: समाज सेवा के लिए राजनीति क्यों जरूरी नहीं है : राजनीति में प्रवेश क्यों और क्यों नहीं, यह सवाल किसी खास या आम व्यक्ति, समुदाय अथवा समूह का नहीं, बल्कि समय का है जो गली, नुक्कड, चौराहे, दफ्तर, दुकान, आँगन, खलियान हर तरफ अपना उत्तर तलाश रहा है। राजनीती की महिमा व महत्व सभी जानते हैं। इससे किसी को इनकार भी नहीं है। आखिर जैसे-तैसे ही सही, लेकिन देश चल तो इसी से रहा है। इसमें जो भी जहाँ जिस किसी दल या दलदल में है, सेवा की बातें करता है। जो किसी कारण से दलबदल भी करता है वह भी सेवा की ही कहानियाँ बयान करता है। जो नए लोग इसमें प्रवेश के लिए पंक्तिबद्व हैं, वे सभी सेवा की कथाएँ कहते हैं। यह अलग बात है कि यहां प्रवेश के लिए कोई भी स्थान रिक्त नही है, पहले से ही काफी भीड है यहाँ। और हो भी क्यों न, जो भी आता है बाहर तो जाता ही नहीं, अपने अस्थि-विर्सजन तक डटा-जमा रहता है।
इतने सेवाभावी लोगों के राजनीतिक जमघट के बीच देश बदहाल बेहाल है। कहीं न कहीं कोई खोट या खामी जरूर है। देश के संचालन के किए राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था के साथ न्याय व्यवस्था व समाज व्यवस्था भी बराबर का महत्व रखती है। आज के दौर में राजनीति की स्थिति कुछ ऐसी हो चली है, जिसकी वजह से बराबर सुधार, परिवर्तन या रद्दोबदल के नारे लगाए जाते हैं। जहाँ तक न्याय व्यवस्था का सवाल है तो उसमें भी विसंगतियाँ हैं। परंतु फिर भी पिछले एकदशक से उसमें एक अभूतपूर्व सक्रियता आई है। कई संकट की घड़ियों में न्याय व्यवस्था ने साहसिक कदम उठाकर सराहनीय कार्य किया है। जहाँ तक समाज व्यवस्था की बात है, तो उस ओर किसी का ज्यादा ध्यान नहीं है। शायद इसलिए क्योंकि यहाँ की चमक-दमक फीकी है अथवा इसलिए, क्योंकि यहाँ सामर्थ्य का शक्तिशाली साम्राज्य नहीं है। संभवतः इसलिए यह क्षेत्र प्रायः उपेक्षित पड़ा है।
बात लाख टके की है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है कि समाज व्यक्तित्व गढे जाने की टकसाल है। यहाँ जितनी शुद्धता, संवेदनशीलता, उच्च जीवन मूल्य व उत्कृष्ट परंपराएं होंगी, उतने ही उन्नत व्यक्तित्व यहाँ विकसित हो सकेंगे। यदि समाज में गुणवत्ता नहीं है तो गुणवान व्यक्तित्व की खोज भी मुश्किल हो जाएगी। जो लोग राजनीति में किसी दल के खिलाफ हैं या फिर प्रशासन व न्याय व्यवस्था में रिश्वतखेरी की बातें करते हैं उन्हें यह समझ लेना चाहिए की निकृष्ट व्यक्तित्व कही भी रहें वे सदा निकृष्ट आचरण ही करते हैं।
आज की आवश्यकता गुणवान व्यक्तियों की है और यह कार्य सामाजिक व्यवस्था के परिष्कार के बिना असंभव है। कुछ लोगों का कहना है कि राजनीति में प्रवेश करके ही इसे सुधारा जा सकता है। संभव है इस बात में कोई सार हो। पर जितने भी राजनीतिक दल अभी वर्तमान में हैं उनमें से किसी के सिद्वान्तों में कोई खास बुराई नहीं है, बुराई तो उनके व्यवहार में है। पार्टियों में बुराई नहीं है, उसके नेतृत्व के दिलों में बुराई है। किसी राजनीतिक दल ने अपने घोषणा पत्र में घोटाला करने की बात नहीं कही है। लेकिन वे सत्ता में आने पर घोटाले करते हैं। इसी तरह किसी राजनीतिक दल ने वंशवाद को अपना नैतिक अधिकार नहीं माना है पर ज्यादातर पार्टियों में वंशवाद की परंपरा है। इसकी वजह दलों की सैद्वांतिक संरचना में नहीं बल्कि उत्कृष्ट व्यक्तियों के अभाव में है।
