जिस कानून को आजादी के समय से ही मंजूरी मिल जानी चाहिए थी आखिर वह सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद मिल ही गयी। शिक्षा का अधिकार कानून पूरे देश में लागू हो गया। अब गरीबों के बच्चे भी आभिजात्य वर्ग के बच्चों के साथ उन्हीं की क्लास में पढ़ाई कर सकेंगे। इस कानून की जितनी सराहना की जाए उतनी कम है। इससे बच्चों के सपनों की उड़ान में कोई अंतर नहीं रहेगा। कुछ लोग निजी स्वार्थवश अब भी इस कानून को भ्रमित करने में लगे हुए हैं मगर लगता नहीं कि उन लोगों की अब कोई ज्यादा चलने वाली नही है। अब परिवर्तन का दौर शुरू हो चुका है और यह दौर आसानी से रुकने वाला नहीं है।
पिछले काफी समय से सबके सामने यह बात नजर आ रही थी कि गरीब समुदाय के बच्चे अप्रत्याशित रूप से जीवन में बहुत तरक्की कर रहे थे। जब नजर आता था कि रिक्शा चलाने वाले अथवा खेत पर काम कर रहे लोगों के बच्चे भारत की सर्वश्रेष्ठ सेवा आईएएस में अपना स्थान बना रहे थे तो खुद-ब-खुद लोगों के मन में खुशी का संचार हो रहा था। लोग मान रहे थे कि प्रतिभाएं किसी का मोहताज नहीं होती मगर संसाधनों के अभाव में इन बच्चों की संख्या काफी कम थी। बच्चों के स्कूल जाने की उम्र से ही उनके साथ भेदभाव किये जाने का क्रम जारी हो जाता है। गरीब घरों के बच्चों के लिए स्कूल जाना बड़ा मिशन होता है। ऐसा कोई अभिभावक नहीं है जो यह नहीं चाहता हो कि उसका बच्चा पढ़ाई-लिखाई में सर्वश्रेष्ठ न बने। मगर संसाधनों का अभाव और जिंदगी जीने की लड़ाई उसे इस योग्य नहीं बना पाती कि वह अपने बच्चे को इस सपने को पूरा करने के लिए अपना बेहतर योगदान देते हुए ये स्कूल की चौखट तक पहुंचा पाये। ऐसे बच्चे के सपने भी स्कूल पहुंचने की जगह अभावों की दुनिया में खो जाते हैं और ये खेत खलिहानों और कारखानों में अपनी जिंदगी पैसा कमाने के लिए खपाना शुरू कर देते है। नतीजा यह बच्चे अपनी जवानी नहीं देख पाते। उनका जीवन बचपन से सीधे बुढ़ापे में कदम रखता है।
इसके विपरीत बच्चों को दूसरा वर्ग आभिजात्य वर्ग से आता है जिनके मां बाप के पास पैसों की कोई कमी नहीं होती। संसाधनों से भरी पूरी उनकी जिंदगी बचपन से ही सपनों की दुनिया में ले जाती है, चकाचौंध करते हुए वातानुकूलित स्कूल, वहां जाने के लिए लग्जरी कार या बसें और उसके बाद बेहतर रिजल्ट देने के लिए बड़ी फीस वाले कोचिंग संस्थान उनके लिए हरदम हाजिर होते हैं। पढ़ाई खत्म करने के बाद जब वह प्रतियोगी परीक्षा में बैठते हैं तो संसाधनों की सीमा खत्म नहीं होती। आम तौर पर देखने में आता है कि आईएएस के बच्चे बड़े आराम से आईएएस बन जाते हैं। यहां भी उन्हें अपने पिता के आभिजात्य होने का पूरा फायदा मिलता है। हमारा शिक्षा तंत्र भी शुरुआती दौर से ही ऐसे आभिजात्य वर्ग के पक्ष में खड़ा नजर आता है। दुनिया के कई ऐसे प्रभावशाली देश हैं, जहां पर हर परीक्षा उनकी मातृभाषा में ली जाती है मगर भारत में सारी महत्वपूर्ण परीक्षाएं अंग्रेजी में ही लेने का चलन बन गया है। यहां पर बच्चों को शुरू से यह सिखा दिया जाता है कि अगर वह अच्छी अंग्रेजी नहीं बोल सकते हैं तो जिंदगी में कभी भी तरक्की नहीं कर सकते। जिस देश के नेतृत्व करने वाले लोग ही संसद में अपनी मातृभाषा बोलने में शर्म महसूस करें तो उस राष्ट्र के सामने यह सोचना भी बेमानी है कि छोटे बच्चों को अपनी भाषा के प्रति प्रेम के बारे में कैसे समझाया जा सकता है।
