भोपाल : भारतीय राजनीति का पिछला दशक इस देश के इतिहास में लोकतंत्र की हत्या के प्रथम चरण के रूप में गिना जाएगा। राजनीतिज्ञों पर से देश का विश्वास उठ चुका है और अब प्रशासन तंत्र पर से भी क्रमश: विश्वास उठने की प्रक्रिया जारी है। पिछले दिनों देश की राजधानी सहित विभिन्न क्षेत्रों में हुई वारदातों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अक्षम राजनेताओं के भरोसे और भ्रष्ट राजनीति के चलते देश के प्रशसन तंत्र पर दीमक लग चुकी है। अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिए राजनेता नपुंसक प्रशासन को पूर्णतः अस्तित्वहीन और नकारा प्रमाणित करने पर अमादा है। दिल्ली गैंगरेप की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि एक युवती के साथ घटी इसी घृणित वारदात को अपने पक्ष में भुनाने के लिए शीला सरकार पूरी तरह तैयार है। शीला दीक्षित और उनके क्रांतिकारी सांसद पुत्र इस मोर्चे पर पूरी ताकत से लग गये है। दूसरी ओर संदिग्ध पुलिस कमिश्नर की अगुवाई में दिल्ली पुलिस भी अपने अस्तित्व को केन्द्र सरकार के अधीन रखने के लिए और गैंगरेप के कलंक से अपना चेहरा छुपाने के लिए ओछे हथकंडों पर उतर आई है।
दिल्ली के इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने वाले 90 प्रतिशत युवा उन घरों से संबंधित नजर आते थे, जहां पुलिस का हस्तक्षेप एक सामाजिक कलंक माना जाता है। पुलिस के लाठी चार्ज के बाद इन युवाओं ने राजनीतिज्ञों और प्रशासन तंत्र के षड्यंत्र को भली भांति महसूस कर लिया है। पूरे घटनाक्रम में एक बात कभी समझ में नहीं आती। कांग्रेस की राजमाता कही जाने वाली सोनिया गांधी और राजकुमार कहे जाने वाले राहुल गांधी इन स्थितियों में इस देश की जनता के साथ क्यों नहीं खड़े होते। क्या सोनिया गांधी स्वयं महिला नहीं है। क्या इटली की महिलाओं की आंतरिक भावनाएं, भारतीय महिलाओं से पृथक है। क्या सोनिया गांधी को भारतीय समाज और उसकी मानसिक स्थिति का रत्ती भर भी ज्ञान नहीं है। रात 12 बजे घर से बाहर निकल कर आंदोलनकारियों से मिलना 10 बजे उन्हें अपने घर बुलाना और अगले ही दिन इंडिया गेट पर उन्हीं युवाओं पर लाठी चार्ज करा देना, राजतंत्र के किसी जिम्मेदार व्यक्ति का कृत्य नहीं हो सकता। राहुल गांधी यूँ तो दलितों के घर नाटक करने के लिए खासे विख्यात हैं। वे स्वयं को युवा नेता प्रोजेक्ट किए जाने की पैरवी भी करते हैं। यह दिखाने की कोशिश भी कांग्रेस करती है कि राहुल ही हैं, जो युवाओं के दर्द को समझते हैं। इसके बावजूद अन्ना हजारे के आंदोलन से लेकर आज तक राहुल गांधी इस देश के आम आदमी के साथ खड़े होने की कभी हिम्मत क्यों नहीं कर पाते, यह बात समझ से परे है।
एक बात तय है, ये देश आम व्यक्ति की भावनाओं को न समझने वाले और कागजी तौर पर निर्मित किए जा रहे पुतलों के अस्तित्व को संरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है। इन स्थितियों में सोनिया और राहुल की अगुवाई में चंद दलाल नेताओं के भरोसे कांग्रेस कभी भी इस देश में शासन नहीं कर सकेगी। इस देश को एक स्पष्ट और कठोर गृहमंत्री की जरूरत है, जो दलालों की भीड़ में कांग्रेस के लिए अपने ही गिरोह में खोज पाना असंभव है। कांग्रेस को चाहिए था कि आम व्यक्ति के इस आंदोलन से स्वयं को जोड़कर इसकी गरिमा को बनाए रखते हुए आम जनमानस की भावनाओं को संतुष्ट करें। ऐसी स्थितियों में कांग्रेस के वो बयान वीरनेता दिग्विजय सिंह, शकील अहमद, मनीष तिवारी, सलमान खुर्शीद अचानक कहा गायब हो जाते हैं, कोई नहीं जानता।
इस देश ने कांग्रेस को सत्ता अपने संरक्षण के लिए दी है, न कि दलाली करके अपना घर भरने के लिए। समूचा देश कांग्रेस-भाजपा और अन्य राजनैतिक दलों के दलाली तंत्र को देख रहा है और महसूस कर रहा है। गैंगरेप की यह वारदात अंजाम तक पहुंचेगी, क्योंकि ये आम आदमी का आंदोलन है और भारत का आम व्यक्ति जिस घण्टे मशाल उठा लेता है, बड़ी से बड़ी सत्ता को भी निःस्तनाभूत कर देता है। कांग्रेस का अस्तित्व संकट में है। उसके नेतृत्व की क्षमता संदिग्ध और कमजोर है। जबकि दूसरी और अन्य राजनैतिक दल बिकाऊ बनकर कांग्रेस के पिछलग्गू बने हुए हैं। महसूस होता है कि इस देश के तंत्र को आम व्यक्ति को अपने हाथ में ही लेना होगा। इस गैंगरेप पर भी कोई गंभीर कार्रवाई सरकार करेगी, इसकी उम्मीद सोनिया और राहुल गांधी जैसे नेताओं के नेतृत्व वाली सरकार से बहुत कम है। सुशील कुमार शिंदे जैसे नेता प्रांतीय स्तर पर ही अच्छे हैं, उनसे इस देश को कोई उम्मीद करना गलत होगा।
लेखक सुधीर पाण्डे पत्रकार हैं.


