टीवी मीडिया जिस दौर से गुजर रहा है, उसका असर समाज पर और प्रशासन तंत्र पर भी दिख रहा है। बुलेट से तेज़, दुनिया का सबसे तेज़ बुलेटिन, न्यूज़ शतक, ट्वेंटी-ट्वेंटी ..खबरों का कोई असर समाज पर प्रशासन पर नहीं दिख रहा। पहले नेशनल चैनल पर कोई खबर आ जाये तो प्रशासन भागा भागा फिरता था। दिल्ली हाईकमान हिल जाता था। सरकार की छवि पर नज़र रखने वाला तंत्र राज्य सरकार को, मुख्यमंत्री को सोते हुए जगा देता था पर अब कोई असर नहीं। उत्तराखंड में एमपी से आये तीर्थ यात्रियों की बस गिर गयी, २६ मर गए, सरकार पर कोई असर नहीं, केदारनाथ में अब तक १५ मर गए सरकार के कानों पर जू तक नहीं रेंगी.. अख़बार मोहल्ला संस्करण हो गए, वो पहले से ही बेजुबान हो गए थे, रीजनल चैनल ने खबर दिखा दी तो एक घंटे बाद वो भी बेअसर..।
पहले खबरों का पैकेज बनता था, स्क्रिप्ट पर काम होता था, जिम्मेदार अधिकारी, पक्ष-विपक्ष की बात सामने लायी जाती थी, खबर पर डेस्क इंचार्ज कांट-छांट, पूछताछ करते थे, तब खबर, ऑन एयर होती थी, खबर दिखते ही हलचल शुरू, फ़ोन पर फ़ोन आते थे। रिपोर्टर को खोजा जाता था, एक्शन होता था, खबर का असर होता था, पर क्या अब ऐसा होता है? जवाब खुद के पास ही नहीं है, सभी नेशनल चैनल्स एक ही ढर्रे पर है, कई चैनल्स से तो एंकर ही गायब हो गए, वो बहुत जरूरी हुआ तो किसी ब्रेकिंग न्यूज़ पर चाँद मिनटों के लिए दिख जायेंगे, नहीं तो उनका भी काम ख़त्म। कास्ट कटिंग का दौर है दोस्तों हार किसी पर गाज गिर रही है, शाम ६ बजे से रात ११ बजे तक कोई खबर नहीं मिलेगी। वहां उस वक्क्त मिलेंगे पासपोर्ट साइज़ के फोटो जो कि जुबान हिलाते हिलाते दिमाग का दही बना देते है। उस बहस का कोई नतीजा को असर सरकार, शासन तंत्र पर नहीं दिखता..। खबर तो गायब हो ही गयी, अब वीकेंड पर ऐसे शो आ गये जो बेहद ही ऊबाऊ है, क्यों गिरा दिया टीवी चैनल्स ने अपना स्तर? खर्चा कम करने के लिए सभी चैनल्स ने अपने आप को खबरों से क्यों दूर कर लिया? क्या यहाँ भी मनमोहन सिंह की अर्थ व्यवस्था चरमरा गयी?
एक तरफ कुमार मंगलम, अरुण पुरी के बीच सौदे ३५० करोड़ में होने की खबरे हैं तो फिर ये मायूसी समझ से परे है। सन २००० के आसपास स्ट्रिंगर को खबर भेजने के पांच हज़ार मिलते थे, जो अब घट कर पांच सौ रह गए, रिपोर्टर का वेतन कई गुना बढ़ गया। चैनल में बैठे कई लोग कहाँ से कहाँ पहुँच गए? क्या सभी ने ऐसी कोई नीति बना ली कि सरकार के खिलाफ मीडिया बेअसर दिखलाई दे? राहुल, सोनिया से बाहर भी कोई दुनिया है या मोदी के दंगों से बाहर भी कोई दुनिया है। आरुषि के अलावा भी कुछ देश में घट रहा है। सूखा, पानी की कमी और हाँ देश भर में रसोई गैस की कमी पर सरकार कुम्भकरण नींद में है। मीडिया सोया है, उसे स्ट्रिंगर से खबर लेनी नहीं, टीवी न्यूज़ चैनल, क्या ऐसा, एक दूसरे की देखा देखी कर रहे हैं? न्यूज़ चैनल से आम आदमी की खबर दूर हो गयी है, नेशनल न्यूज़ मीडिया मुबई, दिल्ली या एनसीआर तक सिमट कर रह गया है और वो भी खास तबके तक जहाँ विज्ञापनों का असर दिखलाई देता है, पिछले दिनों एक खबर पर किसी ने चर्चा की, उधम सिंह नगर [उत्तराखंड] में एक बिल्डर ने हेरा-फेरी करके लोगों को मकान की रजिस्ट्री नहीं करवाई खबर बनी। बिल्डर कम्पनी का वर्जन लेना था। कम्पनी प्रतिनिधि ने बोला दिल्ली से मिलेगा, दिल्ली संपर्क किया तो वहां बन्दे ने स्ट्रिंगर का नाम, फ़ोन नंबर पूछा.. कुछ वक्क्त बाद चैनल से स्ट्रिंगर हो फ़ोन आता है कि तुम क्यों उनसे पैसा मांग रहे हो..? चलो हटो वहां से… चैनल इनपुट हेड की रौबीली आवाज़ सुन स्ट्रिंगर ने जी सर कहा.. अपना सामान समेटा और पापी पेट के सवाल का उत्तर खोजता हुआ वहां से चलता बना, खबर चलने से पहले ही मार दी गयी, खबर असरदार बनती तो दर्जनों का भला हो जाता, यहाँ अब क्या कहेंगे?
पहले स्ट्रिंगर किसी दफ्तर में जाते थे चाय पानी पूछा जाता था। अब बैठने को कुर्सी तक नहीं मिलती, अधिकारी अपनी सेट्टिंग से सब काम कर रहा है। उसे भी मीडिया की परवाह नहीं, क्यों? स्पीड न्यूज़ का असर नहीं, उल्टा अधिकारी व्यंग्य कसने लगे हैं। खबर तो आपकी दिखती नहीं, बात भी सही है, स्पीड न्यूज़ में बाइट दिखती नहीं तो फिर हम काहे टाइम ख़राब कर रहे हैं? सवाल ये भी खबर की परिभाषा बदल गयी है, कब, क्यों, कहाँ, कैसे, किसने… क्या किताबों तक सिमट कर रह गया है? क्या अब केवल सूचना देना मात्र ही खबर है? बरहाल खबर फ़िलहाल समझ से दूर है और इस दूरी का फ़ायदा चैनल को नहीं बल्कि भ्रष्ट शासन, नौकरशाही, सफ़ेदपोश को मिल रहा है और समाज मीडिया को कोस रहा है… ये कह कर कि तुम भी मिल गए हो… इन लूट घसोट करने वालों से… ऐसा सुन कभी कभी दम घुटने लगता है, मन में बहुत कुछ है, भड़ास निकल रही है ..धीरे धीरे …।
लेखक दिनेश मानसेरा उत्तराखंड के टीवी जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों एनडीटीवी के लिए नैनीताल में कार्यरत हैं.


