: नक्सलियों को भी मिली 5 करोड़ की लेवी : एक बोरा तेंदूपत्ता की कीमत बारह हजार रुपये : जगदलपुर। दक्षिण बस्तर के बीजापुर सुकमा और दंतेवाड़ा वन मंडलों में इन दिनों तेन्दूपत्ता के कारोबार में करोड़ों रुपये की हेराफेरी की जा रही है। आंध्र और महाराष्ट्र की सीमा से लगे धुर नक्सली इलाकों में निर्धारित मात्रा से तीन गुना अधिक तेन्दूपत्ते की खरीदी की गई है और इन समितियों के तेन्दूपत्तों की निकासी के लिये जंगल के अन्दर दर्जनों चोर रास्ते बनाये गये हैं। उल्लेखनीय है कि बीजापुर और सुकमा वनमंडल के अन्तर्गत लगभग 50 अघोषित फड़ों में आफ द रिकार्ड खरीदी की जा रही है। ट्रैक्टर और बैलगाड़ी से खुले आम बेशकीमती तेन्दूपत्ता आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र पहुंचाया जा रहा है। तेन्दूपत्ता ठेकेदारों को वन विभाग के साथ-साथ नक्सलियों का भी पूरा संरक्षण प्राप्त हो रहा है। क्योंकि ठेकेदार अघोषित अतिरिक्त माल की खरीदी के पीछे कुल रायल्टी का 25 प्रतिशत वन अधिकारियों को दे रहे हैं साथ ही प्रति सौ गड्डी के पीछे नक्सलियों को 150 रुपये का भुगतान किया जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से इस वर्ष दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर वन मंडलों में कुल एक लाख सत्ताइस हजार पांच सौ मानक बोरा तेन्दूपत्ता का कारोबार होना बताया जा रहा है, जबकि सिर्फ बस्तर परिवहन संघ की ट्रकों से अब तक ढाई लाख बोरा तेन्दूपत्ता अपने-अपने ठिकानों तक पहुंचाया जा चुका है। इसके अलावा तेन्दूपत्ते की वह मात्रा अलग है जो ट्रैक्टर और बैलगाडिय़ों के माध्यम से चोरी छिपे आंध्र प्रदेश भेजी जा रही है।
सरकारी आंकड़ों के हिसाब से इस वर्ष इन तीनों वन मंडलों में 52 करोड़ रुपये का तेन्दूपत्ता खरीदा और बेचा जायेगा जबकि वास्तविकता यह है कि अब तक 150 करोड़ रुपये का तेन्दूपत्ता संग्रहित किया जा चुका है। नियमानुसार 25 प्रतिशत रायल्टी जमा करने वाले ठेकेदारों को प्रदेश में ही वन विभाग की देखरेख में भण्डारण करने के निर्देश हैं वहीं 100 प्रतिशत रायल्टी जमा करने वाले ठेकेदारों को सीधे फड़ से अन्य प्रदेशों में पत्ता ले जाने की छूट दी गई है। इस सुविधा का लाभ उठाते हुए 100 प्रतिशत रायल्टी जमा करने वाले ठेकेदार सरकार को जम कर चूना लगाने में जुटे हुए है। सौ प्रतिशत रायल्टी जमा करने वाले ठेकेदार ए.ए. नईम, सीएच भास्कर रेड्डी और श्याम सुन्दर रेड्डी सभी आंध्र के ठेकेदार हैं और इन्हीं तीनों ठेकेदारों द्वारा दक्षिण बस्तर का 80 प्रतिशत पत्ता खरीदा गया है।
