भारत में बलात्कार या सामूहिक बलात्कार कोई नई या कभी-कभार होने वाली घटना नहीं है. बलात्कारों की इन घटनाओं के लिए कौन जिम्मेदार है? किसे सजा दी जाये? क्या सिर्फ बलात्कारियों को फांसी पर टांगने से समस्या सुलझ जाएगी? बलात्कार के आरोपियों को तो देर-सबेर सजा मिल ही जाएगी. लेकिन क्या वे छह लोग ही दोषी हैं? उन लोगों ने मिलकर चीखों के साए में हवस की प्यास बुझाई थी. वह रोयी होगी, गिड़गिड़ाई होगी, चीखी होगी, चिल्लाई होगी. चंडी सा रौद्र रूप दिखाया होगा. काली सा रौद्र रूप भी दिखाया होगा. लेकिन कामांधों को मन की पीड़ा, आत्मा का दर्द दिखाई नहीं देता. उन्हें तो सिर्फ लड़की का शरीर दिखाई दे रहा होगा. यह शरीर उन्हें वैसा ही लग रहा होगा जैसा वे फिल्मों के सेक्स दृश्यों में देखते है. या शायद उस अबला में उन्हें अंग प्रदर्शन करने वाली अदाकाराएँ दिख रही होंगी. क्या कारण है की भारत जैसे सशक्त मानवीय और सांस्कृतिक मूल्यों वाले राष्ट्र में बलात्कार जैसे घृणित अपराध बढ़ रहे है?
वह मर गई है, लेकिन वह बता गई की भारत भी मर गया है. भारत की संस्कृति मर गई है. क्या यह वही देश है जिसकी संस्कृति की पहचान विवेकानंद ने शिकागो में करवाई थी. ‘मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों’. पूरे विश्व को अपना कुटुंब मानने वाले भारत के लोग अपने शहर, राज्य और देश के लोगों को ही अपना परिवार नहीं मानते. परिवार और सम्बन्ध तार-तार हो रहे है. ९०% से ज्यादा बलात्कार रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों द्वारा किये जा रहे है. कैसे सजा दोगे इस पाशविकता को? आधुनिकता का दौर है. तंग कपड़े, कम कपड़े और पतले कपड़े. शरीर सुडौल दिखना चाहिए. महिलाओं को फिगर और पुरुषों को सिक्स पैक बदन का नशा. प्रभावित करने के तरीके बदल गए. शालीनता की जगह अश्लीलता, विचारों की जगह बदन, अभिनय की जगह अंग प्रदर्शन, प्रेम की जगह सेक्स. गहरी भारतीय संस्कृति आज कितनी उथली नजर आती है! ईमानदारी की रोटी पर बेईमानी का बर्गर भारी है. मेहनत की झोपड़ी के सामने भ्रस्टाचार का महल खड़ा है. कैसे सजा दोगे इस आधुनिकता को?
हज़ार पुरुषों पर नौ सौ सैतालीस महिलाएं. कैसे जोडियाँ बनेंगी? कन्याओं को भ्रूण में ही मार डालो. यदि बचे तो पढने मत दो. पढ़-लिख कर बड़ी हो जाये तो दान कर दो. अपनी मर्जी से शादी करें तो ऑनर किलिंग. नौकरी मत करने दो. घर से बहार मत निकलने दो. निकालें भी तो भाई, पिता या पति के साथ. सूरज के छिपते ही रसोई में छिपा दो. और यदि बाहर दिख जाए तो बलात्कार कर दो. बलात्कार से मर जाएगी. नहीं मरी तो समाज जिंदगी भर तानों से छेदता रहेगा. अच्छा होता की उसे भ्रूण में ही मार डालते. कब समझोगे की प्रकृति ने उसे सिर्फ तुम्हारी सेवा करने, खाना बनाने, पोछ लगाने, कपडे प्रेस करने, बच्चे पैदा करने और उन्हें पालने के लिए नहीं भेज है. वह भी तुम्हारी तरह आजाद, निर्भय और प्रसन्न होकर सृजन करना चाहती है. कैसे सजा दोगे अपनी पुरुष प्रधान मानसिकता को? लोग पूछ रहे है कि वह लड़की कौन है. क्या फर्क पड़ता है? बेचारी किसी की बहन रही होगी. किसी की बेटी रही होगी. अब सब अपनी-अपनी बहन बेटियों को समझायेंगे, सावधान करेंगे लेकिन वही फ़िल्में देखने जायेंगे जिसमे किसी की बहन-बेटी अपना बदन दिखा रही हो. सिनेमा हॉल में अगल-बगल देखेंगे. पता ही नहीं चलेगा फिल्म की पतली फिल्म कब आँखों पर चढ़ गई. नज़रों पर चढ़ी इस फिल्म के उस पार अपनी बहन तो बहन दिखाई देती है लेकिन दूसरे की बहन फिल्म की अर्धनग्न अदाकारा नजर आती है. जब अपनी बहन या बीबी पर कोई बुरी नजर डाले तो नायक बन जाओगे. जब दूसरी युवती अकेले दिखेगी तो खलनायक की हरकतों से बाज नहीं आओगे. कैसे सजा दोगे इस दोहरे चरित्र को?
