पत्रकारों के हितों की रक्षा करने वाले कई संगठनों के नेता मंचों से तो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर होती है। उनकी लफ्फाजी सिर्फ पत्रकारों की तालियां बटोरने के लिए होती है। जिसके बल पर वह चंदाखोरी करते हैं। जहां पत्रकारों के हितों की बात आती है तो इन संगठनों के नेता कहीं नजर तक नहीं आते हैं। कम से कम पिछले करीब एक दशक से तो शाहजहांपुर में यही देखने को मिल रहा है। शाहजहांपुर में पत्रकारों की हत्या से लेकर उनके साथ अभद्रता व हमले के कई मामले सामने आए, पर संगठनों के नेताओं ने पीड़ित परिवार की मदद करना तो दूर, उन्हे ढांढ़स बंधाने तक की जरूरत नहीं समझी।
पत्रकारों ने पत्रकारिता के नाम पर हर साल लाखों रुपये का चंदा वसूल कर आपस में बंदरबांट करने वाले पत्रकार संगठनों के मुखिया पत्रकारों के हित में कोई काम नहीं कर रहे हैं। जिले में चार-चार पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। कई पत्रकारों पर जानलेवा हमले हो चुके हैं, लेकिन चंदाखोरी में व्यस्त रहने वाले पत्रकार संगठनों के स्वयंभू मुखियाओं ने कभी भी पीड़ित पत्रकारों या उनके परिजनों का साथ नहीं दिया। पत्रकारों की उदासीनता के कारण कई महीने से सर्वेश हत्याकांड की फाइल थाने में धूल फांक रही है। परिजन जिन लोगों पर हत्या का शक कर रहे हैं, वे आज भी खुलेआम घूम रहे हैं। इस जिले में अब तक चार पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। तिलहर के पत्रकार साधुराम गंगवार को गायब हुए करीब सात साल बीत चुके हैं। उसकी बीवी ने काफी भागदौड़ की, लेकिन पत्रकार संगठनों के मुखियाओं ने कोई साथ नहीं दिया। नतीजन परिजनों को साधुराम की लाश देखना तक नसीब नहीं हुई। आज भी परिजन भटक रहे हैं। हर साल पत्रकारों के नाम पर 15-20 लाख चंदा उगाहने वाले पत्रकार संगठनों के मठाधीशों ने इस परिवार की कोई आर्थिक मदद तो दूर, हालचाल जानने की कोशिश तक नहीं की।
दैनिक जागरण के पत्रकार प्रदीप शुक्ला की हत्या ने तो पूरे जिले को हिलाकर रख दिया था। जीवित रहने पर प्रदीप शुक्ला के आगेपीछे मंडराने वाले मठाधीशों ने उनकी मौत के बाद उनके परिवार की कोई मदद नहीं की। उनकी पत्नी व बच्चों को यहां से पलायन कर जाना पड़ा। इसके बाद संतोष श्रीवास्तव की शहर के अंटा चौराहे पर गोली मारकर हत्या कर दी गई। चंदाखोर मठाधीशों ने उसके परिवार की भी कोई आर्थिक मदद नहीं की। अभी 29/30 दिसंबर 2011 की रात निगोही में पत्रकार सर्वेश की हत्या कर दी गई। निगोही कस्बा निवासी सर्वेश शर्मा तिलहर में बरेली से प्रकाशित खुसरो मेल अखबार के पत्रकार थे। वह रोज बाइक से तिलहर आते जाते थे। 29 दिसंबर 11 को वह तिलहर से घर के लिए चले, लेकिन पहुंचे नहीं। अगले दिन उनकी लाश निगोही थाना क्षेत्र में तिलहर-निगोही रोड पर ग्राम पिपरिया खुशाली के पास पड़ी मिली। सर्वेश के सिर में कनपटी के पास गहरा जख्म था। यही एकमात्र चोट उनकी मौत का कारण थी। इस मामले में तत्कालीन एसपी रमित शर्मा के निर्देश पर तुरंत अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया। इसी के साथ एसपी ने एएसपी सिटी के नेतृत्व में तीन जांच टीमें गठित कर दीं। ढाई महीने बाद भी यह जांच टीमें कुछ नहीं कर पाई हैं।