जब निजी स्कूल सरकारी जमीन लेने का दावा करते हैं तब वह शपथ पत्र भी देते हैं कि वह अपने स्कूल में गरीब बच्चों के लिए सीटें आरक्षित रखेंगे। मगर यह बातें सिर्फ बातों तक ही सीमित रहती हैं। हकीकत का इससे कोई लेना देना नहीं होता है। जिन अफसरों को यह स्थितियां निरीक्षण करके देखनी होती हैं उन भ्रष्ट अफसरों के मुंह में चांदी का चम्मच हमेशा रहता है लिहाजा उन्हें कुछ भी दिखाई और सुनायी नहीं देता है। यह बेहद शर्मनाक है। मगर शर्म भी उन्हीं को आ सकती है जिनके जीवन में जरा भी नैतिकता का बोध हो। तंत्र चला रहे लोगों के जीवन में नैतिकता और शर्म जैसे शब्द ही मानो बेमानी हो चले हैं और उन्हें इससे कोई वास्ता बचा नहीं है। ऐसे में जब केन्द्र सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया तो उसके विरोध में बड़ी संख्या में निजी स्कूल सुप्रीम कोर्ट चले गये। सरकार ने भी इसमें कोई ज्यादा रुचि नहीं ली। मगर सुप्रीम कोर्ट ने आखिर यह तय ही कर दिया कि शिक्षा का अधिकार कानून अनिवार्य है और इसे तत्काल लागू किया जाना चाहिए। इसके कुतर्क में निजी संस्थानों ने कहा कि वह सरकार से कोई अनुदान नहीं लेते इसलिए उन्हें पच्चीस प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का दबाव नहीं बनाना चाहिए। मगर उन्होंने यह नहीं कहा कि जब सरकार उनसे मनमानी फीसों पर समुचित टैक्स नहीं ले रही। उनके भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगा रही। उन्हें सरकारी जमीन सस्ती दरों पर दे रही है तो फिर गरीबों के बच्चों की पढ़ाई के लिए उन पर दबाव क्यों नही बनाया जा सकता।
दरअसल हमारे नेतृत्व को गरीब और गरीबी की चिंता सिर्फ वोटों के लिए ही होती है। गरीब उनके लिए सिर्फ एक वोट होता है जिसे उन्हें सत्ता प्राप्त करने के लिए हासिल करना ही होता है। अगर आजादी के समय ही तय किया जाता कि भारत जैसे देश में सभी बच्चों के लिए शिक्षा के पैमाने एक जैसे
रखे जायेंगे तो इस देश की तस्वीर ही दूसरी होती। अगर कक्षा में अमीर बच्चे के बराबर में बैठकर रिक्शा चलाने वाले व्यक्ति का बेटा भी अपना बचपन गुजार रहा होता तो इस देश में आभिजात्य वर्ग को बचपन से ही गरीबी का एहसास निकट से हुआ होता। आज जैसे काबिल अफसर और पूंजीपति आम आदमी को जिस तरह हिकारत भरी दृष्टि से देखते हैं वैसा नहीं हुआ होता। भारत दुनिया का सबसे मजबूत प्रजातंत्र वाला देश है। यहां की परंपरायें गौरवशाली हैं मगर यह तभी रह सकती है जब देश में संसाधनों पर अमीरों और गरीबों का बराबर का हक हो। अगर ऐसा नहीं होता तो देश में विद्रोह की भावना बढ़ती रहेगी और स्वाभाविक रूप से यह किसी के हक में नहीं होगा। अच्छा यही है कि जिन लोगों के पास संसाधन हैं वह उसका बंटवारा वंचितों के साथ करें। गरीब बच्चे भी उतने ही प्यारे हैं जितने हमारे और आपके। इन्हें दुलार के साथ पढ़ाई का मौका मिलना ही चाहिए।
लेखक संजय शर्मा लखनऊ से प्रकाशित वीकेंड टाइम्स के संपादक हैं.


