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जीत के जोश में होश न खोयें, अभी लड़ाई बाकी है मेरे दोस्त

अन्ना के आंदोलन ने, उनकी अन्नागीरी ने वह कर दिखाया, जो न पहले कभी हुआ है, न निकट भविष्य में होने की उम्मीद है। क्योंकि हर व्यक्ति इस अंतद्र और अटल योद्धा की तरह का न जीवट रखता है और न ही जज्बा। किसी नेक काम के लिए जो प्राणपण से जुट जाये, अक्सर उसे सफल होते ही पाया है लेकिन तब जब वह हृदय से यह निश्चय करे कि उसे विजय से कम कुछ नहीं चाहिए। अन्ना के पुण्य प्रयास से देश और दुनिया ने रामलीला मैदान से गणतंत्र की नयी परिभाषा निकलते देखी, जहां संसदीय प्रणाली की मर्यादा को अक्षुण्ण रखते हुए जन की आवाज को सम्मान दिया गया, उस पर ध्यान दिया गया। क्षुद्र दलगत स्वार्थों से उठ कर जहां सांसदों ने उन गण को मर्यादा दी जिनके मत से उनका तंत्र या कहें संसद बनती और चलती है।

अन्ना के आंदोलन ने, उनकी अन्नागीरी ने वह कर दिखाया, जो न पहले कभी हुआ है, न निकट भविष्य में होने की उम्मीद है। क्योंकि हर व्यक्ति इस अंतद्र और अटल योद्धा की तरह का न जीवट रखता है और न ही जज्बा। किसी नेक काम के लिए जो प्राणपण से जुट जाये, अक्सर उसे सफल होते ही पाया है लेकिन तब जब वह हृदय से यह निश्चय करे कि उसे विजय से कम कुछ नहीं चाहिए। अन्ना के पुण्य प्रयास से देश और दुनिया ने रामलीला मैदान से गणतंत्र की नयी परिभाषा निकलते देखी, जहां संसदीय प्रणाली की मर्यादा को अक्षुण्ण रखते हुए जन की आवाज को सम्मान दिया गया, उस पर ध्यान दिया गया। क्षुद्र दलगत स्वार्थों से उठ कर जहां सांसदों ने उन गण को मर्यादा दी जिनके मत से उनका तंत्र या कहें संसद बनती और चलती है।

रामलीला मैदान ने अन्ना के परहित तप के माध्यम से एक नया इतिहास लिखा, इतिहास लोकतांत्रिक प्रणाली के महत्व का और उसमें लोक की सार्थक व सटीक हिस्सेदारी का। अन्ना के आंदोलन का जिस तरह से विश्वव्यापी असर हुआ उससे संसद और सांसदों तक भी यह संदेश पहुंचा की बंदे में है दम और यह नहीं चाहता जीत से कुछ भी कम। अन्ना की मांगें भी जायज थीं, शायद सांसद भी इस पर सिर्फ और सिर्फ इसलिए एतराज उठा रहे थे कि इससे कहीं उन्हें एहसास कमतरी का बोध हो रहा था। उन्हें लग रहा था कि संसद को परे रख कर जनता की समांतर संसद बनाने का प्रयास किया जा रहा है। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था अन्ना और उनकी टीम बराबार कहती आ रही थी कि संसद पर उन्हें पूरा यकीन है, वह उसका सम्मान करते हैं लेकिन बस यही चाहते हैं कि संसद भी उनकी जायज मांग पर विचार करे। संसद ने देर से सही जायज मांगें मान ली। अब मीडिया में और कई जगह इसे इस रूप में देखा और बताया जा रहा कि संसद झुक गयी। ऐसा कहना अपनी पावन संसद को गौण करना होगा जो कभी नहीं होना चाहिए।

