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जमशेदपुर में जीत और हार के मायने

जमशेदपुर संसदीय उपचुनाव का नतीजा आ गया। मुख्यमंत्री बनने की वजह से अर्जुन मुंडा ने यह संसदीय सीट खाली किया था। चुनाव नतीजे बाबूलाल मरांडी के हक में है और भारतीय जनता पार्टी की सिटी पिट्टी गुल है। इस सीट की जीत की अहमियत को समझते हुए ही बीजेपी के आला नेतृत्व ने प्रदेश अध्यक्ष दिनेशानंद गोस्वामी को चुनाव मैदान में उतारा था। गोस्वामी के लिए सरकार और संगठन ने मिलकर ताकत लगाया लेकिन मुश्किल से दूसरे नंबर पर रह पाए। बाबूलाल मरांडी की झारखंड विकास मोर्चा ने एक लाख 43 हजार मतों के अंतर से बाजी मार ली। झारखंड विकास मोर्चा के डा.अजय कुमार के लिए औसतन  दो में से एक मतदाता ने वोट किया और साफ छवि के पूर्व पुलिस अधिकारी ने दो लाख 55  हजार मत पाकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। देश की सबसे पहली औद्योगिक नगरी टाटानगर की जमशेदपुर सीट से जीत के बाद लोकसभा में झारखंड विकास मोर्चा के दो सदस्य हो गए।

जमशेदपुर संसदीय उपचुनाव का नतीजा आ गया। मुख्यमंत्री बनने की वजह से अर्जुन मुंडा ने यह संसदीय सीट खाली किया था। चुनाव नतीजे बाबूलाल मरांडी के हक में है और भारतीय जनता पार्टी की सिटी पिट्टी गुल है। इस सीट की जीत की अहमियत को समझते हुए ही बीजेपी के आला नेतृत्व ने प्रदेश अध्यक्ष दिनेशानंद गोस्वामी को चुनाव मैदान में उतारा था। गोस्वामी के लिए सरकार और संगठन ने मिलकर ताकत लगाया लेकिन मुश्किल से दूसरे नंबर पर रह पाए। बाबूलाल मरांडी की झारखंड विकास मोर्चा ने एक लाख 43 हजार मतों के अंतर से बाजी मार ली। झारखंड विकास मोर्चा के डा.अजय कुमार के लिए औसतन  दो में से एक मतदाता ने वोट किया और साफ छवि के पूर्व पुलिस अधिकारी ने दो लाख 55  हजार मत पाकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। देश की सबसे पहली औद्योगिक नगरी टाटानगर की जमशेदपुर सीट से जीत के बाद लोकसभा में झारखंड विकास मोर्चा के दो सदस्य हो गए।

 

दोबारा खड़ा होने की हिम्मत का हवाला देते हुए भारतीय जनता पार्टी जमशेदपुर की भारी पराजय की गंभीर पडताल करने की बात कह रही है। बीजेपी अगर कारणों की इमानदारी से पड़ताल करेगी तो 17 मार्च 2003 का वाकया उसे बखूबी याद आएगा। झारखंड में सिमटते ओज को बचाना है तो बीजेपी को वह दिन  याद करना भी चाहिए। कोई आठ साल पहले बीजेपी में इस दिन हुए एक फैसले के आसरे बाबूलाल मरांडी निरंतर बढे़ जा रहे हैं। जमशेदपुर की जीत से यह लगभग साबित कर दिया है कि उनकी सक्रियता ने इस आदिवासी बहुल राज्य के बीजेपी नेतृत्व को दिवालिएपन के कगार पर पहुंचाया जा चुका है। संयोग से मार्च 2003 के उस दिन का मैं गवाह हूं। राज्य के पहले मुख्यमंत्री के वैधानिक मीडिया सलाहकार के नाते  काम कर रहा था। तब दिल्ली में बीजेपी नेताओं ने झारखंड में जैसे तैसे सरकार चला लेने की साजिश को अंजाम दिया।

बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व ने पांच निर्दलीयों मंत्रियों की मदद से सरकार चलाने की बाध्यता को खत्म करने पर आमादा मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की झटके में छुट्टी कर दी। साथ ही ” पार्टी विद डिफरेंस ” की रीति नीति को तिलांजली देकर को पार्टी इन पॉवर के वसूल को शिरोधार्य कर लिया। वेंकैया नायडू तब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। राजनाथ सिंह दिल्ली से बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से बेदखल करने का आदेश लेकर रांची आए थे। आडवाणी के चहेते मरांडी आदेश को पढ़कर भौंचक रह गए। क्योंकि पिछली ही रात मरांडी की 16 मार्च को पार्टी नेता आडवाणी से बात हुई थी। आडवाणी के साथ मरांडी की एक किस्म से सहमति बन गई थी कि निर्दलीयों के ब्लैकमेलिंग में फंसने के बजाय विधानसभा भंग करने का रास्ता चुना जाए। आडवाणी को मरांडी ने भरोसा दिया था कि विधानसभा भंग करने से राज्य में बीजेपी को नैतिक बल मिलेगा। नैतिकता के आधार पर लड़ी जाने वाली चुनाव से बीजेपी को राज्य में राज करने के लिए पर्याप्त बहुमत मिल जाएगा। लेकिन जो हुआ वह सामने है।