इस घटना में मृतक की पत्नी उमा ने पिछले दिनों एसपी को प्रार्थनापत्र देकर बसपा विधायक रोशनलाल के पुत्र मनोज के अलावा पिपरिया खुशाली गांव के धर्म परिवर्तन करने वालों व रेत खनन करने वालों पर शक जाहिर किया था। पुलिस ने इन संदिग्ध लोगों पर कार्रवाई तो दूर किसी से पूछताछ करने तक की जरूरत नहीं समझी। पत्रकार सर्वेश की पत्नी उमा का कहना है कि एक बालक को कार से कुचल देने के मामले की खबर छापने पर बसपा विधायक रोशनलाल के बेटे मनोज ने उनके पति को जान से मार देने की धमकी दी थी। इसके अलावा पिपरिया खुशाली गांव में धर्मांतरण की खबर छापने पर उस गांव के कुछ लोगों को जेल जाना पड़ा था। 23 दिसंबर को जमानत पर छूटने के बाद उन लोगों ने गांव में मीटिंग करके उसके पति की हत्या कर देने की शपथ ली थी। रेत माफिया भी खबरें छापने के कारण नाराज था। उमा का आरोप है कि विधायक के पुत्र के दबाव के कारण पुलिस संदिग्ध लोगों से पूछताछ तक नहीं कर रही है। पुलिस लगातार इस घटना को दबाने में जुटी है। किसी पत्रकार संगठन के मुखिया ने आज तक सर्वेश हत्याकांड के पर्दाफाश के लिए आवाज नहीं उठाई है। इस घटना के बाद मिर्जापुर में और तिलहर में पत्रकार पर जानलेवा हमले हो चुके हैं। इन घटनाओं पर भी पत्रकार संगठन खामोश ही रहे।
दरअसल इस चुप्पी के पीछे सबसे बड़ा कारण है पत्रकार संगठनों के मुखियाओं द्वारा अवैध धंधा करने वालों, माफियाओं, अपराधियों और अपराधियों को संरक्षण देने वाले राजनेताओं से मिलने वाली बंधीबधाई मोटी रकम। चूंकि पत्रकारों के खिलाफ होने वाली घटनाओं में इन असमाजिक तत्वों का कहीं न कहीं हाथ जरूर होता है। पत्रकारों के मुखिया इन असमाजिक तत्वों द्वारा ओब्लाइज किए जाते हैं। ऐसे में वे अपने ‘माईबापों’ के खिलाफ आवाज कैसे उठा सकते हैं। पिछले दो-तीन सालों से अपराधियों ने भी मीडिया में जगह बना ली है। मीडिया में प्रवेश पाना अपराधियों के लिए बहुत आसान है। लखनऊ से
प्रकाशित किसी अखबार की दस-बीस प्रतियों की एजेंसी ले आते हैं। मात्र पांच हजार रुपया खर्च होता है। एजेंसी देने वाले अखबारों के कर्ताधर्ता उनसे यह नहीं पूछते कि वह क्या करते हैं। उन्हें लिखना पढ़ना आता भी है या नहीं। एजेंसी के साथ ही उन्हें प्रेसकार्ड दे दिया जाता है। यह कार्ड अफसरों पर रौब गालिब करने के काम आता है। इसी तरह शाहजहांपुर में कई अंगूठाटेक पत्रकार बनकर दलाली के कामों में लिप्त हैं। यह पत्रकार दिन भर थानों पर बैठकर भ्रष्ट पुलिस वालों के लिए दलाली करते हैं। हत्या जैसी घटनाओं तक का मोलभाव करा देते हैं। हाल ही में हुआ किन्नर नैना हत्याकांड इसका जीता जागता उदाहरण है। इससे पहले पिछले साल हद्दफ का सन्नो रेप हत्याकांड में भी एक पत्रकार मठाधीश ने भूमिका निभाई थी। पुलिस से मिलकर न सिर्फ केस दबवा दिया बल्कि शव भी दफनवा दिया गया। बाद में सन्नों के पिता की गुहार पर डीजीपी के निर्देश पर रिपोर्ट लिखी गई और शव को खोदकर पीएम कराया गया तो आरोपों की पुष्टि हुई। केस को दबाने का काम करने वाला पत्रकार मठाधीश फिर भी बच गया, लेकिन उसकी पोल खुल गई।
मीडिया का दामन दागदार होने से बचाने के लिए जरूरी है कि इन अंगूठाटेक मठाधीशों और दलालों को आउट किया जाए और पढ़े-लिखे स्वच्छ छवि वाले युवा पत्रकार संगठनों की बागडोर संभालें और पत्रकारों के लिए अपनी आवाज बुलंद करें।