दरअसल इसे इस रूप में देखना चाहिए की गणतांत्रिक प्रक्रिया के सर्वोच्च संस्थान ने जनगण की आवाज सुनी और उसे उचित मर्यादा दी। वैसे लड़ाई तो अभी शुरू ही नहीं हुई, यह तो शंखनाद है भविष्य की उस लड़ाई का जिसे जीतने पर भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़ी गयी जंग को एक सही दिशा और दशा दी जा सकेगी। खुद अन्ना ने कहा है कि यह आधी जीत है, पूरी जीत तो तब होगी जब जन लोकपाल विधेयक कानून की शक्ल ले लेगा और प्रभावी होगा। अन्ना ने देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के घटाटोप अंधेरे में एक लौ जलायी है ताकि प्रकाश के कुछ रास्ते निकल सकें। इस लौ को बुझने नहीं देना है क्योंकि लड़ाई अभी बाकी है मेरे दोस्त। अभी कई अंधेरे कोने हैं जो रोशनी के मुंतजिर हैं। हमें अन्ना के रूप में एक अदम्य, अटल और आदर्श मसीहा मिला है इस कथन को सच साबित कर दिखाया है कि कोशिश करे इनसान तो क्या हो नहीं सकता। अब अन्ना टीम को जीत के जोश में होश नहीं खोना, क्योंकि अभी मंजिल दूर है। यह भी सच है कि इस बार सरकार की जिस तरह किरकिरी हुई है, उसे देखते हुए अगली बार वह अन्ना को दिल्ली में जाकर अनशन कर या आंदोलन करने की इजाजत देगी। ऐसे में यह जरूरी है कि टीम अन्ना और स्वस्थ हो जाने के बाद अन्ना भी देश के कोने-कोने में जाकर अपनी उपलब्धि को बतायें और अपनी अगली लड़ाई (चुनाव प्रक्रिया में सुधार और चुने हुए जन प्रतिनिधि को वापस बुलाने के अधिकार) की बात गंभीरता से समझाये।

अन्ना की सबसे बड़ी जीत यह है कि वे आज देश की धड़कन बन गये हैं। अन्न त्याग कर तप वे कर रहे थे और सांसें देश की थमी थीं। बीतता हुआ एक-एक पल पूरे देश पर भारी पड़ रहा था। याद नहीं आता कि देश आजाद होने के बाद किसी नेता या सामाजिक कार्यकर्ता को जनता का इतना विश्वास और प्यार मिला हो। जनशक्ति कितनी सक्षम और सबल होती है यह तो अन्ना ने देख और दिखा दिया। अब अगर उन्हें देश की शासन प्रणाली और चुनाव प्रक्रिया को सुधारना है तो यह वक्त की मांग है कि वे अपने समानविचारधर्मी लोगों को खोजें और 2014 के चुनावों में संसद भेजने की तैयारी करें। संसद के बाहर से एक संघर्ष तो उन्होंने जीत लिया अगर वे इस देश को गांधी के सपनों का देश बनाना चाहते हैं तो उन्हें अपने आदर्शों के प्रति समर्पित लोगों को चुनाव के माध्यम से संसद तक भेजना ही पड़ेगा। अगर उनके सांसदों का बहुमत है तो फिर उन्हें देश हित में कोई संविधान बनाने में कोई दिक्कत नहीं होगी। यह ऐसा विषय है जिसे टीम अन्ना को सोचना और तदनुसार काम करना चाहिए। जब वे संसद में देश हित की बात कर रहे होंगे तो कोई उनके सामने संसदयी मर्यादा या प्रणाली की दुहाई नहीं दे सकेगा। जैसा इस बार अंत तक हुआ। अन्ना के आंदोलन की एक बड़ी उपलब्धि यह भी रही कि इससे लाखों की संख्या में लोगों के जुड़ने के बावजूद यह अंत तक शांत और शालीन रहा।

अन्ना की सफलता की खुशी देश और विदेश में मनायी गयी, भादौं के महीने में होली और दीवाली दोनों मन गयी। दुनिया ने देखा कि वाकई भारतीय गणतंत्र कितना सुदृढ़, लचीला और गणहित से जुड़ा हुआ है। अन्ना के आंदोलन की खबरों को देशी मीडिया ने तो समर्थन दिया ही विदेशी मीडिया भी पंचमुख से उनकी प्रशंसा करने में पीछे नहीं रहा। जिस भारत के बारे में विदेशी अखबारों में कभी सिंगल कालन खबर छप जाये तो छप जाये उनमें अन्ना के आंदोलन के बैनर में सचित्र खबरें विस्तार से छपीं। यह भी इस बात का द्योतक था कि इस आंदोलन को विश्व-स्वीकृति और समर्थन मिल चुका था।

