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थक जाती हैं स्ट्रगलर्स की तरह यहाँ की रातें

जब हम कहते हैं कि रात स्ट्रगलर्स की तरह थक गई थी, तब हम मुंबई फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ा एक नया मुहावरा गढ़ रहे होते हैं। इस मुहावरे को गढ़कर हम मुंबई और उसमें संघर्ष कर रहे हजारों-हजार नहीं, लाखों-लाख उन संघर्षशील कलाकारों की तरफ इशारा कर रहे होते हैं, जो किसी जुनून और जिद के चलते उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, असम, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, कोलकाता या कश्मीर से मुंबई आते हैं और आते ही रहते हैं। इनकी आंखों में सिर्फ एक सपना होता है और वह सपना चमकते सितारों की तरह ऊंचाइयों को छूना अपना लक्ष्य पाना होता है। ये चमकते सपने इन्हें संघर्ष करने का हौसला भी देते रहते हैं।

जब हम कहते हैं कि रात स्ट्रगलर्स की तरह थक गई थी, तब हम मुंबई फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ा एक नया मुहावरा गढ़ रहे होते हैं। इस मुहावरे को गढ़कर हम मुंबई और उसमें संघर्ष कर रहे हजारों-हजार नहीं, लाखों-लाख उन संघर्षशील कलाकारों की तरफ इशारा कर रहे होते हैं, जो किसी जुनून और जिद के चलते उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, असम, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, कोलकाता या कश्मीर से मुंबई आते हैं और आते ही रहते हैं। इनकी आंखों में सिर्फ एक सपना होता है और वह सपना चमकते सितारों की तरह ऊंचाइयों को छूना अपना लक्ष्य पाना होता है। ये चमकते सपने इन्हें संघर्ष करने का हौसला भी देते रहते हैं।

ये अपने सपनों में फिल्मोद्योग का हिस्सा बनकर आमिर खान, संजय दत्त, सलमान खान, अक्षय कुमार, अभिषेक बच्चन, अक्षय खन्ना, ऋतिक रोशन, अजय देवगन, सनी देओल, शाइनी आहूजा, रणवीर शौरी, केके मेनन या रणवीर कपूर बनकर जीवन में चार चांद लगाने का ख्वाब देखते हैं। लेकिन यह सिर्फ चाहत है। हकीकत इससे जुदा है। हकीकत यह है कि मुंबई में बसे लगभग पांच लाख स्ट्रगलर्स में से सिर्फ पांच प्रतिशत कलाकारों को ही कोई ढंग का काम मिल पाता है। यह पांच प्रतिशत भी इसलिए कायम है क्योंकि ज्यादातर कलाकारों को मुंबई का टीवी उद्योग कोई न कोई काम दे ही देता है। वरना बाकी का 95 प्रतिशत या तो स्ट्रगल ही करता रह जाता है या अपने अरमानों को खाक में सौंपकर रोजी रोटी के लिए दूसरे पेशों में उतर जाता है। बहुत सारे लोग ऐसे भी होते हैं जो थक-हारकर अपने गांव, शहर, कस्बे में लौट जाते हैं। अपने इलाके में लौटना उन्हें नागवार और शर्म से लबरेज लगता है, लेकिन मुंबई में सिर पर चढ़े कई तरह के कर्ज उन्हें इस चुपचाप पलायन के लिए मजबूर कर देते हैं। ये तमाम लोग फिल्मी दुनिया में स्ट्रगलर कहलाते हैं।

कानपुर से दस वर्ष पहले मुंबई आए फिल्म निर्देशक हृदय शंकर मिश्र कहते हैं, ये स्ट्रगलर मायावी नगरी मुंबई में जिजीविषा का एक अजीबो-गरीब और हैरतनाक इतिहास रचते रहते हैं। इनकी सुबह चाय से, दोपहर बड़ा पाव से और रात सपनों से शुरू होती है। ये अपने बजट के अनुसार कभी एक कमरे में चार तो कभी दो के हिसाब से रहते हैं। कुछ लोग पेइंग गेस्ट बनकर दिन गुजारते हैं। काफी सारे लोग लॉज में भी रहते हैं। एक जमाने में अंधेरी का आदर्श नगर इनका केन्द्र होता था। महंगाई बढ़ने पर ये लोग कांदिवली के चारकोप और गोरेगांव की एक कमरे वाली म्हाडा कॉलोनी में खिसक गए। फ्लैट और महंगे हुए। अब मीरा रोड स्ट्रगलर्स का प्रमुख केन्द्र है। खुद हृदय शंकर लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं। जबकि मुंबई में इन्होंने अपनी शुरुआत मैडम नंबन वन और परिणाम द रिजल्ट जैसी कम बजट वाली फिल्मों से की थी और काफी पैसे भी कमाए थे। इन दिनों वह एसएस राना की फिल्म अमृता -प्रीतम का निर्देशन कर रहे हैं।

