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डा. मुंडा के जाने से समाज को भारी नुकसान हुआ है

डॉ. राम दयाल मुंडा नहीं रहे. आदिवासी परिवार में जन्म लेने के बाद उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में उन लोगों से मुकाबला किया जिनके पूर्वजों ने डॉ. मुंडा के पूर्वजों का शोषण किया था और अपमानित किया था. संगीत की बारीकियों के जानकार डॉ. राम दयाल मुंडा समकालीन इतिहास के भी ज्ञाता थे. उन्होंने आदिवासियों के अधिकार की लड़ाई को एक ऐसी धार दी जिसके बाद बौद्धिक स्तर पर भी आदिवासियों को चुनौती देना शोषक वर्गों के लिए बहुत ही मुश्किल हो जाता था. उन्होंने विचार धारा के स्तर पर कभी समझौता नहीं किया.

डॉ. राम दयाल मुंडा नहीं रहे. आदिवासी परिवार में जन्म लेने के बाद उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में उन लोगों से मुकाबला किया जिनके पूर्वजों ने डॉ. मुंडा के पूर्वजों का शोषण किया था और अपमानित किया था. संगीत की बारीकियों के जानकार डॉ. राम दयाल मुंडा समकालीन इतिहास के भी ज्ञाता थे. उन्होंने आदिवासियों के अधिकार की लड़ाई को एक ऐसी धार दी जिसके बाद बौद्धिक स्तर पर भी आदिवासियों को चुनौती देना शोषक वर्गों के लिए बहुत ही मुश्किल हो जाता था. उन्होंने विचार धारा के स्तर पर कभी समझौता नहीं किया.

वे आदिवासियों को हिन्दू नहीं मानते थे. उनका कहना था कि आदिवासी को हिन्दू धर्म की श्रेणी में रखना सरकारी और प्रशासनिक आलस्य का नतीजा है. जनगणना में देश की सारी आबादी को छह वर्गों में रखा जाता है. इस देश में रहने वाला हर आदमी इन्हीं छह वर्गों में भर्ती कर दिया जाता है. यह वर्ग हैं हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, सिख और अन्‍य. इन धर्मों को मानने वाले तो धर्मों की श्रेणी में रखे जाते हैं. बाकी छोटे ग्रुप “अन्य” की एक नई श्रेणी बनाकर उसमें शामिल कर दिए जाते हैं. आदिवासियों को हिन्दू वर्ग में रखा जाता है.

यह दिलचस्प है कि केवल प्रशासनिक सुविधा के लिहाज से आदिवासियों को हिन्दू वर्ग में रखा जाता है. डॉ. राम दयाल मुंडा का कहना था कि यह सही नहीं है. उनका सिद्धांत था कि इस देश में रहने वाले दस करोड़ आदिवासी वास्तव में आदि धर्म के अनुयायी थे, जो कि हन्दू धर्म से बिलकुल अलग है. कुछ आदिवासियों ने तो ईसाई या बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था लेकिन जिन्होंने धर्म परिवर्तन नहीं किया था, वे अदि धर्म वाले थे. डॉ. मुंडा कहते थे कि यह आदि धर्म प्राचीन आदिवासी परम्पराओं पर आधारित था. इसका हिन्दुओं की वैदिक परम्पराओं से कुछ भी लेना देना नहीं था. वे आदिवासियों को हिन्दू धर्म में गिने जाने के खिलाफ थे.

उनका कहना था कि आदिवासी अपने समाज में बहुत ही आदरणीय और ऊंचे मुकाम पर रहते हैं लेकिन हिन्दू धर्म में शामिल करके उनको समाज के सबसे निचले पायदान पर डाल दिया जाता है. डॉ. राम दयाल मुंडा एक विद्वान व्यक्ति थे. रांची विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर के रूप में पूरी दुनिया में उनका नाम था. बाद में उन्होंने राज्य सभा में भी नामिनेट किया गया था. उनको संगीत नाटक अकादमी सम्मान भी दिया गया था. पिछले साल पद्मश्री भी दे दिया गया था. लेकिन अपने समकालीनों में सबसे कुशाग्र मेधा के इस महापुरुष को एक राष्ट्र के रूप में हम सही सम्मान नहीं दे सके.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा कॉलमिस्‍ट हैं. वे इन दिनों दैनिक अखबार जनसंदेश टाइम्‍स के नेशनल ब्‍यूरोचीफ हैं.

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