लालू प्रसाद यादव और दिग्विजय सिंह अपनी बदजुबानी के कारण एक बार पुनः चर्चा में हैं. जनता के सेवक और संवैधानिक संस्थायों के लिए हमारे द्वारा निर्वाचित हमारे बहुत से जनप्रतिनिधियों पर विगत दिनों जब भ्रष्टाचार और अपराध में संतिप्त रहने के आरोप लगने लगे तो अपने आचरण को दुरुस्त करने और इस प्रकार की प्रवृति से बचने और अपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को राजनीति से दूर रखने की अपेक्षा उन्होंने जनता को ही ऑंखें तरेरनी शुरू कर दीं. अपने सम्मान के लिए इतने चिंतित हमारे इन जन प्रतिनिधियों ने देश की १२५ करोड़ जनता की चिंता छोड़ किसी एक साधारण नागरिक द्वारा कहे गए शब्दों को लेकर संसद की अवमानना का प्रश्न खड़ा करने का प्रयत्न किया. इतना ही नहीं बात-बात पर संसद न चलने देने वालों ने विशेषाधिकार का प्रश्न उठा कर उन लोगों को दण्डित करने और हथकड़ी लगा कर संसद में पेश करने तक की मांग कर डाली.
देश के स्थापित विधिनुसार किसी को भी किसी के बारे में अपमानजनक शब्दों या अवमानना के भाव से संबोधन करने का अधिकार नहीं है. परन्तु हमारे नेताओं ने क्या कभी इस पर विचार किया है कि वह अपने विरोधियों के विषय में मीडिया के सामने किस प्रकार की भाषा का प्रयोग करते हैं और उसका क्या सन्देश जाता है? अभी कल की ही बात है मीडिया में छाये रहने की होड़ में बेवजह बयानबाजी करने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने महाराष्ट्र के बाल ठाकरे और राज ठाकरे के विषय में प्रश्न करने पर उन्हें लफंगा कह कर संबोधित किया, इतना ही नहीं अपने अंदाज से देश का मनोरंजन करने के लिए प्रसिद्ध लालू यादव ने मीडिया को भी डांटने के लहजे में कह दिया कि एंटरटेंमेंट मत करो यहाँ. अब यहाँ सवाल पैदा होता है कि कि क्या इस प्रकार किसी को भी लफंगा कहा जा सकता है? वहीँ दूसरी ओर कांग्रेस में भी एक प्रसिद्ध विवादित नेता हैं जो गाहे-बगाहे विवादित बयानबाजी कर चर्चा में बने रहना चाहते हैं.
कांग्रेस के महामंत्री दिग्विजय सिंह ने भी कल ही अपने प्रदेश के मुख्यमंत्री को लबरा (झूठा) और रोतला (सदा रोनेवाला) कह कर संबोधित किया. बुंदेलखण्ड की अयोध्या ओरछा से शुक्रवार को शुरू हुई कांग्रेस जनचेतना यात्रा के दौरान पृथ्वीपुर में आयोजित जनसभा में दिग्विजय सरकार पर हमला करते हुए मान-मर्यादा की तमाम सीमाएं तोड़ते हुए जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग कर गए उससे समाज को कैसी चेतना मिली होगी यह तो वह स्वयं ही जानते होंगे. यहाँ प्रश्न यह उठता है कि देश को भद्रता का प्रवचन देनेवाले यह सियासी भद्रजन स्वयं अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए देश की आम जनता को आखिर किस रास्ते ले जाना चाहते हैं? ऐसा नहीं कि बदजुबानी की इस प्रतियोगिता के केवल यही दो-चार धुरंधर ही प्रतियोगी हैं. एक लम्बी फेहरिश्त है ऐसे महारथियों की और लगभग सभी दलों में ऐसी भाषा का प्रयोग करने वाली मिल जायेंगे.
चुनावों के दौरान तो इन नेताओं की भाषा पर गौर कर समय खराब करने वाली बात होगी. चोर, डाकू, हत्यारे, लुटेरे, देश के दुश्मन और लाशों के सौदागर तक के अलंकारों से संबोधित करते है यह एक दूसरे को. इसके विपरीत जब जनसाधारण उन्हीं के शब्दों को दोहराता है तो विशेषाधिकार के उल्लंघन का कारण बन जाता है. सोनिया गांधी गुजरात के नरेन्द्र मोदी को लाशों का सौदागर कह कर विवाद पैदा करती हैं तो वहीँ दूसरी ओर भाजपा के मुखिया गडकरी संसद में कटौती प्रस्ताव के दौरान लालू और मुलायम के लोकसभा से वॉकआउट का जिक्र करते हुए मुलायम सिंह और लालू यादव के लिए अभद्र शब्दों का प्रयोग करते हुए उन्हें सोनिया और कांग्रेस के तलवे चाटने वाले बताते हैं. हालाँकि बाद में उन्होंने अपने वक्तव्य में हिंदी भाषा के एक मुहावरे के प्रयोग करने की बात कह कर मामले को टालने का प्रयत्न किया था. यही नहीं गडकरी पर दिग्विजय को चिल्लर नेता कहने पर भी विवाद हो चुका है.
