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नई अर्थव्यवस्था और पुरानी संस्कृति के टकराव में सुबह कभी तो आएगी

छत्तीसगढ़ आज से दस वर्ष पूर्व पृथक राज्य बना,तब तत्कालीन मुख्यमंत्री अपने भाषणों में छत्तीसगढ़ की सवा करोड़  जनता को संबोधित किया करते थे. अब दस वर्षों बाद मुख्यमंत्री अपने भाषणों में दो करोड़ चालीस लाख की जनसंख्या को संबोधित करते हैं. छत्तीसगढ़ की भूमि या मानव संसाधन इतना उर्वर तो कभी नहीं रहा फिर आबादी में यह वृद्धि कहां से आई यह सचमुच शोध का विषय है. पृथक छत्तीसगढ़ के लिए कभी भी झारखण्ड की तरह तीव्र आंदोलन नहीं हुआ. जो कुछ भी छोटे- मोटे आंदोलन हुए वह मैदानी पट्टी तक सीमित रहे. छत्तीसगढ़ को अगर दो प्रमुख हिस्सों में बांटा जाये तो वह होगा –उत्तर और दक्षिण का पहाड़ी इलाका व पूरब और पश्चिम की मैदानी पट्टी. पृथक छत्तीसगढ़ के आंदोलन का प्रभाव पूरब से पश्चिम की मैदानी पट्टी तक ही सीमित रहा. उत्तर और दक्षिण के पहाड़ी इलाके इससे सर्वथा अछूते रहे. अंग्रजों द्वारा रेल लाइन भी पूरब से पश्चिम की पट्टी पर ही बिछाई गई थी.

छत्तीसगढ़ आज से दस वर्ष पूर्व पृथक राज्य बना,तब तत्कालीन मुख्यमंत्री अपने भाषणों में छत्तीसगढ़ की सवा करोड़  जनता को संबोधित किया करते थे. अब दस वर्षों बाद मुख्यमंत्री अपने भाषणों में दो करोड़ चालीस लाख की जनसंख्या को संबोधित करते हैं. छत्तीसगढ़ की भूमि या मानव संसाधन इतना उर्वर तो कभी नहीं रहा फिर आबादी में यह वृद्धि कहां से आई यह सचमुच शोध का विषय है. पृथक छत्तीसगढ़ के लिए कभी भी झारखण्ड की तरह तीव्र आंदोलन नहीं हुआ. जो कुछ भी छोटे- मोटे आंदोलन हुए वह मैदानी पट्टी तक सीमित रहे. छत्तीसगढ़ को अगर दो प्रमुख हिस्सों में बांटा जाये तो वह होगा –उत्तर और दक्षिण का पहाड़ी इलाका व पूरब और पश्चिम की मैदानी पट्टी. पृथक छत्तीसगढ़ के आंदोलन का प्रभाव पूरब से पश्चिम की मैदानी पट्टी तक ही सीमित रहा. उत्तर और दक्षिण के पहाड़ी इलाके इससे सर्वथा अछूते रहे. अंग्रजों द्वारा रेल लाइन भी पूरब से पश्चिम की पट्टी पर ही बिछाई गई थी.

रेल लाइन बिछाने का जनसंख्या और संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ा, इसका अध्ययन करना दिलचस्प होगा. रायगढ़ में सन 1986 में ठाकुर साहब डिप्टी कलेक्टर के रूप मे पदस्थ थे. उनके पास मेरा आना जाना प्रायः होता था. एक दिन जब मैं उनके घर पहुंचा तो वे बहुत से पुराने रेकॉर्ड्स खंगाल रहे थे. उन्होंने बतलाया कि वे जनसंख्या वृद्धि का अध्ययन कर रहे हैं और उन्होंने कुछ दिलचस्प आंकड़े दिखलाये. आंकड़ों से यह पता चलता था की अंग्रेजों के समय कराई गई जनगणना में रायगढ़ और सारंगढ़ रियासत की जनसंख्या दो दशकों तक करीब करीब बराबर रही और रायगढ़ में रेल लाइन बिछने के बाद जनगणना में अचानक तीन हज़ार से पन्द्रह हज़ार की वृद्धि दर्ज की गई. उस समय रेल ही भारत में औद्योगीकरण का प्रतीक थी.

