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तपस्वी गंग लोकनायक सानंद की कराह संवेदनशून्य कानों से टकरा कर लौट रही

यह महीना चाचाजी का कैंसर आपरेशन के बाद पुनर्वास के दौरान हुई दिक्कतों के चलते काफी भागदौड़ भरा रहा और हरिद्वार की दो निष्फल यात्राओं ने मुझे गत १७ अप्रैल को कशी में गंगा की निर्मलता और अविरलता को लेकर आहूत महाकुम्भ स्नान से वंचित रखा था और वंचित हो गया था मैं इस बीच की समस्त गतिविधियों से. रविवार को मौका मिला तपस्थली के रूप में बहुचर्चित शंकराचार्य घाट जाने का, जहाँ गंगा को लेकर तपस्यालीन संतों का ही नहीं वरन तपस्वी लोक गंग नायक स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद और अविछिन्न गंगा सेवा अभियानम के सार्वभौम संयोजक स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के सानिध्य का भी दुर्लभ अवसर मिला और इन दोनों महानुभावों के साथ अस्सी घाट तक की नौका यात्रा का सुयोग भी हाथ लगा. दोनों आज ही दिल्ली से लौटे थे. अभियान के प्रदेश संयोजक राकेश पांडेजी और गंगा के प्रति जुनूनी समाजसेवी रमेश चोपड़ा के आग्रह पर अस्सी घाट पर एक नए न्यूज चैनल के कार्यक्रम में भी मैंने शिरकत की और अनुभव किया कि राष्ट्रीय मीडिया भी इस भावनात्मक मुद्दे पर उतना गंभीर अभी नहीं है जितना उसे होना चाहिए था.

यह महीना चाचाजी का कैंसर आपरेशन के बाद पुनर्वास के दौरान हुई दिक्कतों के चलते काफी भागदौड़ भरा रहा और हरिद्वार की दो निष्फल यात्राओं ने मुझे गत १७ अप्रैल को कशी में गंगा की निर्मलता और अविरलता को लेकर आहूत महाकुम्भ स्नान से वंचित रखा था और वंचित हो गया था मैं इस बीच की समस्त गतिविधियों से. रविवार को मौका मिला तपस्थली के रूप में बहुचर्चित शंकराचार्य घाट जाने का, जहाँ गंगा को लेकर तपस्यालीन संतों का ही नहीं वरन तपस्वी लोक गंग नायक स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद और अविछिन्न गंगा सेवा अभियानम के सार्वभौम संयोजक स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के सानिध्य का भी दुर्लभ अवसर मिला और इन दोनों महानुभावों के साथ अस्सी घाट तक की नौका यात्रा का सुयोग भी हाथ लगा. दोनों आज ही दिल्ली से लौटे थे. अभियान के प्रदेश संयोजक राकेश पांडेजी और गंगा के प्रति जुनूनी समाजसेवी रमेश चोपड़ा के आग्रह पर अस्सी घाट पर एक नए न्यूज चैनल के कार्यक्रम में भी मैंने शिरकत की और अनुभव किया कि राष्ट्रीय मीडिया भी इस भावनात्मक मुद्दे पर उतना गंभीर अभी नहीं है जितना उसे होना चाहिए था.

यही कारण था कि सजीव प्रसारण के ताम झाम के बावजूद बात निकल कर सामने नहीं आ सकी. मैं भाई रवीश की इस बात से सहमत तो हूँ कि रिपोर्टर तुलनात्मक रूप से भाषा और अभिव्यक्ति में एंकर से बेहतर होता है. लेकिन तब जब रिपोर्टर ने विषय पर होम वर्क किया हो. प्रस्तोता लगभग एक घंटे के कार्यक्रम के दौरान तीन बार सानंदजी के पास गया पर तीनों बार उसके सवाल का एक ही जवाब आईटी कानपुर के इस भूतपूर्व प्रोफ़ेसर ने दिया, ‘थका हुआ बीमार क्या कह सकता है.`सचमुच महीनों के जलत्याग और अनशन ने इस सरस्वती पुत्र को तोड़ कर रख दिया है और क्लांत चेहरे पर थकान के स्पष्ट चिन्ह देखे जा सकते थे. चूंकि प्रश्नकर्ता के पास जानकारी का अभाव था इसलिए समझ में नहीं आया कि बात गंगा शुद्धीकरण की हो रही या अविरलता की.

