गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वे सारे रिकार्ड नष्ट करवा दिए जिसकी बिना पर उन्हें सज़ा हो सकती थी. २७ फरवरी से ९ मार्च के पुलिस के वे सारे रिकार्ड जिनसे साबित हो जाता कि उन्होंने पुलिस को हिदायत दी थी कि बीजेपी, विश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल के लोगों को क़त्लो गारद करने की खुली छूट दे दो, अब नष्ट कर दिए गए हैं. इस सन्दर्भ में जब पुलिस के आला आधिकारियों से पूछा गया कि ऐसा क्यों हुआ तो उन्होंने बता दिया कि पुलिस विभाग में यह नियम है कि पांच साल बाद वे सारे “गैरज़रूरी” कागजात नष्ट कर दिए जाते हैं, जिनका किसी भी “मुक़दमे में कोई इस्तेमाल न हो”. यह हैरानी की बात है कि पुलिस के आला हाकिमों ने तय कर लिया कि वे सारे कागज़ जिन में ऐसे सबूत हैं जिस से मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को सज़ा मिल सकती हो, वे गैर ज़रूरी हैं और उनका किसी भी मुक़दमें में कोई इस्तेमाल नहीं है. जबकि अभी यूं सभी मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच चल रही है.
ज़ाहिर है यह कागज़ नरेंद्र मोदी के प्रयास से ही नष्ट किये गए होंगे. अगर नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री न होते तो उनके राज्य के पुलिस अफसरों ने ही उनके खिलाफ सबूत नष्ट करने का मुक़दमा दर्ज कर दिया होता और उन्हें तीन साल की सज़ा बामशक्कत करवा देते. लेकिन ऐसा नहीं होगा क्योंकि वहां मोदी का राज है और जो भी मोदी से कानून और संविधान की बात करेगा उसे सज़ा दी जायेगी. ठीक वैसी ही सज़ा जो आजकल आईपीएस अफसर संजीव भट्ट को दी जा रही है. जब उस वक़्त गाँधी नगर में तैनात आला पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर बताया था कि मुख्यमंत्री के आवास में उनकी मौजूदगी में हुई बैठक में नरेंद्र मोदी ने अफसरों को बता दिया था कि मुसलमानों को सबक सिखाना है और मुसलमानों को बचाने की कोई भी कोशिश नहीं की जानी चाहिए. हालांकि उनके इस हलफनामे को उस वक़्त मीटिंग में मौजूद एक बड़े अफसर ने गलत बताया है लेकिन परिस्थितिजन्य साक्ष्य ऐसे हैं कि किसी चाटुकार अफसर की बात को गंभीरता से लेने की कोई ज़रूरत नहीं है.
दर असल मोदी ने उन सभी अफसरों को बहुत कमाई करवाई थी, जिन्होंने मुसलमानों को सबक सिखाने के उनके प्रोजेक्ट में मदद की थी. जिन लोगों ने उनकी मनमानी में साथ नहीं दिया था या अपनी सही ड्यूटी करने के चक्कर में नरसंहार के काम में मोदी का हुकुम नहीं माना था उनको दण्डित किया गया था. संजीव भट्ट की श्रेणी में ही एक और अफसर का नाम सुर्ख़ियों में आया था जो २००२ में जामनगर नगर निगम का कमिश्नर था. उसने भी कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट में हाज़िर होकर बयान देने के लिए तैयार है कि मोदी ने किस तरह से हत्याकांड की साज़िश रची और उसे अपनी मर्जी के अंजाम तक पंहुचाया. इस अफसर का भाई भी गुजरात पुलिस में बड़ा अधिकारी है और वह भी अदालत में बयान देना चाहता है. उसका दावा है कि उसके ऊपर नरेंद्र मोदी के कारिंदों और अफसरों ने किस तरह दबाव डाला. इन दोनों भाइयों को राज्य सरकार की ओर से परेशान किया जा रहा है. आईएएस अफसर भाई को तो किसी मामूली अपराध में बुक करने जेल में डाल दिया गया है.
इसके पहले हज़ारों लोग खुलकर मोदी की सच्चाई पब्लिक डोमेन में डाल चुके हैं. लेकिन कहीं कुछ नहीं हो रहा है. मोदी छुट्टा घूम रहे हैं. इस सारे प्रकरण में दिल्ली के राजनेताओं का रवैया बहुत ही चिंताजनक है. जहां तक बीजेपी का सवाल है, उसके नेता तो मोदी को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं. जैसे ही मोदी की कोई पोल खुलती है, यह लोग दिल्ली में ऐसा माहौल बना देते है कि जैसे मोदी को किसी साज़िश का शिकार बनाया जा रहा है. संजीव भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया था तो बीजेपी के मोदी गुट के एक बड़े नेता ने बयान दिया था कि जब भी मोदी के बारे में सुप्रीम कोर्ट में कोई सुनवाई होती है कुछ लोग झूठ को तथ्य बनाकर प्रचार करने लगते हैं. वैसे भी भीजेपी के आला नेता शुरू से ही गुजरात नरसंहार २००२ के हर तथ्य को ढंकते रहे हैं. मोदी की राजनीति के सहारे वे पूरे देश के लोगों बाँट कर भारत में राज करने के सपने देख रहे हैं. जिस पार्टी के मालिक आरएसएस वालों ने महात्मा गाँधी को नहीं छोड़ा उनसे उम्मीद ही क्या की जा सकती है. इन अफसरों ने जो कुछ भी कहा था सब कुछ उन दस्तावेजों में था, जिसे अब मोदी की सरकार ने नष्ट कर दिया है. ज़ाहिर है कि इन कागजों के ख़त्म हो जाने के बाद मोदी और उनके कारिंदे ईमानदार और संविधान के प्रति प्रतिबद्ध अफसरों को झूठा साबित करने की कोशिश करेंगे. उम्मीद केवल सुप्रीम कोर्ट से है. केंद्र सरकार और सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी तो मोदी के साथ ही खड़ी नजर आती है.
वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह की रिपोर्ट.