घोषित तौर पर भ्रष्ट मंत्रियों की जिद के आगे झुकने के बजाय सरकार छोड जनता के बीच जाकर चुनाव कराने पर दृढ मुख्यमंत्री मरांडी ने घेरकर बैठे नेताओं के आगे दलील दी कि निर्दलीयों से छुटकारा नहीं लिया गया तो झारखंड की राजनीति के लिए आने वाला वक्त बुरा होने वाला है। इशारा महज 81 सदस्यों की विधानसभा में किसी एक दल को बहुमत पाने में आने वाली दिक्कतों की तरफ था। शुरू में ही इलाज नहीं होने से यह दिक्कत दस सालों से जस की तस बनी है। नवंबर 2000 में सरकार बनने के बाद से कहने को बीजेपी विधानसभा में हमेशा सबसे बड़ी पार्टी रही लेकिन विडंबना है कि झारखंड में सरकार बनाने के लिए हर बार राजनीतिक तोड़जोड़ का सहारा लेना पड़ा।

खैर, इतिहास में दर्ज है कि उस दिन केंद्र में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी। संगठन में आडवाणी की तूती बोलती थी। केंद्र में सत्तारुढ़ पार्टी की राज्य में सरकार बनी रहे इसके लिए कद्दावर राजनाथ सिंह संवादिया बनकर रांची आए। राजनाथ सिंह को ब्लैक कैट कमांडो का तामझाम हासिल था। बीजेपी की हार के बाद वो साल भर पहले ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी से बेदखल हुए थे और बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व में खास जगह बनाने की तोड़जोड़ में लगे थे। शायद इसलिए भी संकट में फंसी झारखंड की सरकार बचाओ अभियान की सफलता उनके लिए महत्वपूर्ण रही। राजनाथ सिंह ने साथ लाए संदेश का हवाला देते हुए विकासपुरूष के तौर पर पहचान बना चुके मुख्यमंत्री मरांडी को आदेश दिया कि वो अधीनस्थ मंत्री अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाने का रास्ता तैयार करें और उनकी ताजपोशी कर दें। आहत मरांडी ने अनुशासन के नाम पर मनमसोसकर इस नाइंसाफी को मान लिया। तेजतर्रार मुंडा को मरांडी ही झारखंड मुक्ति मोर्चा से बीजेपी में लाए थे। अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बना दिया गया। विक्षुब्ध निर्दलीय मान गए। मुख्यमंत्री बनने से पहले तक अर्जुन मुंडा ने ना तो दिल्ली के केशव कुंज स्थित राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का दफ्तर देखा था और ना ही नागपुर में बसने वाली बीजेपी के प्राणबिंदुओं यानी संघ के केंद्रीय नेताओं से मुंडा का कोई सबाका पड़ा था। फिर भी मुंडा के मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद ही सारा खेल समझ में आ गया। नवनियुक्त अर्जुन मुंडा ने एहसान का निपटारा करने के लिए संदेश लेकर रांची आए राजनाथ सिंह को लौटते वक्त मुख्यमंत्री के विशेष विमान से वाराणसी तक पहुंचवाया। राज्य में बीजेपी के पराभव को समझने के लिए ये कुछ बानगी है।

अब आइए बाकी दलों की हालत को भी समझते हैं। कांग्रेस बरसों तक अलग झारखंड की आवाज को दबाती रही। इसे खामियाजा उसे झारखंड बनने के दस साल बाद भी चुकाना पड़ रहा है। ठोस सांगठनिक आधार तैयार नहीं है। बीजेपी से लोहा लेने के लिए कांग्रेस राज्य में मरांडी का पिछलग्गू बनकर चलने में ही खुद का भला समझती है। दरअसल झारखंड मुक्ति मोर्चा के उदय के बाद से ही कांग्रेस राज्य की राजनीति के इतिहास के काल में समा गई थी। जमशेदपुर उपचुनाव में जमानत जब्त कराने वाली कांग्रेस ने मरांडी के सहारे से उबरने की कोशिश थी और अलग उम्मीद्वार उतारा था। यह कोशिश कांग्रेस पर भारी पड़ी है। आने वाला वक्त बताएगा कि कोशिश से कांग्रेस क्या सबक लेती है? मतलब मरांडी कांग्रेस का सहारा बने रहते हैं या कांग्रेस के सहारे बीजेपी विरोध की नीति पर खडे़ मरांडी विपक्ष की उम्मीद बने रहते हैं।