हमारे देश में भ्रष्टाचार का गणित कुछ ऐसा है कि यह निचले स्तर से शीर्ष तक फैला हुआ है। पटवारी से लेकर पुलिस से लेकर नौकरशाह तक इस पंक में डूबा है। लोगों को कहा जाता है कि न घूस लो, न घूस दो लेकिन इसका क्या किया जाये कि जहां घूस के बिना कोई काम ही न बनता हो। घूस जहां कार्यसंस्कृति में जुड़ गया हो। बहुत लोग तो इसे बड़ा ही शालीन नाम दे बैठे हैं, वे इसे घूस नहीं सुविधा शुल्क के रूप में जानने लगते हैं। हमने आपकी फाइल को एक मेज से दूसरी मेज (भले ही वह एक फुट की दूर पर हो) तक का सफऱ कराया, इस सुविधा के लिए चाय-पानी तो बनता ही है। जहां यह स्थिति है वहां इस दुर्गुण की जड़ पर गहरी चोट करने की जरूरत है जिससे यह हर हाल में खत्म हो।

अन्ना के आंदोलन से कई पक्ष सामने आये। कुछ चेहरों की असलियत पहचानी गयी और कुछ चेहरे अपने ही किये पर इतने शर्मशार हुए कि मुह चुराते नजर आये। कपिल सिब्बल, चिदंबरम एंड कंपनी ने तो पहले ही अपने दल को समस्याओं के दलदल में डालने का काम किया, अन्ना को कानून तोड़ने से पहले बेवजह गिरफ्तार कर के। यह कदम सरकार के खिलाफ ही गया। जिन अन्ना से तब तक पूरा देश नहीं जुड़ पाया था उनसे पूरी सहानुभूति के साथ भारत जुड़ गया। वे जिस जेल में रहे, देश के लोगों का हुजूम वहां इस तरह उमड़ पड़ा जैसे वह तीर्थ स्थल हो। उनके साथ सैकड़ों हजारों लोग गिरफ्तार हुए जिन्हें रखने के लिए एक पूरा स्टेडियम छोटा पड़ा गया और दूसरा स्टेडियम खोलना पड़ा। सरकार इस पर भी नहीं चेती। उसके नेता अन्ना का चरित्र हनन करने लगे ताकि वे हिम्मत हार कर अपना अभियान छोड़ दें। उन्हें सेना का भगोड़ा तक कहा गया हालांकि जब सेना ने असलियत बतायी तो ऐसा कहने वालों के मुंह धुंआ हो गये। उनसे सिर उठाते नहीं बना। आप चांद पर थूकना चाहेंगे तो वह आपके ही सिर पर आयेगा, वैसा रही कांग्रेस के साथ हुआ। लेकिन कांग्रेस इस पर भी नहीं चेती। अन्ना से खेल खेलती रही। कभी यह  एहसास कराती कि बात तो बन ही गयी फिर पता चलता कि नहीं बता तो वहीं लौट आयी जहां थी। इससे अन्ना का जनसमर्थन बढ़ता ही गया। वे रामलीला मैदान आये तो भीड़ और बड़ी और उसने यह तय किया कि वह तभी हटेगी जब अन्ना अपने अन्नाग्रह में जीत जायेंगे।

कुछ लोगों ने अन्ना के आंदोलन की संसद में हवा निकालने की भरपूर कोशिश की। ताज्जुब इस बात का है कि इसमें वह लोग भी बढ़-चढ़ कर बोले जो भ्रष्टाचार के पंक में आकंठ डूबे हैं और कई पर तो इसके लिए आपराधिक मामले भी चल चुके हैं या चल रहे हैं। कुछ लोगों ने इस सार्वजनिक मुद्दे पर भी जाति का कार्ड खेलना चाहा लेकिन जिसके साथ पूरा भारत हो उसके सामने तो इन चंद लोगों की आवाज उसी तरह नहीं टिक पायी जैसे नक्कारखाने में तूती की आवाज नहीं टिक पाती। संसद ने एक आदर्श एक नया उदाहरण कायम किया उसके लिए सारे देश को उसका आभारी होना चाहिए । उन सांसदों और कांग्रेस सरकार का भी जिसने देस से ही सही जन भावनाओं की कद्र की।