इस तरह छत्तीसगढ़ के जिन इलाकों में रेल की पटरियां बिछीं वहां आबादी बढ़ी और वहां शहरीकरण हुआ. यह बढ़ी हुई आबादी निश्चित रूप से दूसरे प्रदेशों से आई थी और यह आबादी अपने साथ अपनी संस्कृति भी लेकर आई थी. छत्तीसगढ़ में आबादी अन्य प्रदेशों की तुलना में हमेशा विरल रही. आज भी बस्तर का क्षेत्रफल केरल राज्य से ज्यादा है. ज़मीन की अधिकता थी इसलिए यहां पलायन बिहार या उत्तर प्रदेश की तर्ज पर नहीं हुआ बल्कि यहां लोगों का आगमन ही ज्यादा हुआ.

एक और खासियत छत्तीसगढ़ को अन्य प्रदेशों से अलग कराती है वह है ज़मीनी समीकरण. उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे प्रदेशों में जहाँ अस्सी प्रतिशत ज़मीन सवर्णों के हाथों में रही वहीं छत्तीसगढ़ में ज़मीनें प्रायः पिछड़ों और आदिवासियों के पास ही रहीं. यहां ज़मींदार और गौंटिया भी पिछड़े और आदिवासी ही रहे. आदिवासी राजाओं की बहुतायत रही. यहां तक कि पुराने मंदिरों के पुजारी भी प्रायः पिछड़ी जाति के या फिर आदिवासी बैगा ही रहे.

इन समीकरणों के चलते यहां की जनता ज्यादा उदार और शांतिप्रिय रही. जहाँ जीवन में संघर्ष होता है वहां की जनता ज्यादा जुझारू होती है. खैबर दर्रे से लेकर पंजाब तक का इलाका जो भारतीय प्रायदीप में विदेशी आक्रमण का प्रमुख रास्ता था, वहां की जनता ज्यादा जुझारू रही है. बिहार और उत्तर प्रदेश में ज़मीनी समीकरण के चलते संघर्ष रहा इसलिए यहां की जनता ज्यादा जुझारू रही. पलायन भी यहीं ज्यादा हुआ और पलायन के कारण इनकी संस्कृति का फैलाव भी पूरे देश में हुआ. यही कारण है की फिल्म-संगीत और गीतों पर सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश और बिहार के लोकसंगीत का प्रभाव है. गोरी या गोरिया, जो सुंदर लड़की का प्रतिमान है, वह भी उत्तर भारत की देन है. छत्तीसगढ़ में तो सौंदर्य का प्रतीक गोरी न होकर कारी है. हिंदी फिल्मों में भी जो ग्रामीण भारत दिखलाया गया उसमें छत्तीसगढ़ न के बराबर रहा है. कारण वही है, उत्तर भारत में पलायन के कारण लोग देश भर में फैले और फिल्म का शुरुआती बाजार चवन्निया टिकिट पर आधारित रहा इसलिए उत्तर भारत का ग्रामीण इलाका फिल्मों में दिखता रहा. आज मल्टीप्लेक्स के ज़माने में तो ग्रामीण जीवन ही गायब हो गया है क्योंकि इसका बाजार और दर्शक वर्ग बिलकुल अलग है. गिरमिटिया मजदूर मॉरिशस और फिजी तक गए, अपनी मेहनत से वहां के समाज में अपनी जगह बनाई और आज भोजपुरी फिल्मों और गीतों का बाजार वहां तक पहुंच गया. हिंदी फिल्मों में पंजाबी तड़का भी ऐसे ही बाज़ार बनने के कारण लगा.

औद्योगीकरण के इस दौर में अब छत्तीसगढ़ से भी पलायन होने लगा है और मजदूर अब नागपुर से लेकर कश्मीर तक जाने लगे हैं. इसलिए “सास गारी देवे” या पिपली लाइव में “माटी के चोला” जैसे गीतों को स्थान मिलने लगा है. अब छत्तीसगढ़ी फिल्मों और अलबमों का छत्तीसगढ़ के बाहर भी एक बाज़ार बन गया है. यह चवन्निया टिकिट वालों का बाजार है जो नई टेक्नोलोजी के कारण लागत में आई कमी के चलते विकसित हुआ है.

