लोग कहते हैं कि इंडिया टुडे बहुत बड़ी (और अच्छी) मैगजीन है। लगता भी था। मगर कुछ सालों से इंडिया टुडे वाले लोगों की देह का जायजा लेकर इस मैगजीन का जायका बिगाड़ रहे हैं (इंडिया टुडे वाले इस बात को नहीं मानेंगे, बुद्धिजीवी की खाल में बनिया जो ठहरे)। दिलीप मंडल सम्पादक बने और दौड़ पड़े “इंडिया टीवी” की कतार में शामिल होने के लिए। टीवी के दर्शकों की तरह प्रिंट मीडिया के भी पाठक होते हैं। संख्या बढ़ानी पड़ती है, (संपादकों के) “पापी पेट” का सवाल है। उभारों की गहन छान-बीन के लिए इंडिया टुडे को शर्मसार ना होने के लिए बधाई। पर एक बात समझ में नहीं आई। इंडिया टुडे क्यों राष्ट्रीय सरोकार रखने वाली मैगजीन के तहत नम्बर वन पर अभी भी काबिज़ है? उभार और कटाव ही इसके नम्बर वन होने का कारण क्यों बनता जा रहा है? क्या इंडिया टुडे को पाठकों की मानसिकता समझ में आ गयी है या अपनी मानसिकता के तहत ये मैगजीन- पाठकों को समझने की कोशिश कर रही है?
मामला कुछ उलझा हुआ सा लगता है। न्यूज़ चैनल के नाम पर मनोरंजन करने वाले अजीत अंजुम जी ने साहस करते हुए कूटनीतिक अंदाज़ में दिलीप मंडल साहब को आईना दिखाने की कोशिश की। पर फिर उन्हें भी लगा कि जिनके घर (न्यूज़24) शीशों के होते हैं वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं बरसाते। किसी भी बड़ी मैगजीन या न्यूज़ चैनल का सम्पादक (जुगाड़ या योग्यता से) होना बहुत बड़ी बात है, ऐसा लोग कहते हैं। इस सम्पादक में उदारीकरण के वो सारे गुण होने चाहिए, जो इस समय दुनिया में प्रचलित हैं। क्वालिटी से ज़्यादा क्वांटिटी- ये मूलमंत्र है। पत्रकार जब छोटे पदों पर रहता है तो बनियागिरी और पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों में फर्क समझता है। जैसे-जैसे प्रमोशन पाता जाता है फर्क धुंधला होता चला जाता है। बड़ी टी.आर.पी. वाले चैनल्स और ज़्यादा सर्कुलेशन वाली पत्रिकाओं के “बड़े” संपादकों से आप इस मुद्दे पर हामी (छुपे तौर पर) भरवा सकते हैं।
इंडिया टुडे आम आदमी से सरोकार रखती है या आम आदमी के ज़ेहन में तन को लेकर चल रही रस्साकशी से? इसका जवाब इंडिया टुडे के “महान” संपादकों को देना चाहिए। जवाबदेही के लिए सिर्फ नेता या सरकारी अधिकारी ही नहीं होता बल्कि पत्रकारिता भी जवाबदेही के दायरे में आती है। उदारीकरण के इस दौर में इन संपादकों को इतना उदार तो होना ही चाहिए। दिलीप मंडल साहब अकेले ऐसे इंडिया टुडे के सम्पादक नहीं है जो उभार और कटाव की जानकारी पाठकों तक पहुंचा रहे हैं बल्कि इस से पहले आये संपादकों ने भी सेक्स को बिक्री का ताक़तवर ज़रिया मानकर ये खेल खेला। अजीब बात है कि जिस देश में बड़े राष्ट्रीय आयोजनों के वक़्त साड़ियों से ढंका तन राष्ट्रीय संस्कृति का गुणगान करता है वहीं दूसरी तरफ “चीरहरण” के ज़रिये नयी संस्कृति का बखान। कम कपडे़ या नंगा बदन हमारी पहचान कभी नहीं रहे (जो इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते वो राष्ट्रीय पहचान को चुनौती दे सकते हैं) और ना ही सेक्स की नैसर्गिक भूख से कभी किसी ने इनकार किया (आम समाज में रहने वाले गर इनकार करते होंगे तो कोई कारण ज़रूर होता होगा)। बावजूद इसके उभार और कटाव के चर्चा को हवा दी जा रही है और इसे हमारी नयी पहचान बताया जा रहा है। मोबाइल और इन्टरनेट के युग में यूँ ही हर चीज़ बेपर्दा हो चली है। पर बे-पर्दा करने के खेल में “बादशाह” बनने का खेल वो भी इंडिया टुडे जैसी मैगजीन द्वारा हज़म नहीं होता।
इतिहास गवाह है कि लोगों के तन की माप लेने वाली पत्रिकाएँ शुरुवाती दौर में पसंद की गयीं, लेकिन बाद में सम्मान के लिए लाइन में खड़े होने को तरस गयीं। बनिया और पत्रकार में एक अंतर ज़बरदस्त होता है- पत्रकार खुलते-खुलते भी अधखुला रह जाता है, बनिया खुल कर ही जीवन यापन करता है। सम्पादक, बनिया का नौकर होता है और जानता है कि मालिक के आगे और गधे के पीछे रहने का परिणाम बुरा होता है। पर उसे ये भी जानना चाहिए कि जो ना गधा बन पाए, न घोड़ा, वो खच्चर हो जाता है। बच्चा कैसे पैदा होता है या सेक्स का चरम आनंद किस तरह मिल सकता है या उभार और कटाव कितने प्रभावशाली हैं – ये इंडिया टुडे जैसी पत्रिका से सरोकार नहीं रखता, पर रख रहा है। इंडिया टुडे को मालूम होना चाहिए कि उभार और कटाव का काम कई पत्र-पत्रिकाएँ बखूबी करती हैं और उनके पाठकगण भी प्रचुर संख्या में हैं। इंडिया टुडे को उसमें सेंध लगाने से बाज आना चाहिए। इंडिया टुडे को हम एक प्रभावशाली और राष्ट्रीय सरोकार रखने वाली मैगजीन के रूप में जानते थे और उम्मीद करते हैं कि इंसान के तन की नब्ज़ पहचानने के बजाय इंडिया टुडे इस देश की नब्ज़ टटोलने की पुरानी कोशिश करेगा। मानने या न मानने का अधिकार इसके मालिकान और संपादकों के पास सुरक्षित है।
लेखक नीरज टेलीविजन पत्रकार हैं.