अरे भाई, उत्तराखंड में गंगा को बांध कर समस्त पनबिजली परियोजनाओं को रोक कर गंगा की अविरलता को बरक़रार रखने का मुद्दा तो सियासत में उलझ चुका है. काम रोके जाने से उत्तेजित उत्तराखंडी भी धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं. वे विकास रोके जाने और बेरोजगारी का तर्क दे रहे हैं. ऐसे में समाधान कोई तुरंत नहीं निकलने वाला. इसमें समय लगना ही है. मगर इस बीच गंगा की निर्मलता और शुद्धता के लिए तो हाथ पर हाथ रख के बैठा नहीं रहा जा सकता. ऐसे में गंगा अभियानम के कर्णधारों को सोचना होगा कि निर्मलीकरण की जंग कैसे छेड़ी जाय और ऐसा कौन सा रास्ता अख्तियार किया जाय कि गंगा में जो मल-जल और रासायनिक कचरा गिराया जा रहा है, उसको बंद कराने के लिए गंगा प्रेमी कमर कस कर आगे आयें और इस अभियान में अपनी आहुति दें. अभियानम के नेत्र वर्ग को यह हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि जंग सेनापतियों से नहीं जीती जाती. युद्ध तो सेना जीतती है और जिसका कि अभियान में फिलहाल स्पष्ट अभाव दिख रहा है.

दो राय नहीं कि १९८६ में गंगा शुद्धीकरण योजना के आगाज़ के बाद से देश की जनता की गाढ़ी कमाई के हजारों करोड़ रुपये योजना से जुड़े लोगों के पेट में बिना डकार के ही हजम हो गए और गंगा शुद्ध होना कौन कहे, वह दिन- ब दिन प्रदूषित ही होती चली गयी और जिस काशी में शुद्धता का गंगाजल पर्याय हुआ करता था और जिस जल से मिठाइयाँ बना करती थीं, वही जल आज आचमन योग्य भी नहीं रह गया है. जानते हैं क्यों…? इस लिए कि गंगा मुक्ति अभियान सिर्फ सरकारी लूट-खसोट का ही हिस्सा बना रहा, वह कभी जन आन्दोलन की शक्ल अख्तियार नहीं कर सका. निगमानंद की शहादत भी आम जन को उद्वेलित नहीं कर सकी. यह तो सरस्वती पुत्र सानंद (संन्यास से पूर्व प्रोफ़ेसर जी डी अग्रवाल) जी का अनशन और फिर जल त्याग ही था कि जिसने गंगा के मुद्दे को राष्ट्रीय बना दिया और जनता को साथ जोड़ लिया वैसे ही जैसे अन्ना के जन लोकपाल मुद्दे को लेकर छेड़े गए महा संग्राम के प्रथम चरण में देश का आम जन सड़कों पर निकल पडा था. यह बात दीगर है की दिल्ली में बैठे कर्णधारों के कानों से टकरा कर सानंद की वेदना की कराह लौटती रही है. लेकिन जनाक्रोश को निरंतरता देने वाले कार्यक्रमों का अभाव आंदोलनों की मिट्टी पलीद करके भी रख देता है. इसलिए अभियानम को अपने नायक सानंद जी को आगे रख कर केद्र और प्रदेश सरकारों को एक निश्चित अवधि का अल्टीमेटम देना होगा कि इस बीच गंगा में समस्त नाले और औघोगिक कचरे गिरने यदि बंद नहीं किये गए तो फिर महा संग्राम होगा और तब जन सैलाब को रोक पाना किसी के लिए भी नामुमकिन होगा. चलते चलाते एक बात और कि अभियानम सानंद को नायक के रूप में देखे सह नायक बना कर न रखे.

लेखक पदमपति शर्मा वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा जागरण, हिंदुस्‍तान, महुआ समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं.

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