छत्तीसगढ़ में पलायन से ज्यादा आगमन हुआ. दूसरे प्रदेशों के लोग यहां आते रहे, नौकरियों में, व्यवसाय में, वकालत और डॉक्टरी से लेकर अन्य पेशों में. इस आबादी ने ही शहर बसाए और ये लोग अपने साथ अपनी संस्कृति भी लेकर आये. शहरी केन्द्रों में छत्तीसगढ़िया की स्थिति घरेलू नौकर जैसी ही रही. इसीलिए उसकी बोली को भी वह स्थान प्राप्त नहीं हो पाया. छत्तीसगढ़ी को भले ही राजनैतिक कारणों से राज भाषा का दर्जा मिल गया पर वह राज करने वालों की भाषा नहीं बन पायी. आज भी आपको ऐसे लोग मिल जायेंगे, जो बड़े गर्व से कहते हैं की उन्हें छत्तीसगढ़ी नहीं आती. जबकि छत्तीसगढ़ में रहते हुए उनकी एक पीढ़ी गुजर गयी. अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में ही राजनैतिक कारणों से ही सही लेकिन शहीद वीर नारायण की खोज हुई, गुरु घासीदास को महत्व मिला, सुन्दरलाल शर्मा का मूल्यांकन हुआ और पंडवानी गायिका तीजन बाई को खोजा गया. पंथी नृत्य को महत्व मिला. भारत भवन के माध्यम से सरगुजा से लेकर बस्तर तक शिल्पकारों को स्थान मिला, परन्तु इसके राजनैतिक कारण थे,शुक्ल बंधुओं के प्रभामंडल को कम करना.

सामाजिक स्तर पर परिस्थितियां कमोबेश आज भी नहीं बदली हैं. छत्तीसगढ़ का नागर रंगमंच उन मध्यवर्गीय लोगों के हाथों रहा है, जिनकी अपनी सांस्कृतिक जड़ें कहीं और हैं. यही कारण है कि नागर रंगमंच का छत्तीसगढ़ के लोक-मंच से वैसा रिश्ता नहीं बना, जो हमें बिहार, बंगाल, उड़ीसा और महाराष्ट्र में दिखलाई देता है. मराठी की बोलियों से मराठी साहित्य और भाषा का रिश्ता रहा. उड़िया या बंगला की बोलियों से भाषा का विकास हुआ. हिंदी क्षेत्र की स्थिति भिन्न है. हिंदी साहित्य में भी उत्तर भारत की बोलियों का कब्ज़ा रहा. कबीर को हिंदी का कवि माना जाता है, मीरा के भजन हिंदी साहित्य की धरोहर हैं, तुलसी हिंदी के कवि हैं, मगर गुरु घासीदास की वाणी छत्तीसगढ़ी है, वह हिंदी साहित्य में नहीं गिनी जाती. इसीलिए हिंदी रंगमंच ने लोकतत्व उत्तर भारत के लोक समाज से उठाये, छत्तीसगढ़ के लोकतत्व से रस ग्रहण नहीं किया. हबीब साहब ने ज़रूर अपने नाटकों में छत्तीसगढ़ी लोक तत्वों का इस्तेमाल कर आधुनिक बोध के नाटक खेले मगर वहाँ भी उनका वही नाटक ज्यादा चर्चित हुआ जो मूलतः राजस्थानी लोक कथा पर आधारित है.{रानी के प्रेम प्रसंगों की चर्चा छत्तीसगढ़ी लोकमानस में नहीं है}, “हिरमा की अमर कहानी “ या “मोर नाम दमांद गांव के नाम ससरार” कम ही चर्चित हुए. छत्तीसगढ़ के मध्यवर्गीय समाज में छत्तीसगढ़ी बोली के प्रति उपेक्षा के कारण छत्तीसगढ़ी नागर रंगमंच का विकास नहीं हुआ. नागर रंगमंच के नाम पर आज भी हिंदी नाटक ही होते हैं.