स्वाधीनता संघर्ष के युग में राजनीतिक आंदोलन में भागीदारी राष्ट्रसेवा और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता की प्रतीक मानी जाती थी। उस समय यह सही था, क्योंकि सत्ता परायों के हाथ में थी। विदेशी राज्य को स्वराज्य में बदलना था, लेकिन आज परिस्थियाँ भिन्न हैं। अभी तो हर कही स्वराज्य है, पर सुराज्य में अच्छे शासन का अभाव है। वर्तमान चुनौती स्वराज्य को सुराज्य में बदलने की है। इसके लिए समाज की जड़ों में पानी देना होगा। अच्छे व्यक्तित्व गढने होंगे, जो न केवल राजनीति को दिशा दें, बल्कि संपूर्ण राष्ट्रीय व्यवस्था में अपना सार्थक योगदान प्रस्तुत करें।
लोकमान्य तिलक अपने समय के सर्वमान्य राजनेता थे। वे अपने युग के शिखर राजनीतिक पुरूष थे। उन्होंने ही यह नारा दिया था कि स्वराज्य हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। उन्हीं दिनों तिलक से किसी ने पूछा- यदि इन कुछ वर्षों में स्वराज्य मिल गया तो आप सरकार के किस पद को सँभालना पसंद करेंगे, इस सवाल को पूछने वाले ने सोचा था कि तिलक महाराज उत्तर में प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति बनने की मंशा जाहिर करेंगे लेकिन उन्हें तो लोकमान्य तिलक का उत्तर सुनकर हैरानी हुई क्योंकि उन्होंने कहा- मैं तो देश के स्वाधीन होने के पश्चात स्कूल का अध्यापक होना पसंद करूँगा। इस पर सवाल पूछने वालों ने जानना चाहा- ऐसा क्यों कह रहे हैं आप? तो उन्होंने उत्तर दिया- स्वाधीनता के पश्चात देश को सबसे बड़ी जरूरत अच्छे नागरिक एवं उन्नत व्यक्तित्वों की होगी जिसे शिक्षा व समाजसेवा के द्वारा ही पूरा किया जाना संभव है।
यह अपने देश का दुर्भाग्य ही है कि लोग सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश तो करना चाहते हैं, पर उनका दृष्टिकोण अति संकीर्ण होता है। लोग राजनीति को ही सब कुछ समझ लेते हैं। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में जितने नियत स्थान होते हैं उससे कई गुना उम्मीदवार प्रत्याशी के तौर पर खड़े होते हैं। अपनी जीत के लिए हर संभव छल-बल और कौशल का प्रयोग भी करते हैं। कभी-कभी तो ये मतदाताओं में मतिभ्रम पैदा करके उपयुक्त प्रत्याशियों का मार्ग भी रोक देते हैं। आज के दौर में सुस्पष्ट देखा जा सकता है और यह वर्तमान की विडंबना भी है कि जिन्हें समाजसेवा करनी चाहिए वे स्वयं राजनीति के प्रति आकर्षित होते दिखाई देते हैं। तुलसीदास ने लिखा है कि कालानाग चमकीला होता है, पर विष से भरा होता है, माँ अपने बच्चों को उससे बचाती है कि कहीं उसे देख कर उससे खेलने न लगे। राजनीति भी कुछ इसी प्रकार की है। उसमें मद है, अहं के विस्तार हेतु परिपूर्ण गुंजाइश है।
लेखक ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी महराजगंज (यूपी) के निवासी हैं और दैनिक जागरण व अमर उजाला से जुड़े रहे हैं. वर्तमान में वन्य जीव संरक्षण के लिए कार्य करते हैं. ज्ञानेन्द्र से संपर्क 09621583583 के जरिए किया जा सकता है.


