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देश के संविधान निर्माता को यह मीडिया हीरो नहीं मानता

जब किसी फार्चून मैगजीन में किसी इंदिरा नूयी या किसी सोनिया गाँधी का नाम महत्वपूर्ण लोगों की लिस्ट में छप जाता है तो अपने देश के टीवी चैनलों को लगता है कि उस दौर में उस से बड़ी कोई खबर ही नहीं है. मेरे पुराने चैनल में किसी ग्रैमी अवार्ड की खबर को इस तरह से हाहाकार स्टाइल में प्रचारित किया जाता था कि अपनी नौकरी के शुरुआती बरसों में मुझे लगा कि यह ग्रैमी अवार्ड अपनी ही कंपनी से सम्बंधित कोई अवार्ड है. बुकर प्राइज़ के विजेताओं के बारे में भी इसी तरह का हो हल्ला मचता है. लेकिन जब बीसवीं सदी के भारत के सबसे बड़े सपूतों में से एक का नाम दुनिया के शीर्ष यूनिवर्सिटी अपने सबसे महत्वपूर्ण पूर्व छात्रों की सूची में छापती है तो अपने देश के मीडिया के लिए कोई खबर नहीं बनती.

जब किसी फार्चून मैगजीन में किसी इंदिरा नूयी या किसी सोनिया गाँधी का नाम महत्वपूर्ण लोगों की लिस्ट में छप जाता है तो अपने देश के टीवी चैनलों को लगता है कि उस दौर में उस से बड़ी कोई खबर ही नहीं है. मेरे पुराने चैनल में किसी ग्रैमी अवार्ड की खबर को इस तरह से हाहाकार स्टाइल में प्रचारित किया जाता था कि अपनी नौकरी के शुरुआती बरसों में मुझे लगा कि यह ग्रैमी अवार्ड अपनी ही कंपनी से सम्बंधित कोई अवार्ड है. बुकर प्राइज़ के विजेताओं के बारे में भी इसी तरह का हो हल्ला मचता है. लेकिन जब बीसवीं सदी के भारत के सबसे बड़े सपूतों में से एक का नाम दुनिया के शीर्ष यूनिवर्सिटी अपने सबसे महत्वपूर्ण पूर्व छात्रों की सूची में छापती है तो अपने देश के मीडिया के लिए कोई खबर नहीं बनती.

कहीं ऐसा तो नहीं कि मीडिया के मठाधीशों की सवर्ण मानसिकता उन्हें डॉ. भीम राव अंबेडकर को महान आदमी मानने से रोकती है. इस बात की पड़ताल की जानी चाहिये. अमरीका की  कोलंबिया यूनिवर्सिटी दुनिया के शीर्ष शिक्षा संस्थानों में मानी जाती है. डॉ. भीम राव अंबेडकर ने इसी  कोलंबिया से उच्च शिक्षा पायी थी. यहीं के छात्र के रूप में उन्होंने जाति संस्था के विनाश के बुनियादी विचारों का अध्ययन किया था. सन १६५४ में कोलंबिया यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई थी. अपने २५० साल पूरे होने के बाद कोलंबिया ने अपने पूर्व छात्रों में से एक सौ महान लोगों की एक सूची जारी की. सूची में भारत के डॉ. भीम राव अंबेडकर का स्थान पहला है. वे इस संस्था में १९१६ में छात्र थे.

इस लिस्ट में तीन अमरीकी राष्ट्रपतियों के नाम भी है. अन्य देशों के ६ राष्ट्राध्यक्ष भी इस लिस्ट में हैं. कई ऐसे विद्वान भी इस लिस्ट में हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिल चुका है. अमरीकी मीडिया में इस खबर की खासी चर्चा रही, लेकिन भारतीय मीडिया में इतनी बड़ी खबर का कहीं नाम तक नहीं है. विश्वविद्यालय ने दुनिया भर के कई महान विभूतियों की मदद से एक सौ  पूर्व छात्रों का चुनाव करने के बाद विद्वानों की एक कमेटी बनाई गयी, जिसने पूर्व छात्रों की वरीयता तय की. इसी कमेटी ने डॉ. भीम राव अंबेडकर का नाम सबसे ऊपर रखा. उसके बाद एक पत्थर पर यह सारे नाम लिखे गए. इस स्मारक को कोलंबिया विश्वविद्यालय के एक प्रमुख स्थान पर लगाया गया है. भारत के इकलौते महान व्यक्ति का नाम होने के बावजूद भारत के किसी भी टीवी चैनल ने इस खबर को हाईलाइट नहीं किया. टीआरपी का रोना रोते पाए जाने वाले पत्रकारों से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि खबर के प्रस्‍तुतिकरण में पारदर्शिता और सूचना की महत्ता को भी प्राथमिकता दें.

यह याद दिलाना ज़रूरी है कि डॉ. भीमराव अंबेडकर का नाम उन लोगों में शामिल हैं, जिनकी एक छोटी सी किताब को यह श्रेय दिया जाता है जिसने बीसवीं सदी के भारत के इतिहास और राजनीति को दिशा दी. जिन पांच किताबों ने बीसवीं सदी के भारत की राजनीति को दार्शनिक आधार दिया, उसमें डॉ. अंबेडकर की किताब “जाति का विनाश” का बहुत अधिक योगदान है. बताते चलें कि जिन पांच किताबों ने इस देश की राजनीति को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है उनके नाम हैं —- मार्क्स की ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’, ज्योतिबा फुले की ‘गुलामगीरी’, महात्मा गाँधी की ‘हिंद स्वराज’, डॉ. भीम राव अंबेडकर की ‘जाति का विनाश’ और वीडी सावरकर की ‘हिंदुत्व’.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा कॉलमिस्‍ट हैं. वे इन दिनों दैनिक अखबार जनसंदेश टाइम्‍स के नेशनल ब्‍यूरोचीफ हैं.

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