आइये थोड़ी देर मूर्खता की बात करें। साल भर हम इससे बचते हैं लेकिन एक दिन हमारे पुरखों ने हमें दिया है, जब हम न केवल मूर्खता के बारे में बात कर सकते हैं बल्कि मूर्खतापूर्ण बात भी कर सकते हैं। असल में जो मूर्खता भरी बात करते हैं, जरूरी नहीं कि वे मूर्ख हों ही। ज्यादातर ऐसे लोग बहुत चालाक होते हैं। उनकी चालाकी खुल न जाये, इसलिए वे मिलावटी और बनावटी मूर्खता के साथ पेश आते हैं। इस देश में अमूमन सही और ईमानदार लोगों को बेवकूफ या मूर्ख कह दिया जाता है। वे होते भी हैं। जब सभी लोग बहती गंगा में हाथ धो रहे हों तो मूल्यों की बात करना, नैतिकता का आचरण करना मूर्खता नहीं तो और क्या है।
लोग वक्त की दौड़ में कितना आगे निकल चुके हैं। जब एक चपरासी ढाई करोड़ का बैंक बैलेंस बनाकर मस्त रह सकता है, एक क्लर्क पांच करोड़ की संपत्ति जमा कर सकता है तो ट्रेन की सीट के नीचे से मिले दस लाख रुपये कोई पुलिस को सौंपने थाने पहुंच जाये तो उसे कोई भी मूर्ख कहेगा। पर क्या करियेगा, कुछ लोगों को इन्हीं मूर्खताओं में मजा आता है, इसी में चैन मिलता है। यहाँ एक सच जानना बहुत जरूरी है कि जो मूर्ख बनाने में सिद्धहस्त होते हैं, वे भी मूर्खतापूर्ण तरीकेसे ही पेश आते हैं ताकि उन्हें लोग असली मूर्ख समझ बैठें। असली मूर्ख यानी ईमानदार।
हमारे देश में मूर्खों का बड़ा मान रहा है। जो मूर्ख बनाने की कला में पारंगत हैं, वे तो महान हैं ही पर उनसे भी महान वे लोग हैं तो मूर्ख बनते हैं या जो मूर्ख बने रहने में सुखी महसूस करते हैं। मूर्खों की कई श्रेणियाँ होती हैं। पहले तो वे जो सचमुच मूर्ख होते हैं। जिनके लिए तुलसीदास ने बहुत सम्मानपूर्वक कहा है, सबसे भले विमूढ़ जन, जिनहिं न व्यापत जगत गति। जो जगत के व्यापार से अप्रभावित रहते हैं। वे जगत को समझ ही नहीं पाते, इसलिए जगत भी उन्हें नहीं समझना चाहता है। वे समझदार नासमझ होते हैं। उन्हें सच में कुछ भी समझ में नहीं आता। ऐसे महापुरुषों की प्रतिष्ठा में संत तुलसीदास आगे एक और बात कहते हैं, मूरख हृदय न चेत जो गुरु मिलहिं विरंचि सम। साक्षात ब्रह्मा भी गुरु बन कर आ जायें तो भी मूर्ख के हृदय में चेतना जगाना उनके वश की बात नहीं होगी। महान विद्वान बनने के पहले कालिदास इसी कोटि केमूर्ख थे। विद्योत्तमा से शास्त्रार्थ में पराजित ईष्यालु विद्वानों ने तब उन्हें ढूंढ़ निकाला, जब देखा कि एक आदमी जिस डाल पर बैठा है, उसी को काट रहा है। ऐसे मूर्ख से विद्योत्तमा की शादी कराकर वे उससे पराजय का बदला लेना चाहते थे। बाद में वही मूर्ख साबित हुए और कालिदास कालिदास बन गये।
दूसरी किस्म के मूर्ख वे होते हैं जो वास्तव में मूर्ख तो होते हैं पर अपनी चालाकी के घटाटोप से अपनी मूर्खता को ढंके रखना चाहते हैं। इन्हीं मूर्खों के लिए चाणक्य ने एक नीति श्लोक रचा, दूरच्च शोभते मूर्खा, लंबशाटपटावृत। तावच्च शोभते, यावच्च किचिन्न भाषते। अच्छी वेश-भूषा में दूर से मूर्ख शोभायमान तो होता है लेकिन वह तभी तक शोभायमान होता है, जब तक कुछ बोलता नहीं। जबान चलाते ही उसका भेद खुल जाता है, उसकी मूर्खता उजागर हो जाती है। ऐसे मूर्खों की आजकल भरमार हैं। कोई भी उनके रहन-सहन, वेश-भूषा, ऐशो-आराम को देखकर रश्क कर सकता है। लेकिन चाणक्य को इस मामले में समय ने गलत साबित कर दिया है। इन्हीं मूर्खों को आप सबसे ज्यादा बोलते पायेंगे। वे कुछ भी बोलें, लोग उन्हें महान ठहराते हैं, उनकी मूर्खता