अर्से से अवसाद में डूबा मुल्क का अवाम उत्साह और उल्लास से लबरेज हो उठा है। अन्ना हजारे की मांगों से असहमत राजनीतिज्ञों के समूहों ने उनके अनशन से आशंकित और अवाम के आक्रोश से आतंकित होकर संसद में अपनी सर्वसम्मति जाहिर की है। नतीजतन, बमुश्किल ढाई माह पूर्व 4 जून की मध्य रात्रि में देश की राजधानी के जिस रामलीला मैदान पर सत्ताधीशों के इशारे पर वर्दीधारियों के बूटों की धमक, उनके डंडों की बेरहम फटकार, मासूमों का रूदन, महिलाओं की चीत्कार, वृद्धों की कराह और स्वामी रामदेव की बेबसी पसरी दिखाई दी थी, वही रामलीला मैदान बाबू किशनराव हजारे के तप के रश्मि रथ पर सवार संभावनाओं के सूर्य के प्रकाश से घनी अंधियारी रात में नई सुबह का बोध करा रहा है।
बारह दिन की कुटिल सियासत के बाद आज सुबह 11 बजे जन लोकपाल के मुद्दे पर चर्चा को मजबूर संसद में सदस्यों के तेवर और नजरिए नई उम्मीद लेकिन हरगिज नहीं जगाते हैं। जनता के प्रतिनिधियों की नौ घंटे तक चली अनवरत बहस में बहुत कम क्षण ऐसे आए, जब लगा कि हमारे यह प्रतिनिधि जन भावनाओं के प्रति समर्पण और सम्मान व्यक्त कर रहे हैं। आज जब पूरा देश एक स्वर में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहा है और इस लड़ाई के प्रतीक अन्ना हजारे के साथ धर्म, जाति, वर्ण और हैसियत भुलाकर एक स्वर में कदम ताल कर रहा है, वहां लोकतंत्र के सर्वाधिक एक स्थान पर बैठे हमारे नुमाइंदे जनभावना को भूल विभाजन की जोड़-जुगाड़ लगा रहे थे।
लालू यादव अन्ना के अनशन का मखौल उड़ाते कह रहे थे कि यह डाक्टरों के लिए शोध का विषय होना चाहिए कि 74 साल का बूढ़ा 12 दिनों तक बिना खाए कैसे जिंदा रह सकता है। ताकि हम भी ऐसा कर सकें। अब यह लालू यादव को कौन समझाए कि यह विषय चिकित्सकीय शोध का नहीं, देश के प्रति समर्पण का है। जब कोई शख्स निस्वार्थ भाव से अपना सर्वस्व समाज और राष्ट्र को समर्पित करने के लिए संकल्पित हो उठता है तो वह ‘अन्ना हजारे’ हो ही जाता है। 40 से चार सीट पर पहुंचे लालू यादव और लोकसभा से राज्यसभा में बैठने के लिए मजबूर हुए रामविलास पासवान ने इस बहस को अपनी खोई जमीन पाने के अवसर से ज्यादा कुछ समझा ही नहीं।
वरुण गांधी, संदीप दीक्षित जैसे अपवादों को छोड़ दिया जाए, तो सभी दल देश और जनता को भूल अपने भविष्य की सुरक्षा को लेकर खासे चिंतित रहे। जो सदस्य खुद भ्रष्टाचार के भवन के कंगूरे बने हुए हैं, वो अपनी नींव में दलित और पिछड़ों की सियासत का ईंट-गारा इस्तेमाल करने से आज भी बाज नहीं आए। रामविलास पासवान हों या लालू प्रसाद यादव, शिवानंद तिवारी हों या रामगोपाल, सब एक स्वर में अन्ना हजारे के प्रति शाब्दिक सम्मान और आंदोलन के प्रति असम्मान ही व्यक्त करते रहे। सुषमा स्वराज और अरुण जेटली समर्थन की आड़ में भविष्य के राजनीतिक लाभ तौलते रहे। यह दोनों