भारतीय समाज जातियों में बंटा रहा है और इसमें पेशेगत आधार पर जातियों का निर्माण हुआ. अंग्रेजों के आगमन और व्यापारिक पूंजीवाद के उदय से वैश्य समाज ने औरों की तुलना में ज्यादा तेजी से प्रगति की, यह व्यवस्था उनके अनुकूल थी. छत्तीसगढ़ के उत्तरी और दक्षिणी भाग जो पहाड़ी इलाके हैं और जहां आदिवासी और पिछड़ी जातियां बहुलता से निवास करती रहीं, वहां वणिक जाति तो थी ही नहीं, मैदानी इलाके में भी कृषक समाज ही था, इसलिए परिवर्तन का लाभ बाहर से आई जातियों को ही मिला. सवर्ण जातियां यहां नौकरियों में आईं तथा व्यापार पर वैश्य समाज का एकाधिकार रहा. इन्हीं से मिलकर शहरी केंद्र बने. कालांतर में औद्योगीकरण का लाभ भी इन्ही समूहों को मिला. बंगाल में बंगाली वैश्य समाज है, महाराष्ट्र में मराठी वैश्य समाज है, ओडिसा में उड़िया वैश्य समाज है मगर छत्तीसगढ़ में आपको ऐसा नहीं मिलेगा.

छत्तीसगढ़ियों ने धान तो उगाया मगर एक भी राइस मिल नहीं खोल पाए, बुनकर समाज ने वस्त्र तो बनाए मगर टेक्सटाइल के डिस्ट्रीब्यूटर नहीं बन पाए. अगरिया समाज ने लोहा तो गलाया मगर इस्पात का व्यापार उनके हाथों में नहीं रहा. यहां तक कि मनोरंजन उद्योग भी उनके हाथों में नहीं है. नयी अर्थव्यवस्था में ये अपनी जगह नहीं बना पाए और इसलिए इन समूहों के बीच एक सांस्कृतिक फांक दिखलाई देती है.

इस नयी अर्थव्यवस्था से पूर्व वाले समाज में ज़रूर सांस्कृतिक आदान प्रदान रहा. मराठा शासकों की फौजों को उड़ीसा जाने के लिए छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाके पैसेज की तरह थे और इन फौजी सिपाहियों की छावनी में मनोरंजन के लिए नाचा-गम्मत का विकास हुआ. उत्तर भारत से आये लोगों के संपर्क में पंडवानी का विकास हुआ, रास लीला ने छत्तीसगढ़ी संस्कृति के संपर्क में आकर रहस् का रूप धारण किया, भरथरी और ढोलामारू के विषय में भी यही कहा जा सकता है.

यह सांस्कृतिक आदान -प्रदान भले ही केवल मैदानी इलाके तक सीमित रहा और आदिवासी इलाके इससे अछूते रहे पर यह आदान प्रदान नई अर्थव्यवस्था के पूर्व तक चलता रहा. विजेता की संस्कृति हमेशा हावी रहती है ऐसी बात नहीं है, वह विजित की संस्कृति से पहले टकराती है, फिर घुलमिलकर नया रूप धारण करती है. नाचा-गम्मत,पंडवानी,ढोला-मारू,रहस् आदि इसी घुल मिलकर बनी संस्कृति के नए रूप हैं. इसीलिए सामंत काल तक ऐसी कोई फांक दिखलाई नहीं देती,परन्तु नई अर्थव्यवस्था के उदय से कुछ केन्द्रों के शहरीकरण से सांस्कृतिक फांक चौड़ी होती चली गई.

पहला दौर औद्योगीकरण का रेल बिछाने के साथ आया. दूसरा दौर उत्तर औद्योगिक युग की सड़कें बिछाते हुए आया. कच्चा माल ले जाने के पहले दौर के बाद दूसरा दौर माल खपाने का आया. इस दौर के विकास को यदि हम देखें तो कह सकते हैं कि विकास के नाम पर बिहार से दानापुर एक्सप्रेस से मजदूर छत्तीसगढ़ आया और छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से यहां का मजदूर पंजाब चला गया. छत्तीसगढ़ में नवाखाई या हरेली के मुकाबले ज्यादा वृहद स्तर पर अब छठ पूजा का मनाया जाना इसी बात का संकेत है. और छत्तीसगढ़ी एल्बमों का बाजार छत्तीसगढ़ के बाहर बनना भी यही दर्शाता है.

