मैं अन्ना का विरोधी नहीं हूँ। उन्होंने भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर जनता को गुरुत्व के साथ जगा दिया। परन्तु, जिसने देश को एक मुद्दे पर एक साथ लाकर खड़ा किया उसकी टीम के बिखराव के संकेत चिन्तनीय हैं। शीशे की तहर साफ शुद्ध व्यवस्था की बात करने वालों को स्वयं पारदर्शी होकर जनता के सम्मुख आना पडे़गा। टीम के सदस्यों को कहां कहां से कितना चन्दा मिला, क्या उपयोग हुआ तथा उनकी निजी जीविका कैसे चलती है? यह वृतांत टीम अन्ना को देना पड़ेगा। वरना जिस रफ्तार से लोग जुड़े वैसे विमुख भी होंगे।
1974 में संघ परिवार ने जेपी आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी परन्तु वे उसके संचालक नहीं थे। आन्दोलन का पूरा संचालन जेपी की समाजवादी व सर्वोदयी टीम के पास था। जेपी समूची दुनिया की समाजिक-राजनैतिक व्यवस्था की समझ रखने वाले विचारवान बौद्धिक नेता थे। फिर भी, जनसंघ राजसत्ता में भागीदार होने के अपने इरादे में कामयाब रही थी। आज संघ परिवार अन्ना के हाथ पकड़ कर डूबती हैसियत से उबरने का प्रयास कर रहा है। दरअसल संघ को कमजोर करने में भाजपा नेताओं के भ्रष्टाचार का बड़ा योगदान रहा है। संघ अपनी संकीर्ण मानसिकता के चलते ही सही परन्तु यह छवि लेकर चल रहा था कि यह परिवार आचरण में सुचिता का प्रतीक है। परन्तु, सत्ता में आने पर कांग्रेस की कार्बन कापी ही सिद्ध हुआ। और भी, जिस तरह टीम अन्ना ने भिन्न भिन्न स्थानों पर अपने भाषणों के आयोजन का जिम्मा संघ परिवार को दिया, उसने यह सिद्ध तो अवश्य किया कि दोनों कमजोर हो रहे हैं। दोनों को एक दूसरे की जरूरत है।
टीम अन्ना के सदस्यों का संघ की गोद में बैठने पर कई सवाल खड़े हो गये हैं। मैं अन्ना के आन्दोलन का पूरी तरह समर्थन करता हूं, अन्ना के ऊपर कोई आरोप नहीं है उन्होंने “राइट टू रीकॉल” को जिन्दा कर जेपी के अधूरे सपेन को आगे बढ़ाने के काम किया है। परन्तु, जनता तो पूरी व्यवस्था से कुपित है। राष्ट्र के नियम कानूनों से बंधे होने के कारण लोग कानूनों का पालन भले ही कर रहे हो पर सच तो यह है कि पुराने कानून अब अव्यवहारिकता के स्तर पर विकास के अवरोधक बन गये हैं। जिस प्रकार तार-तार हो चुके कपड़ों में कोई पैबन्द का रफू नाकामयाब होगा वैसे ही चरमरा रही भ्रष्ट व्यवस्था में एक लोकपाल की कील प्रभावी संबल नहीं बन सकती। अन्ना पूरी व्यवस्था परिवर्तन के लिए सोच लाएं। खनन व शराब के माफिया, बड़े बिल्डर तथा देशी-विदेशी मोबाइल आपरेटर सरकारों पर हावी हैं। अब न तो वायु शुद्ध रही न पानी स्वच्छ है। बिजली विशेषधिकार पात्रों के घर तक सिमट गयी है। हमारे पैरों में बेडियां भले ही न हो पर साँस लेने के लिए खुली हवा नहीं है। सारे संसाधन कैद हैं। जिन महलों में सभी सुविधायें कैद हैं उनके यहाँ तलुआ चाटू संस्कृति के लोग सुविधाओं को जूठन की तरह चख रहे है। ध्यान रहे अब देश का नेता वही होगा जो 80 करोड़ को जीने लायक व्यवस्था देगा।
भ्रष्टाचार के अलावा व्यवस्था में और भी दोष है। वर्तमान व्यवस्था लोक कल्याणकारी नही है। इसकी आधारशिला एक परराष्ट्रीय शासक ने रखी थी। हमारे शासको के मन भी कुंठित हैं। हम अपने से बहुत छोटी सी परिधि के पड़ोसी राष्ट्र पर हुंकारे भरते रहते है, परन्तु अपने राष्ट्र को सदैव के लिए सर्वशक्तिशाली बनाने के बजाय देशवासियों के गले में आधार कार्ड का पट्टा डालने के लिए लाखों करोड़ के खर्च को प्राथमिकता दे रहे हैं। अन्ना जी के लिए सुझाव है कि चौपाल पर मंत्रणा करें व देश को दिशा दें।
लेखक गोपाल अग्रवाल समाजवादी आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं। इन दिनों समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति के हिस्से हैं तथा समाजवादी व्यापार सभा यूपी के अध्यक्षत हैं. मेरठ निवासी गोपाल से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।