टीम अन्ना के कुछ सदस्यों को लेकर भी लोगों ने तरह-तरह के सवाल उठाये लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि आपका मकसद कितना साफ है। आप कहां से हैं, आपका अतीत क्या रहा है यह शायद इतना महत्वपूर्ण नहीं कि उसे ही पकड़ कर चला जाये। हां यह जरूर है कि अगर इस आंदोलन से तपे-तपाये और स्वच्छ छवि के लोग ही जुड़ते रहेंगे तो इसकी गरिमा और बढ़ेगी। वैसे टीम अन्ना को अपने साथियों को चुनते वक्त सावधान रहना होगा। स्वामी अग्निवेश के प्रकरण ने तो यह और जरूरी कर दिया है। अग्निवेश दिखावा तो यह कर रहे थे कि वे अन्ना के आंदोलन से ईमानदारी से और गहरे तौर पर जुड़े हैं लेकिन वे चाहते थे कि अन्ना सरकार की बातें मान लें और अनशन तोड़ दें। यू ट्यूब से लेकर टीवी चैनलों में कल से पल-पल दिखाये जा रहे वीडियो में वे अन्ना को पागल हाथी कहते नजर आ रहे हैं जो सरकार के कहने पर भी अनशन नहीं तोड़ रहा और सरकार को अग्निवेश अन्ना के खिलाफ और कड़े कदम उठाने की बात कर रहे हैं। वे किसी कपिल से बात कर रहे हैं। अब लोगों को यह समझने में तो दिक्कत नहीं ही होनी चाहिए कि अन्ना प्रकरण में कौन कपिल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था।

वैसे स्वामी अग्निवेश का कहना है कि वे तो हरिद्वार के किसी कपिल महाराज से बात कर रहे थे। सच्चाई क्या है यह तो स्वामी जी ही जाने लेकिन यह तो दिन के उजाले की तरह साफ है कि इस प्रकरण से वे संदेह के घेरे में आ गये हैं। वे कहने को अन्ना के साथ दिख रहे थे लेकिन जु़ड़े कहीं और से थे। अन्ना या उनकी टीम का विचार-विमर्श खुलेआम मंच पर हो रहा था जहां दूसरों के अलावा स्वामी अग्निवेश जी की भी सीधे पैठ थी। ऐसे में उन तक पहुंची सूचनाएं कहां-कहां तक पहुंची यह साफ है। कहीं इसी की वजह से तो यह आंदोलन इतना लंबा नहीं खिचा? आज नहीं तो कल यह साफ होना ही है। भगवान का लाख-लाख शुक्र की कोई भी बाधा इस आंदोलन को जीत में बदलने से नहीं लोक पायी। अब जनता और अन्ना की टीम को इस संघर्ष को अहिंसक ढंग से जारी रखना है और देश में हर उस भ्रष्टाचार को मिटाने की मुहिम छेड़नी है जो आमजन को प्रभावित करता है। भविष्य में जिस दिन हम निचले स्तर तक व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग जीतने में कामयाब हो सकेंगे तभी हम अपने उन वीर शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि देने के काबिल होंगे जिनके बलिदानों के चलते हम आज आजाद हैं। उनके सपनों का स्वच्छ, शुद्ध और भ्रष्टाचार मुक्त भारत गढ़ना हर हिंदुस्तानी का परम कर्तव्य है।

 

लेखक राजेश त्रिपाठी कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार हैं और तीन दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। इन दिनों हिंदी दैनिक सन्मार्ग में कार्यरत हैं। राजेश से संपर्क  [email protected]   के जरिए कर सकते हैं।

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