उत्तर प्रदेश में पांच साल से सत्ता के बाहर रहे एवं मायावती के भय से थर-थर कांपते लोहिया का नाम लेकर गुंडागर्दी करने वाले परम्परागत सपाइयों की भारी जीत की खुशी कब उनके सर पर पर गयी उन्हें पता ही नहीं चला और दर्जनों शहर इन उत्पातियों की चपेट में आ गए. जब अखिलेश यादव लखनऊ में गुंडागर्दी के खिलाफ बयान दे रहे थे तब सपा के लोग पत्रकारों, पुलिसवालों तथा राह चलते लोगों पर कहर बनाकर टूट रहे थे. इधर, टीवी चैनल अपने स्टूडियो में अखिलेश यादव की जीत के कसीदे पढ़ रहे थे और उधर उसकी समाजवादी सेना मीडिया कर्मियों पर हमले कर रही थी. अखिलेश ने बाहुबली डीपी यादव के लिए पार्टी के दरवाजे बंद करके लोगों के दिलों में एक अच्छी जगह बना ली थी. अब उन्हें इन नयी चुनौतियों से निबटना होगा.
अखिलेश को शायद अपना आदर्श किसी पुराने खांटी कथित समाजवादी को नहीं बल्कि वक्त के साथ कदम मिलाकर चलने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मानना होगा और उनको भी गुंडों के साथ वैसा ही व्यवहार करना पडे़गा जिसके वे लायक हों. नीतीश ने सत्ता में आते ही अपने ही दल के गुंडों व माफियाओं को सलाखों के पीछे पहुंचाया और पुलिस को ऐसे अराजक तत्वों को सबक सिखाने की खुली छूट दी. कहते हैं कि न्याय होने के साथ-साथ उसे होते हुए दिखना भी चाहिए. सपा के लिए जनता का इतना विश्वास प्राप्त करना अभूतपूर्व है इसलिए इसे बनाये रखना उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी.
लेखक विजेंद्र रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं.