सीमा से लगे केन्द्रों जैसे जगरगुंडा, गोलापल्ली, पालाचलमा, किस्टारम का तेन्दूपत्ता चोर रास्तों से आंध्र प्रदेश के भद्राचलम के पास पेरू बस्ती और वहां से चेरला पहुंचाया जा रहा है। सुकमा वन मंडल का हजारों बोरा तेन्दूपत्ता मरईगुड़ा लक्ष्मीपुरम के रास्तों से ट्रैक्टर और बैलगाड़ी के माध्यम से पार किया जा रहा है। बीजापुर के सेण्ड्रा इलाके का 80 प्रतिशत पत्ता महाराष्ट्र भेजा जा रहा है। पूर्व नियोजित ढंग से नक्सली प्रभाव वाले और आंध्र तथा महाराष्ट्र की सीमा से लगी समितियों के माल के लिये ठेकेदारों ने तीन गुना अधिक बोली लगाकर समितियों को अपने कब्जे में कर लिया है। इन समितियों में निर्धारित मात्रा से तीन गुना अधिक अघोषित खरीदी होती है। जिसका सीधा लाभ ठेकेदारों को मिल रहा है।
बीजापुर में पामेड़ और पुजारी कांकेर समिति के पत्ते की कीमत आश्चर्य जनक रूप से सबसे अधिक 12199 रूपये निर्धारित की गई है। इसी प्रकार सुकमा के गोलापल्ली में ग्यारह हजार एक सौ ग्यारह तथा कोंटा समिति के पत्तों की कीमत 11786 रूपये निर्धारित की गई है। जिस पामेड़ में वन विभाग 1100 बोरा तेन्दूपत्ता संग्रहित होने की बात कर रहा है वहां से ग्यारह हजार बोरा तेन्दूपत्ता निकल कर आंध्र प्रदेश पहुंच चुका है। गोलापल्ली में 1100 बोरा और कोंटा में 400 बोरों का लक्ष्य निर्धारित किया गया है जबकि इन दोनों स्थानों पर सात-सात हजार बोरों की खरीदी की जा चुकी है। फड़ों में मौजूद वन विभाग के फडमुंशी, प्रबंधक, रोकड़पाल और नोडल अधिकारी इस अफरा तफरी में ठेकेदारों की पूरी मदद कर रहे हैं। लक्ष्य पूरा होने के बाद के माल की खरीदी का सीधा भुगतान ठेकेदारों द्वारा संग्रहण करने वालों को दिया जा रहा है। इस मात्रा का उल्लेख छत्तीसगढ़ लघु वनोपज संघ के दस्तावेजों में नहीं किया जा रहा है। इस काफी बड़ी मात्रा का उल्लेख ना होने से शासन को मिलने वाली रॉयल्टी का नुकसान तो हो ही रहा है, साथ ही लाखों रुपये के बोनस का नुकसान संग्रहणकर्ता आदिवासियों को भी उठाना पड़ेगा।
इस पूरे खेल में ठेकेदार नक्सलियों के साथ पूरी पारदर्शिता बरत रहे हैं। फड़मुंशियों द्वारा अतिरिक्त तेन्दूपत्ते की सही-सही मात्रा नक्सलियों को बताकर प्रति मानक बोरा के हिसाब से 150 रुपये का नक्सल टैक्स अदा किया जा रहा है। इसके अलावा रायल्टी का 25 प्रतिशत वन विभाग के उच्चाधिकारियों को पहुंचाया जा रहा है। इस प्रकार इन तीनों वन मंडलों से निकलने वाले तीन लाख बोरों से भी अधिक तेन्दूपत्ता का टैक्स नक्सलियों को 5 करोड़ रुपये की शक्ल में प्राप्त हो चुका है। सड़क मार्ग से जाने वाले माल में भी हेराफेरी की जा रही है। ट्रकों में तीन सौ बोरा लोड किया जा रहा है और टीपी तथा एन्क्लोजर 250 बोरों का बनाया जा रहा है। इसी तरह बोरों में 400 से 500 गड्डियों की जगह 700 से आठ सौ गड्डियां भरी जा रही है। वन विभाग के सारे नाको को स्पष्ट निर्देश दिये जा चुके हैं कि तेन्दूपत्ता से भरी वाहनों को पूरा सहयोग दिया जाये। बहरहाल वन विभाग और नक्सलियों द्वारा तेन्दूपत्ता ठेकेदारों की दामादों की तरह खातिरदारी की जा रही है। चिलचिलाती धूम में पत्ता इकट्ठा करने वाले आदिवासी परिवारों की फिक्र किसी को नहीं है।
लेखक देवशरण तिवारी बस्तर में दैनिक देशबंधु के ब्यूरोचीफ हैं.