राष्ट्र राज्य की कल्पना पूंजीवादी समाज की देन है लेकिन हमारे देश में यह पूरी तरह से आई ही नहीं. भारत तो एक साथ कबीलाई युग से उत्तर आधुनिक युग में जी रहा है. अतः लोक मनस में राष्ट्र राज्य की कल्पना कहां से आएगी! यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में आज भी बहुत लोग गर्मियों कि छुट्टियों में देस जाना चाहते हैं. लोक मानस में आज भी राष्ट्र की बजाय देस जिंदा है तभी तो आज भी बिदेसिया लोक मानस को लुभाता है, फिल्मों में परदेसिया को लेकर कई गाने हिट हो चुके हैं,जबकि वह परदेसिया किसी दूसरे राष्ट्र का ना होकर किसी दूसरे गांव का होता है. आज वैश्वीकरण के इस दौर में जब राष्ट्रवाद भी पिछड़ेपन का प्रतीक बन चुका है ऐसी अर्थव्यवस्था का छत्तीसगढ़ की संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?

रायगढ़ के पास ही झारा शिल्पकारों कि बस्ती है, जहां बेल मेटल का काम किया जाता है. पूर्व में ये अपनी कलाकृतियों में अपने आदिवासी जीवन की झलकियां प्रस्तुत करते रहे हैं, कल्प वृक्ष, ताड़ के वृक्ष के नीचे बनी झोपड़ी में ताड़ी पिलाती आदिवासी महिला आदि. लेकिन आज अपनी कलाकृतियों में ये लोग रामायण और गीता के प्रसंगों से लेकर ऐश ट्रे तक बनाने लगे हैं. आदिवासी देवियों को दुर्गा की सात बहनों के रूप में समाहित कर इनका सवर्णीकरण हो गया है और अब यहां ज़ोरों से नवरात्रि मनाई जाने लगी है. धर्म का बाजार विकसित हो गया है. चंद्रपुर में बलि प्रथा का विरोध और विवाद भी इसी बाजार के साथ टकराहट की परिणति था.

सामंतवादी व्यवस्था कि विशेषता रही है कि उस काल में धर्म और संस्कृति के बीच कोई विभाजक रेखा नहीं थी.लेकिन पूजीवाद में ज्ञानोदय के साथ ही धर्म और संस्कृति के बीच विभाजक रेखा स्पष्ट हो जाती है. मगर वैश्वीकरण ने तो धर्म-संस्कृति सबको बाजार में समाहित कर लिया. ज्ञानोदय में जो हमने हासिल किया, बाजारोदय में गवां दिया. धर्म का बाजार प्रतिरोध कि संस्कृति का शमन करने के लिए एक अच्छा हथियार साबित होता है और वैश्विकरण की व्यवस्था के लिए यह मुफीद भी है. यही कारण है कि छत्तीसगढ़ कि सरकार संस्कृति के नाम पर राजिम कुम्भ और संतो के समागम के कार्यक्रम में ज्यादा व्यस्त है. पूरे देश में बाबाओं का बाजार उफान पर है.

संगीत के क्षेत्र में शोर बढता जा रहा है, लय की जगह अब बीट्स ने ले ली है. लोक संगीत के नाम पर, लोकनृत्य के नाम पर भौंडापन परोसा जा रहा है. मनोरंजन उद्योग या कहें कि बाजार उन लोगों के हाथ में है जिनका छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा से कोई वास्ता नहीं है. लोक संस्कृति को बदलना ही नहीं चाहिए और उसे वैसा ही सरंक्षित किया जाना चाहिए मैं ऐसा कहना नहीं चाहता और ऐसा संभव भी नहीं है. लोक संस्कृति का जन्म सामूहिक श्रम के कारण हुआ था सामूहिक रूप से चप्पू चलते हुए नाविक हैय्या हो हैय्या हो गाते थे. अब मोटर बोट को अकेले चलाते हुए नाविक ऐसा कदापि नहीं करेगा.