इन स्ट्रगलर्स के पास सफल हो चुके लोगों के चमत्कारी किस्से उम्मीद की तरह होते हैं और इन्हीं उम्मीदों के बल पर ये लगातार कष्टों में जीते चलते हैं। ये कुछ दिनों तक अपने घर से पैसे मंगाते हैं। ना-नुकुर होने पर वैकल्पिक कामों को पकड़ लेते हैं। मसलन कुछ लोग डबिंग आर्टिस्ट हो जाते हैं तो कुछ सहायक निर्देशक। कुछ लोग जूनियर आर्टिस्ट भी बन जाते हैं। तो स्थितियों के ज्यादा मारक हो जाने पर कुछ लोग स्पॉट ब्वाय तक का पेशा पकड़ लेते हैं। इससे दो वक्त की रोटी और सपने देखते रहने का अवसर मिल जाता है। कई लोग रास्ता ही बदल लेते हैं। जैसे अभिनेता दारा, जो चौदह वर्ष पहले उत्तर-प्रदेश के कन्नौज से एक्टर बनने मुंबई आए थे। बने भी। वर्ष 2007 में उनकी खूनी जलजला फिल्म रिलीज हुई थी। इसमें उन्होंने विलेन का रोल निभाया था। धारावाहिकों में भी काम करने का मौका मिला, लेकिन बड़े पर्दे का शौक इस अवसर को भी डस गया।

दारा कहते हैं, बाद में जो लोग सीरियल निर्माण में आए, उनमें से कुछ सरताज लोगों ने धारावाहिक को सब्जी मार्केट बना दिया। ऐसे माहौल में मेरे जैसे एक्टरों के लिए कोई स्थान नहीं था। आजकल दारा खुद का थियेटर चला रहे हैं। केके शुक्ला भी एक्टर बनने उत्तर-प्रदेश के कन्नौज से मुंबई आए। सीआईडी, तारक मेहता का उल्टा चश्मा, सजनवा बैरी हो गए हमार जैसे दर्जनों धारावाहिकों में काम भी कर रहे हैं। इन दिनों जीटीवी पर शोभा सोमनाथ धारावाहिक प्रसारित हो रहा है। इसमें जलालुद्दीन का किरदार निभा रहे हैं। राहुल ढोलकिया निर्देशित सोसायटी रिलीज होने को है और करण जौहर की अग्निपथ में काम भी कर रहे हैं। रिलीज हो चुकी नो वन किल्ड जेसिका में एडवोकेट सक्सेना का किरदार निभाया था। कुल मिलाकर काम मिल रहा है। लेकिन इनके भी मन में फिल्म इंडस्ट्री के प्रति एक कुंठा बैठी है। बिहार से आए धनंजय कुमार 15 साल से संघर्षरत हैं। वह कहते हैं, लड़ाई ही जीवन है। जैसे समुद्र हार नहीं मानता, चट्टानों से टकराता ही रहता है। धनंजय द्वारा निर्देशित फिल्म हमार घरवाली रिलीज हो चुकी है।

लगभग दो दर्जन स्ट्रगलर्स से हुई बातचीत के निष्कर्ष दिल दहला देने वाले हैं। यहां मायावी नगरी में बेहद मारकाट और अवसाद भी है। इस अवसाद को सघन किया है स्टार पुत्रों-पुत्रियों ने। इनके पास पैसा, संपर्क, उच्च शिक्षा, महंगे जिम जैसी सभी प्रकार की सुविधाओं के बल पर ये आगे बढ़ जाते हैं। पीछे छूट जाते हैं स्ट्रगलर्स, जो अपनी खासमखास प्रतिभा और भाग्य के भरोसे ही बॉलीवुड में दस्तक दे पाते हैं। चिराग जलाओ बहुत उदास है रात। कहते हैं अभिनेता विजय सक्सेना, जिनकी फिल्म लंदन किलर शीघ्र आने वाली है, और जिससे उन्हें बेहद उम्मीदें हैं।

लेखक अतुल कुशवाह युवा कवि और फिल्म पत्रकार हैं.

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