क्या नारियों को पूजने वाला ये वही भारत है जहाँ नारी शक्ति का पर्याय होती थी. हर जगह हमने नारी को स्थान दिया. ऐश्वर्य में लक्ष्मी, ज्ञान में गायत्री, संहार में काली. भारतीय संस्कृति में सब जगह माँ है. फिर बलात्कार क्यों? क्योंकि माँ तो मूर्तियों की बनी होती है, मंदिरों में रहती है. जो नौकरी करे, बस, ट्रेन में सफ़र करे वह माँ नहीं हो सकती. मां को तो पत्थर की मूरत ही होना चाहिए. सुबह मां की पूजा करोगे, प्रवचन सुनोगे. शाम को समाचार सुनोगे और रात में इंतज़ार करोगे अपराध और बलात्कार की मसालेदार सनसनी पैदा करने वाली रिपोर्ट का. खबरिया चैनल भी शांति बनाये रखने की अपील करेंगे, ज्ञान झाडेंगे, और रात में दिखायेंगे किसी दुसरे गैंग रेप का उत्तेजक नाट्य रूपांतरण. कैसे सजा दोगे इस झूठे दिखावेपन को? किसी लड़के को यदि भैया कह दो तो ऐसे बिचकेगा जैसे किसी ने नामर्द कह दिया हो. सजी-धजी तंग कपड़ों में, कमर पर टैटू वाली लड़की को बहनजी कह दो उसे ऐसा लगेगा जैसे सब गुड गोबर हो गया. बहन कहलाने के लिए कोई कम और तंग कपडे नहीं पहनता. यदि किसी ने बहन कह दिया तो समझो की अभी कपड़ो को और छोटा करने की जरूरत है. यदि माचो मैन को पता चल जाये की कोई उसे भैया कहेगा तो वह बालों में जेल लगाना, कानों में बालियाँ पहनना और बाजुओं में टैटू गुदवाना छोड़ दे. क्या दिखना और दिखाना चाहती है आज की युवा पीढ़ी? कैसे संवारोगे इस युवा मानसिकता को?
पुलिस जांच करेगी. पूछेगी पहले जींस खोली या शर्ट. दर्द हुआ या नहीं. कितने बार किया. फब्तियां भी कस सकती है कि तू तो बलात्कार करने लायक ही नहीं दिखती. तुम्हारी बेटी होती तो भी क्या इसी तरह के सवाल पूछते? नालायक कहीं के. विधानसभा में अश्लील वीडियो देखने वाले शोक जताएँगे. दुसरे नेता हँस-हँसकर बयान देंगे. जनता गुस्सा करेगी. नेता माफ़ी मांग लेगा. न्यायालय में पेशी होगी. मोहल्ले वाले और पडोसी इशारे से बताएँगे, ‘ये वही लड़की है…’. पुलिस वाला कल्लू की दुकान पर मोहन भैया के पैसों की चाय की चुस्किया लेते हुए कहेगा, ‘एक हाँथ से ताली नहीं बजती’ राधाबाई कहेगी, ‘क्यों गई थी रात को’. पंडित जी घोर कलयुग की दुहाई देते हुए आगे बढ़ लेंगे. काजी साहब अवैध संबंधो के खिलाफ है. एक दुबई के अरबपति की शादी में गए है और निकाह का कबूलनामा करवा रहे है. १५-२० सालों में सजा हो जाएगी. शायद फँसी की हो जाये. तब तक जख्म और आंसू दोनों सूख चुके होंगे. फिर क्या पता कोई महिला राष्ट्रपति किसी करुण पेटली की सिफारिश पर फांसी की सजा माफ़ कर दे. यदि सजा देनी है तो सजा मिलनी चाहिए पूरे समाज को. पूरी सोच को. पूरी पौध को. तथाकथित आधुनिकता और ढकोसलों को. धर्मं के नाम पर दिखावा करने वाले दोगले लोगों को. और उनको भी जो चार दिन के लिए कमीशन खाकर निकाह कर देते है. सजा मिलनी चाहिए उन सभी नजरों को जो नारी को परोसने और भोगने की वस्तुवादी संस्कृति को बाधा रही है. सजा देनी है तो सजा दो माचो मैन और हॉट बेब को. लेकिन सजा तो मिलेगी सिर्फ बलात्कारी को. खुद को कैसे सजा दोगे? बलात्कारी फांसी के फंदे पर झूल जायेगा लेकिन सवाल लटकता रहेगा.’क्या वाकई गैंग रेप के सभी दोषियों को सजा मिली?’ क्या पूरा समाज इस गैंग रेप में शामिल नहीं है? मुझे अपना गुनाह कबूल है. इस गुनाह की कम से कम सजा यह है कि इस नववर्ष को न मनाया जाये. क्या आप भी अपना गुनाह कबूल करेंगे?
लेखक प्रह्लाद कुमार पांडेय पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


