: हिंदी विवि में उत्तरी अफ्रीका में उथल-पुथल और उसका विश्वव्यापी प्रभाव विषय पर हुआ विशेष व्याख्यान : वर्धा : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग द्वारा उत्तरी अफ्रीका में उथल-पुथल और उसका विश्वव्यापी प्रभाव विषय पर आयोजित विशेष व्याख्यान के दौरान जेएनयू, नई दिल्ली में पश्चिम एशिया एवं अफ्रीकी अध्ययन विभाग के निदेशक प्रो.सुबोध नारायण मालाकार ने कहा कि उत्तरी अफ्रीका में चल रहे जनांदोलन नवउदारवाद के परिणामों के खिलाफ है।
विश्वविद्यालय परिसर स्थित हबीब तनवीर सभागार में आयोजित विशेष व्याख्यान समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण ने की। इस दौरान फ्यूजी गुरुजी शांति अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो.मनोज कुमार व अहिंसा एवं शांति अध्ययन के विभागाध्यक्ष डॉ. नृपेन्द्र प्रसाद मोदी मंचस्थ थे। प्रो. मालाकार ने अफ्रीका की भौगोलिक स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सात बहनों (मिश्र, लीबिया, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया, मोरक्को, जार्डन, सीरिया) वाले देशों को हम उत्तरी अफ्रीका कहते हैं, जो सहारा मरूस्थल के उत्तरी भाग में स्थित है। उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी एशिया के इस्लामिक देशों के बीच इस्लाम धर्म ने एकसूत्रता स्थापित की। प्राकृतिक तेल और गैस पर कब्जा करने के लिए अमेरिका व यूरोप येन-केन-प्रकार से प्रयासरत रहता है।
उत्तरी अफ्रीका के मुल्क डिक्टेटरशिप में है। ट्यूनिशिया व यमन में 32 वर्ष, मिश्र में 30 वर्ष, लीबिया में 42 वर्ष, मोरक्को, सीरिया, अल्जीरिया में 11 वर्ष, जार्डन में 12 वर्ष की अवधि तक शासन को कब्जा किए हुए हैं। सभी देशों की संरचना जाल को अमेरिका ने इस तरह बुना कि इन देशों के शासनाध्यक्षों ने अमेरिकी चक्रव्यूह को अपनी सुरक्षा कवच मान बैठे। नवउदारवाद के नाम पर अमेरिका द्वारा तेल व अन्य संपदा की लूट तथा डिक्टेटरों द्वारा संपदा के दोहन से आम जनता हलाकान हो गयी। गरीबी के कारण आर्थिक असमानता तथा बढ़ती बेरोजगारी ने युवाओं में जनांदोलन के लिए उभार पैदा किया। असंतोष के वातावरण में एक चिंगारी की जरूरत थी। ग्रेजुएट पास एक नौजवान मोहम्मद बुआजीजी ने ट्यूनीशिया में बेरोजगारी की हालत में एक ठेले पर फल व सब्जी बेच रहा था। पुलिस ने लाइसेंस न होने का हवाला देते हुए उस नौजवान से पैसे मांगा, नहीं देने पर उन्हें पीटा गया। मोहम्मद बुआजीजी ने 17 दिसम्बर को आत्मदाह किया। ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति बेन अली के खिलाफ तीव्र जनांदोलन हुए जिसे जेस्मीन रिवोल्यूशन कहा गया। आंदोलन से बचने के लिए बेन अली को भागकर सउदी अरब जाना पड़ा। उनकी पत्नी डेढ टन सोना लेकर ट्यूनीशिया से भागी।
लीबिया में गद्दाफी ने 300 बहुराष्ट्रीय कंपनियों को न्यौता दे दिया जिससे वहां बेरोजगारी बढ़ी। उत्तर अफ्रीकी देश लीबिया में तेल तो है ही और पानी भी बहुत मीठा है। स्वीट वाटर पर यूरोप व अमेरिका कब्जा करना चाहते हैं। उत्तरी अफ्रीका में हो रहे उथल-पुथल से भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा क्योंकि करीब 50 लाख भारतीय बाहरी मुल्कों में अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं। एक शोधार्थी द्वारा पूछे गए सवाल कि लीबिया, इजिप्ट आदि देशों में जैसे जनांदोलन हुए, क्या भारत में ऐसा जनांदोलन हो सकता है, के जबाव में उन्होंने कहा कि भारत में टुकड़ों में जो जनांदोलन हो रहे हैं उनके एजेंडे में पॉलीटिकल, और सोशल मुद्दे हैं न कि इकोनोमिकल, जबकि यह सभी की जड़ है। हम विविध भाषा, बोली, जाति, क्षेत्रीयता आदि के आधार पर बंटे हुए हैं। सबके इंट्रेस्ट अलग-अलग हैं, हम एकजुट नहीं हो पाते हैं। चुनाव में हम वोट आर्थिक सुधार के नाम पर नहीं बल्कि जाति, भाषा के आधार पर डालते हैं। ऐसे में यहां जनांदोलन का कोई खास प्रभाव नहीं दिख रहा है।
अध्यक्षीय वक्तव्य में कुलपति विभूति नारायण राय ने प्रो.मालाकार के वक्तयों को जोड़ते हुए कहा कि अभी हाल में तमाम मुल्कों में जो जनांदोलन हुए ये किसी धार्मिक उन्माद के नाम पर नहीं, अपितु तानाशाही का खात्मा और प्रजातंत्र व लोकतंत्र की बहाली के लिए किया गया। इस जनांदोलन में इंटरनेट व मीडिया की प्रभावी भूमिका रही। ब्लॉग के माध्यम से जनता एकत्रित हुई और लोकतंत्र के नाम पर आंदोलन के लिए उतारू हो गई। कार्यक्रम का संचालन डॉ.नृपेन्द्र प्रसाद मोदी ने किया तथा प्रो.मनोज कुमार ने आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर विवि के राइटर-इन-रेजीडेंस से.रा.यात्री, प्रो.के.के.सिंह, डॉ.शंभु गुप्त, डॉ.फरहद मलिक, डॉ.रामानुज अस्थाना, डॉ.बीरपाल सिंह यादव, डॉ.सुरजीत सिंह, रवि कुमार, अनिर्वाण घोष, राकेश मिश्र सहित बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय के शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी, शोधार्थी व विद्यार्थी उपस्थित थे। प्रेस रिलीज