अलग राज्य बनाने की राजनीति में शामिल होकर बीजेपी ने कोई तीस साल पहले झारखंड में कांग्रेस के स्पेस को हड़पा था। तब से असली लड़ाई झारखंड मुक्ति मोर्चा और बीजेपी के बीच रही। बीजेपी से मरांडी की रुखसती के साथ ही झारखंड मुक्ति मोर्चा के सुप्रीमो शिबू सोरेन का बीजेपी से वैर खत्म सा हो गया। मरांडी से असली चुनौती आदिवासियों की मानस पटल पर बसे झारखंड मुक्ति मोर्चा को हैं। मरांडी और शिबू सोरेन संथाल आदिवासी हैं। राज्य के आदिवासियों में संथालों की आबादी सबसे ज्यादा है। मरांडी के कांग्रेस के करीब जाते ही बुजुर्ग हो चले शिबू सोरेन छिटकर बीजेपी की तरफ चले गए हैं और आज की तारीख में बेटे हेमंत सोरेन को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी दिलवाकर विरासत के हस्तांतरण का नजारा भांप रहे हैं।

हाल के बरसों में आदिवासियों के बीच चर्च और संघ के लिए जारी संघर्ष को किनारे करके उग्र वामपंथ ने नक्सलवाद के नाम पर जगह जरूर बना ली है। पर झारखंड में वामपंथी राजनीति दलों के लिए शुरू से ही कोई जगह नहीं रही। इसकी बड़ी वजह अलग राज्य की लड़ाई में वामपंथी राजनीतिक दलों की भूमिका गौण रही। पड़ोस के पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ हुई ममता बनर्जी का अगर राज्य के बंगाली मतदाताओं पर कोई असर होता तो वह जमशेदपुर उपचुनाव में जरूर दिखता। ममता ने झारखंड मुक्ति मोर्चा से नाराज पूर्व सांसद सुमन महतो को तृणमूल कांग्रेस का टिकट देकर राजनीति का पासा चला था। लेकिन मिष्ठी दोई के जमशेदपुर में कायम बेहतरीन बाजार से सुमन महतो की जब्त हुई जमानत ने बता दिया है कि फिलहाल झारखंड में बंगाल के राजनेताओं की गोटी नहीं चलनी है।

साफ है कि जमशेदपुर में बाबूलाल मरांडी की झारखंड विकास मोर्चा की जीत के निहितार्थ को व्यापक है। इससे आने वाली राजनीति का प्रभावित होना तय है। टूटे मनोबल को जोड़ने के लिए बीजेपी का इल्जाम है कि जमशेदपुर की जीत नक्सलियों से मरांडी के नापाक गठजोड़ का नतीजा है। नक्सलवाद के राज्यव्यापी असर को देखकर कहा जा सकता है कि मरांडी को इस इल्जाम का फायदा आगे भी मिलता रहे। जमशेदपुर संसदीय सीट पर नक्सलियों की सक्रियता का काला इतिहास रहा है। 2007 में नक्सलियों ने जमशेदपुर के सांसद सुनील महतो की हत्या कर दी थी। उपचुनाव के प्रचार का आगाज करते वक्त ही बाबूलाल मरांडी ने  पुत्र अनूप मरांडी समेत 16  ग्रामीणों की नृशंस हत्या करने वाले नक्सलियों के फांसी की सजा को माफ करने की मार्मिक अपील की थी। बाद में झारखंड विकास मोर्चा के प्रत्याशी की नक्सल नेता के साथ सहयोग पर बातचीत की हंगामेदार सीडी को भुनाने की कोशिश हुई। 

जमशेदपुर में साझा उम्मीद्वार खड़ा करने से बचकर सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने अलग अलग उम्मीद्वार खड़ा करके जमीन पर अपनी ताकत आंक ली है। बाबूलाल मरांडी के राजनीतिक चातुर्य के आगे बाकी दल बौने नजर आ रहे हैं। बाबूलाल मरांडी ने असली दांव अर्जुन मुंडा को विधायक बनाने के लिए तीन महीने पहले हुए खरसावां विधानसभा उपचुनाव के दौरान ही लगाया था। उसका मारक नतीजा जमशेदपुर संसदीय उपचुनाव में दिखा है। मुख्यमंत्री मुंडा खरसावां के रहने वाले हैं। मुख्यमंत्री के घर में घुसकर मरांडी ने विपक्ष को पूरी तरह से एकजुट कर दिखाया था। दुनिया भर में टाटानगर के तौर पर मशहूर जमशेदपुर मे जीत के लिए मरांडी ने दोहरी नीति अपनाई। शहरी मतदाताओं के बीच लोकप्रिय पूर्व आईपीएस अफसर अजय कुमार ने जहां शहरी आलोक कुमारमतदाताओं के दरवाजों पर दस्तक देकर झारखंड विकास मोर्चा के लिए मतदान करने का मजबूर किया तो बाबूलाल मरांडी गांव-गांव घुमकर खरसावां की अपील को दोहराते रहे। मुख्यमंत्री के गांव खरसावां जाकर मतदाताओं से कहते रहे कि विधानसभा चुनाव में नहीं सुने कोई बात नहीं। संसदीय चुनाव में सुन लो। जमशेदपुर का नतीजा बताता है कि बीजेपी के खिलाफ मरांडी की बाजीगरी ने शहर और गांव दोनों में पलीता लगाया है।

लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने ‘आज’, ‘देशप्राण’, ‘स्पेक्टिक्स इंडिया’, ‘करंट न्यूज’, होम टीवी, ‘माया’, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं.  झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं.

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