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नवगीतों से गरीब, दलित, आदिवासी भी पा सका अपना स्‍वर

: वर्धा : हिंदी विवि के साहित्‍य विद्यापीठ में आयोजित कार्यक्रम में प्रो. प्रेमशंकर का उद्बोधन : प्रणय संबंधों के सुख-दुख तक सीमित गीतों की दुनिया का अतिक्रमण नवगीत ने किया। नवगीत ने विषय, भाषा एवं शिल्‍प के स्‍तर पर भी व्‍यापक‍ परिवर्तन किए। ये परिवर्तन समय की जरूरत थे, जिन्‍हें नवगीतकारों ने अनुभव किया। गीत कई बार बहुत लंबे हुआ करते थे, इसलिए पढ़ने और सुनने दोनों में परेशानी होती थी। नवगीतकारों ने गीतों की लंबाई छोटी की और छंद को भी अपनी तरह रचा। यह नवगीतों की दुनिया है जिसमें गरीब, दलित, आदिवासी भी अपना स्‍वर पा सका है। गीतों में इस दुनिया के लिए कोई जगह नहीं थी।

: वर्धा : हिंदी विवि के साहित्‍य विद्यापीठ में आयोजित कार्यक्रम में प्रो. प्रेमशंकर का उद्बोधन : प्रणय संबंधों के सुख-दुख तक सीमित गीतों की दुनिया का अतिक्रमण नवगीत ने किया। नवगीत ने विषय, भाषा एवं शिल्‍प के स्‍तर पर भी व्‍यापक‍ परिवर्तन किए। ये परिवर्तन समय की जरूरत थे, जिन्‍हें नवगीतकारों ने अनुभव किया। गीत कई बार बहुत लंबे हुआ करते थे, इसलिए पढ़ने और सुनने दोनों में परेशानी होती थी। नवगीतकारों ने गीतों की लंबाई छोटी की और छंद को भी अपनी तरह रचा। यह नवगीतों की दुनिया है जिसमें गरीब, दलित, आदिवासी भी अपना स्‍वर पा सका है। गीतों में इस दुनिया के लिए कोई जगह नहीं थी।
उक्‍त विचार उत्‍तर प्रदेश हिंदी संस्‍थान के अध्‍यक्ष प्रो.प्रेमशंकर ने व्‍यक्‍त किए। वे महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के साहित्‍य विद्यापीठ द्वारा आयोजित विशेष व्‍याख्‍यान समारोह को संबोधित कर रहे थे। समारोह की अध्‍यक्षता विश्‍वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने की। प्रो.प्रेमशंकर ने कहा कि बदलते समय में गीतों में परिवर्तन जरूरी था। नवगीतकारों ने इस परिवर्तन की आहट सुनी और अपनी तरह से बदलाव किये। नवगीत एक प्रकार से साहित्यिक आंदोलन है, जिसकी शुरुआत 1958 ई. से होती है। यह न केवल लघु पत्रिकाओं का आयोजन था अपितु उन साहित्यिक लोगों का आंदोलन था जो अपने समय को अपनी तरह व्‍यक्‍त करना चाहते थे।

अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में कुलप‍ति विभूति नारायण राय ने कहा कि यह विश्‍वविद्यालय रचनात्‍मकता का हर समय स्‍वागत करता है। अध्‍ययन-अध्‍यापन के साथ जीवित और सक्रिय रचनाकारों को पढ़ा और सुना जाना चाहिए जो अपने समय को रेखांकित कर रहे हैं। इस प्रकार के आयोजन प्राध्‍यापकों तथा विद्यार्थियों के लिए अपरिहार्य है। कार्यक्रम का संचालन करते हुए साहित्‍य विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता प्रो. सूरज पालीवाल ने कहा कि गीत प्रेम या प्रणय तक सीमित है। नवगीतों में जीवन के संघर्ष दिखाई देते हैं। इसलिए नवगीत हमारे समय की आवाज है। प्रो. के.के.सिंह ने आभार व्‍यक्‍त किया। इस अवसर पर विद्यापीठ के प्राध्‍यापक, कर्मी, शोधार्थी तथा विद्यार्थी बड़ी संख्‍या में उपस्थित थे। प्रेस रिलीज

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