हाल में ही संपन्न हुए पांच राज्यों के चुनावों के दौरान ७२ वर्षीय केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी बाबू ने अपने से मात्र दो या तीन वर्ष बड़े अन्ना हजारे को टोपीवाला बुड्ढा कहकर संबोधित किया. अन्ना के खिलाफ कांग्रेसी नेताओं की बदजुबानी कोई नई बात नहीं है. इससे पूर्व भी कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने भी अन्ना के खिलाफ अभद्र और कड़े शब्दों से टिप्पणी की थी, लेकिन बाद में उन्होंने बिना शर्त उनसे माफी भी मांग ली थी. बेंगलूरू मैसूर इंफ्रास्ट्रक्चर कोरिडोर परियोजना के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले देवगौडा ने बातचीत में येदियुरप्पा के खिलाफ अंससदीय भाषा का कथित इस्तेमाल किया, जिसको लेकर भाजपा नेताओं ने कडा विरोध जताया था. पंजाब के वयोवृद्ध मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह के विरुद्ध बयान करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री अमरेन्द्र सिंह भी कुछ बेअदबी के लहजे से बात करते हैं. परन्तु लगता है कि इसका बदला प्रकाश सिंह बादल के पुत्र सुखवीर सिंह बादल ने अमरेन्द्र सिंह के विषय में “काम काज छोड़ कर शाम से ही पटियाला पेग चढ़ा लेता है” पलटवार कर के लिए है.
दिग्विजय सिंह को अपना भाई कह कर संबोधित करने वाली भाजपा की उमा भारती भी अपने मुहँफट होने की वजह से चर्चा में बनी रहती हैं. आडवाणी के विरुद्ध उनकी बदजुबानी के कारण ही उनको भाजपा से बाहर का रास्ता दिखाया गया था. माया के विरुद्ध जब सभी नेता फेल हो गए तभी भाजपा ने माया के विरुद्ध उमा भारती को मध्य प्रदेश से लाकर उत्तर प्रदेश में नेता बना कर उतरा था ताकि माया को उसी की भाषा में केवल उमा ही जवाब दे सकती हैं. विकट परिस्थिति का सामना कर रहे इस देश के असल मुद्दों की अनदेखी करते हुए और मात्र विरोध करने और मीडिया में स्थान पाने की होड़ में लगे राजनीतिक दलों के यह नेता एक दूसरे को नौटंकीबाज, भांड, ओसामा बिन लादेन, भूत-प्रेत की संज्ञा देते हुए इतने बहक गए कि राजघाट को शमशान घाट और नितिन गडकरी को नालायक और भाजपा का जोकर तक बता दिया. वहीँ समाजवादी पार्टी के नेता मोहम्मद आजम खान ने तो बदजुबानी की सभी हदें तोड़ते हुए यूपी के पूर्व गवर्नर टीवी राजेश्वर पर निशाना साधते हुए यहाँ तक कह दिया कि पूर्व गवर्नर टीवी राजेश्वर को लाल किले से फांसी दे देनी चाहिए. इसी प्रकार कश्मीर पर एक विवादित बयान देने पर उत्तर प्रदेश के बदायूं की एक अदालत ने मोहम्मद आजम खां के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज करने का आदेश देना पड़ा था. हालांकि आजम खान ने बाद में अपना यह विवदित बयान वापस ले लिया था.
यह तो कुछ उल्लेखनीय वृतांत थे हमारे जनप्रतिनिधियों की बदजुबानी के. परन्तु देखने में यह भी आ रहा है कि विधायिका की बदजुबानी का असर हमारी कार्यपालिका पर भी पड़ रहा है. अभी पिछले सप्ताह ही उत्तर प्रदेश के संत कबीरनगर में डीईजी माथुर को एक फरियादी ने अपनी बेटी के अपहरण कर लिए जाने की शिकायत करते हुए उसके बरामद करने की प्रार्थना की. इस मामले पर अपनी संवेदना प्रकट करने की अपेक्षा डीआइजी माथुर ने प्रार्थी को फटकारते हुए कहा था कि अगर मेरी बहन भागती तो मैं उसे गोली मार देता या खुद को गोली मार लेता. वहीँ दूसरी ओर वहाँ के एसपी का सार्वजनिक रूप से यह कहना था कि इस जिले में 70 प्रतिशत लडकियां भाग रही हैं, मैं चोर और लुटेरों को पक़डूं या लडकियां बरामद करूं. मीडिया में मामले के उछलने और राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा सरकार से रिपोर्ट मांगने पर मामला ने तूल पकड़ लिया और अंततः अखिलेश की सरकार को डीआईजी एसके माथुर और एसपी धर्मेन्द्र कुमार का स्थानांतरण करना पड़ा. इसप्रकार की बदजुबानी की जंग से यह लोग हासिल क्या करना चाहते है यह तो यही जाने, देशवासियों को तो उस दिन की प्रतीक्षा है जब शालीनता को तोड़ते हुए अमर्यादित और असंसदीय भाषा का प्रयोग करनेवाले राजनीतिज्ञों के विरुद्ध भी कुछ इसी प्रकार की कारवाई होगी.
लेखक विनायक शर्मा मंडी से प्रकाशित साप्ताहिक अमर ज्वाला के संपादक हैं.