लोक संस्कृति का स्वाभाविक विकास जन संस्कृति कि ओर होता है. सामंती युग से औद्योगिक युग में पहुंचने पर जन संस्कृति भी विकसित हुई. व्यवस्था के केंद्र में जहां ईश्वर, वहां मनुष्य केंद्र में आया परन्तु इस उत्तर औद्योगिक युग में जहां वित्तीय पूंजी का बोलबाला है, उसने मनुष्य को केंद्र से हटाकर बाजार को स्थापित कर दिया है और मनुष्य अब मानव संसाधन में तब्दील हो गया है. केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय हो गया है.

आज की भाषा में कहें तो छत्तीसगढ़ का मानव संसाधन पिछडा हुआ है. नई अर्थव्यवस्था में आर्थिक गतिविधियां इतनी जटिल हो गयी हैं कि सामान्य जन की समझ से परे है, जो लोग इसे समझ सकते हैं वे लोग खुद इन्हीं आर्थिक गतिविधियों में लगे हुए हैं. संस्कृतिकर्म से उनका वास्ता नहीं है. यही कारण है कि आज इन जटिल परिस्थितियों को लेकर कोई कहानी या नए किस्म के नाटक नहीं आ रहे हैं. पिछले साल रायपुर इप्टा के गजानन माधव मुक्तिबोध समारोह में सथ्यू साहब के निर्देशन में एक नाटक देखा था “गिरिजा के सपने”, जिसमें लोकतत्वों का इस्तेमाल करते हुए बी टी काटन के कारण किसानों द्वारा आत्महत्याओं का मार्मिक चित्रण था. छत्तीसगढ़ी में हबीब साहब के बाद इस तरह का कार्य नहीं हो रहा है या तो लोक रूपों को जस का तस पेश किया जा रहा है या फिर हलकी-फुलकी कामेडी पेश की जा रही है. गहरी सोच रखने वाले निर्देशकों की कमी है.

वित्तीय पूंजी वाली अर्थव्यवस्था ने हमारी कार्यशैली को बदल डाला है. शिक्षा के क्षेत्र में अब एम.बी.ए. का बोलबाला है. युवा वर्ग अब स्कूली शिक्षा के बाद सीधे प्रोफेशनल कोर्स में जा रहा है, इंजीनियर बनकर एम.बी.ए. कर रहा है और ऊँची तनख्वाहों में खप जा रहा है. बेसिक साईंस या सामाजिक विज्ञानों की ओर उसकी रूचि नहीं रह गई है. हर जगह मैनेज करना सिखाया जा रहा है, चाहे व्यवसाय हो या राजनीति. मैनेजमेंट का मतलब होता है उपलब्ध संसाधनों में ही परिणाम प्राप्त करना. पहले आर्गेनाइज करते थे अब मैनेज करते हैं. रंगमंच के क्षेत्र में भी यही हो रहा है उपलब्ध कलाकारों के हिसाब से नाटक तैयार हो रहे हैं, नाटक के हिसाब से कलाकारों को तैयार नहीं किया जा रहा है.

सब कुछ निराशाजनक है ऐसा नहीं है, कुछ प्रगति भी है. इन्टरनेट पर अब छत्तीसगढ़ियों की दखलंदाजी बढ़ी है. वेब पर अच्छे ब्लॉग भी बढे हैं, अच्छे लेख भी आ रहे हैं. नई पीढ़ी अब लिखे साहित्य को कम पढ़ती है मगर आभासी दुनिया में अपनी दखलंदाजी दे रही है. कुछ लघु फ़िल्में और डॉक्यूमेंट्रीज भी छत्तीसगढ़ के लोगों ने अपलोड की हैं. नई टेक्नोलोजी अपने स्वरूप में बेहद जनतांत्रिक है और इसका उपयोग छत्तीसगढ़ के लोग कर रहे हैं यह सुकून देने वाली बात है.

अभी तो यह संधि काल है, जहां अस्पष्टता बनी हुई है. यह नई अर्थव्यवस्था और पुरानी संस्कृति के टकराव का दौर है. आगे चलकर इनके मिलाप से कुछ नया उपजेगा. हम आशा करते हैं कि ”वो सुबह कभी तो आएगी”.

लेखक अजय आठले वरिष्ठ रंगकर्मी व इप्टा की राष्ट्रीय कार्यसमिति में छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधि सदस्य हैं. उनसे [email protected] के जरिये संपर्क किया जा सकता है.

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