भरी बातों की अकादमिक व्याख्या करते हैं और अनर्थ के भीतर से भी अद्भुत और सुखद अर्थ खोज निकालते हैं। आप मूर्ख ठहराये जा सकते हैं, अगर इन्हें मूर्ख मानने की गलती करते हैं। तीसरी तरह के मूर्ख वे होते हैं जो मूर्ख होते नहीं पर दुनिया उन्हें मूर्ख मानती, समझती है। वे जिद्दी, अडिय़ल, सच्चे और स्वाभिमानी होते हैं। इन मूल्यों के लिए वे तनिक भी नहीं झुकते और इसी जुनून में हमेशा मारे जाते हैं। ऐसी मूर्खता किसी काम की नहीं। न किसी का काम होने देती है, न अपना काम बनने देती है।
मेरे एक गुरुजन की मूर्खों के बारेमें अद्भुत धारणा थी। वे मनोविज्ञान केआदमी थे। उनका आई क्यू पर बड़ा जोर रहता था। वे आदमियों को चार श्रेणी में रखते थे, कुशाग्र, मेधावी, साधारण और मूर्ख। उन्होंने बड़े ही मूर्खतापूर्ण तरीके से मूर्खों के बारे में ज्यादा जानकारी इकट्ठा करने में अपने कई साल गंवाये। उनकी इस निरर्थक व्यस्तता के कारण उनकी पत्नी उन्हें मूर्ख बनाकर किसी और के साथ भाग गयी, उनके बच्चों ने उन्हें बेवकूफ बनाकर पढ़ाई खर्च के नाम पर उनसे खूब पैसे ऐंठे। पर वे अविचलित भाव से मूर्खों पर शोध करते रहे। उनका शोधपत्र लंदन की बेस्ट फूल्स मैगजीन में बड़े महत्वपूर्ण ढंग से प्रकाशित हुआ। मूर्खों के बारे में उनका पूरा शोध बताना अभी वक्त जाया करने के सिवा कुछ और नहीं माना जायेगा लेकिन उनके शोधपत्र के उपसंहार की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी बताकर मैं आप को मूर्ख बनाना चाहूंगा और इस तरह उपकृत करना चाहूंगा। इससे आप किसी भी मूर्ख को आसानी से पहचान सकेंगे। उनका मानना था कि जब कोई चुटकुलेदार बात चल रही होती है तो मूर्ख उस पर तीन बार हँसता है। पहले तो वह इस प्रत्याशा में ही ठठ्ठा मार कर हँस पड़ता है कि यह जरूर कोई जोक है। फिर जब जोक पूरा हो जाता है और उसे समझने वाले उस पर हँसते हैं तो वह उनके साथ इसलिए हँसता है कि जरूर कोई ऐसी बात हुई है, जिस पर हँसा जाना चाहिए। और अंतिम बार वह तब हँसता है, जब वह वहाँ मौजूद किसी आदमी से वही जोक साग्रह फिर से सुनता है।
मूर्खों की अपने देश में बड़ी महिमा है। उनका बड़ा आदर-सत्कार है। वे आप को हर जगह मिल जायेंगे। देश की बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियाँ उनके हाथ में हैं। वे उन्हें अपनी संपूर्ण मूर्खता के साथ संभाल रहे हैं और देश का कबाड़ा कर रहे हैं। एक बुद्धिमान मूर्ख की तरह बात कही जाय तो इस देश में जुगाड़ और कबाड़ के सिवा रखा क्या है। जो जुगाड़ में माहिर हैं, वे अपने काम आसानी से बना रहे हैं। उन्हें ही देश को कबाड़ बनाने का महान श्रेय दिया जाना चाहिए। बाकी जो बचे यानी जो जुगाड़ू नहीं हैं, उन्हें आप केवल कबाड़ी कह सकते हैं। इस मूर्खतापूर्ण विश्लेषण से अगर आप को थोड़ा भी सुख मिला, थोड़ा भी आनंद आया तो मेरी मेहनत सार्थक हुई, ऐसा मानने की मूर्खता करने के लिए मैं आजाद हूं। आप की मूर्खता आप को मुबारक। चलिये अब किसी को
मूर्ख बनाकर आज के दिन की उपयोगिता साबित कीजिए।
लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला, डीएलए और जनसंदेश टाइम्स के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों लखनऊ से प्रकाशित डेली न्यूज एक्टिविस्ट के प्रधान संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को डेली न्यूज एक्टिविस्ट से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.