दस दिन के असमंजस के बाद अन्ना की मांगों के समर्थन में बोले तो जरूर मगर कोई नई उम्मीद जगा पाने में नाकाम ही रहे। यह समर्थन भी पार्टी के अंदर मौजूद चंद जनप्रतिनिधियों की बगावत का नतीजा था जो जनता की आवाज सुनते हैं। अन्ना हजारे और उनके समर्थक संसद के दोनों सदनों द्वारा उनकी मांगों के संबंध में व्यक्त की गई सैद्धांतिक सहमति को अपनी जीत के नजरिए से देखें, लेकिन दरअसल सरकार भी आज अपनी साजिश में सफल होती ही दिखी। अन्ना बनाम सरकार की लड़ाई आज अन्ना बनाम संसद में तब्दील हो चुकी थी। शरद यादव अपने तरीके से आंदोलनकारियों को हड़का रहे थे, तो लालू प्रसाद यादव गरिया रहे थे। शिव सेना के अनंत हेगडे़ भी आंदोलन पर अपनी व्यंग्योक्ति करने से नहीं चूके।
मामले का दुखद, चिंतनीय और शोचनीय पहलू आंदोलन को कटाक्ष करती हर बात पर सदन में मौजूद सांसदों के चेहरे पर फैलती मुस्कराहटें थीं। अधिकांश सांसदों की कुंठा इस बात को लेकर थी कि कानून बनाने के हमारे विशेषाधिकार पर अतिक्रमण किया जा रहा है। वह अधिकार जो उन्हें संविधान के तहत मिला है। किस संविधान के तहत, जिसमें गत चौंसठ सालों में आप दर्जनों बार संशोधन अपनी सुविधानुसार करते आए हैं। जनता को कानून बनाने का कहां शौक है, लेकिन भ्रष्टाचार की दीमक से जब आप पूरे देश को ही चट कर जाने में जुट गए हैं, तो सिवाए सड़क पर उतरने के विकल्प क्या रह जाता है। जिस संसद में आप अपने वेतन-भत्ते बढ़ाने के प्रस्ताव को बिना बहस मिनटों में पास करा लेते हैं, उस संसद में एक जनलोकपाल बिल चालीस साल में पास न हो पाने की जवाबदेही पूरी बहस के दौरान किसी ने स्वीकार नहीं की। आज भी यह तय नहीं हो सका है कि लोकपाल बिल का मसौदा कब तक कानून की शक्ल ले लेगा? संसद के दोनों सदनों में पारित प्रस्ताव और मनमोहन सिंह के पत्र पर भरोसा कर अनशन समाप्ति का ऐलान किया गया है। अब सरकार और संसद दोनों ही की ईमानदारी दांव पर है। अपनी नेक नियति साबित करने के लिए बेहद जरूरी है कि जन लोकपाल बिल कानून की शक्ल में बाहर आए। ऐसा न हो कि अन्ना एक और अनशन के लिए मजबूर हों।
फिर भी अन्ना के आंदोलन की यह आंशिक सफलता (पूर्ण सफल तब जब लोकपाल विधेयक पारित होगा) विश्व पटल पर देश की साख को संवारेगी। आज जब दुनिया के तमाम देशों में जनता हिंसा के सहारे मुक्ति का मार्ग तलाश रही है, उस दौर में अहिंसा के मार्ग से गुजरकर सफलता की मंजिल को प्राप्त करने का यह उपक्रम निश्चित ही हमारे आभा मंडल को दीप्त करता है। यह सफलता इन आरोपों को भी खारिज करती है, आजादी के चौंसठ साल में ही महात्मा गांधी केवल बुत बनवाकर माला चढ़वाने और उनके सिद्धांत किताबों में छपने लायक भर रह गए हैं। निश्चित ही रामलीला मैदान का यह संघर्ष

डा. हिमांशु द्विवेदी
लेखक डा. हिमांशु द्विवेदी हरिभूमि के मैनेजिंग एडिटर हैं.


