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जय माता दी का जयघोष व घोड़ों की लीद की दुर्गंध भला एक साथ कैसे?

श्राइन बोर्ड ने कटरा से भवन का जो ट्रैक तैयार किया है ऐसा लगता है कि यह सिर्फ व सिर्फ घोड़ों व पालकी वालों के लिए है। आज से करीब 10 साल पहले जब हम वैष्णों देवी यात्रा के इस ट्रेक पर गए थे। तब हालात इतने बुरे नहीं है। करोड़ों रुपए कमाई वाले श्राइन बोर्ड ने पैदल यात्रियों के लिए इस ट्रैक पर चलना लगभग नामुकिन कर दिया है। पता नहीं चलता कि कब पीछे कोई कर्कश आवाज में लगभग धमाकते हुए अंदाजा में साइड के लिए कहेगा या फिर सामने से आचानक कोई उतरता हुआ घोड़ा या खच्चर एकदम आपके सामने खड़ा हो जाएंगे। कटरा से मन में मां के दर्शन की इच्छा लिए हम स्वच्छ मन व तन से जब ट्रैक पर बढ़ते हैं तो रास्ते में दुकानदार व भिखारी परेशान करना शुरू कर देते हैं। फोटाग्राफर, ड्राईफ्ट्स व अन्य दुकानदार आपका बाजू पकड़कर दुकान में ले जाने का प्रयत्न करते हैं। ऐसा क्यों क्या श्राइन बोर्ड का इन पर कोई लगाम नहीं। अगर बात स्वच्छता की करें तो घोड़ों व खच्चरों की लीद अपने दिलों में दिमाग में रच बस जाती है। भवन तक पहुंचते-पहुंचते हम इस दुर्गंध के आदी हो जाते हैं।

श्राइन बोर्ड ने कटरा से भवन का जो ट्रैक तैयार किया है ऐसा लगता है कि यह सिर्फ व सिर्फ घोड़ों व पालकी वालों के लिए है। आज से करीब 10 साल पहले जब हम वैष्णों देवी यात्रा के इस ट्रेक पर गए थे। तब हालात इतने बुरे नहीं है। करोड़ों रुपए कमाई वाले श्राइन बोर्ड ने पैदल यात्रियों के लिए इस ट्रैक पर चलना लगभग नामुकिन कर दिया है। पता नहीं चलता कि कब पीछे कोई कर्कश आवाज में लगभग धमाकते हुए अंदाजा में साइड के लिए कहेगा या फिर सामने से आचानक कोई उतरता हुआ घोड़ा या खच्चर एकदम आपके सामने खड़ा हो जाएंगे। कटरा से मन में मां के दर्शन की इच्छा लिए हम स्वच्छ मन व तन से जब ट्रैक पर बढ़ते हैं तो रास्ते में दुकानदार व भिखारी परेशान करना शुरू कर देते हैं। फोटाग्राफर, ड्राईफ्ट्स व अन्य दुकानदार आपका बाजू पकड़कर दुकान में ले जाने का प्रयत्न करते हैं। ऐसा क्यों क्या श्राइन बोर्ड का इन पर कोई लगाम नहीं। अगर बात स्वच्छता की करें तो घोड़ों व खच्चरों की लीद अपने दिलों में दिमाग में रच बस जाती है। भवन तक पहुंचते-पहुंचते हम इस दुर्गंध के आदी हो जाते हैं।
कहने को कहीं-कही पर घोड़ों के लिए लोहे की रोड लगा ट्रैक का बांटने की कोशिश की गई है। जो विभाजन बिल्कुल सही नहीं है। उन के लिए कोई ऐसा ट्रैक बनाया जाए जिससे श्रद्धालु दुर्गंध से बचे रहें। श्राइन बोर्ड ये क्यों नहीं समझता कि यहां आने वाले सभी भक्त सवारी के लिए घोड़ा पालकी नही ले सकते। घोड़ों की संख्या में लगातार इजाफा कर बोर्ड क्या संकेत देना चाहता है। बोर्ड ये क्यों भूलता है ट्रैक पर पदयात्रा भक्तों की भावानओं से जुड़ा है। वे मां वैष्णों देवी तक कठिनाइयां झेल कर पैदल पहुंचना चाहते हैं। ट्रैक पर ऐसे दुकानदारों दुकान खोलने की इजाजत प्रशासन व श्राइन बोर्ड क्यों देता है तो एमआरपी से कहीं अधिक कीमत पर सामान बेच रहे हैं। सभी लोग सोचते हैं कि एक दिन के लिए क्या और कहां कैसे शिकायत करें। क्या प्रशासन व श्राइन बोर्ड ने आंखें मूंदे हुई हैं।

जारी….

रजनी मलिक

गाजियाबाद

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

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