमाल कर सीना तानकर दुपहिए चलाते हैं। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। इस वीर भूमि में शातिर अपराधियों की तरह कुत्ते या तो तड़ी पार हो जाते हैं या फिर भूमिगत रहकर बड़े गोपनीयरूप से अपने संगठन को चलाते हैं।

श्वान संग्राम सेनानियों को चाहिए कि वो बिना समय गंवाए पूरे देश को नागालैंड में विलय कराने का कोई फास्ट ट्रैक रचनात्मक आंदोलन चला डालें। इससे पूर्वोत्तर प्रांत और बाकी देश में सदभाव का रोचक वातावरण बनेगा और दुपहिया वाहन चालकों को कुत्ताजनित हादसों से मुक्ति भी मिलेगी। लेकिन एक बात तय है कि लोकपाल बिल की तरह यह आंदोलन भी किसी सिविल सोसायटी को ही चलाना पड़ेगा। सरकार से तो कोई उम्मीद करना भी महज मुंगेरी लाल का सपना ही होगा। हाल फिलहाल मैं खुद तो श्वान संग्राम सेनानियों के प्रति किंग साइज सहानुभूति से ओतप्रोत होकर एक कुत्ता अपने जीवन में औसत कितने दुपहियावाहन चालकों की वाट लगाता है इस तथ्य पर महत्वपूर्ण शोध करनें में जुट गया हूं। हो सकता है कल सरकार को भी सदबुद्धि आ जाए और वो भी इस मुद्दे पर कोई कमीशन बैठा दे। और श्वान संग्राम सेनानियों की जनगणना का प्रोजेक्ट भी जल्द ही अपने मजबूत हाथों में ले ले।

इस हास्य-व्यंग्य के लेखक पंडित सुरेश नीरव हैं. पंडित जी काव्यमंच के लोकप्रिय कवि हैं. 16 पुस्तकें प्रकाशित. 7 धारावाहिकों का पटकथा लेखन. अंग्रेजी, उर्दू, फ्रेंच में अनुवाद. 30 वर्ष तक कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध. छब्बीस देशों की विदेश यात्राएं. भारत के राष्ट्रपति से सम्मानित. आजकल स्वतंत्र लेखन और यायावरी. उनसे संपर्क सुरेश नीरव, आई-204, गोविंद पुरम, गाजियाबाद या मोबाइल नंबर 09810243966 के जरिए किया जा सकता है.

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